You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
बीते एक दशक में बढ़ा है राजनीति में छिछोरापन
- Author, डेविड रॉबसन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
आप किसी भी सियासी पार्टी से ताल्लुक़ रखते हों, किसी भी दल का समर्थन करते हों, एक बात तो यक़ीनन मानते होंगे, कि राजनीति का स्तर गिरता जा रहा है.
मर्यादित राजनीति के बजाय बेहूदा और असंसदीय आरोपों-बयानों का दौर चल रहा है.
भारत में प्रधानमंत्री को मुख्य विपक्षी दल के नेता खुलेआम चोर कहते हैं. वहीं सत्ताधारी पार्टी के नेता विपक्षी दल के नेता को 'पप्पू' यानी कमअक़्ल कह कर माखौल उड़ाते हैं.
लेकिन, अगर आप सोचें कि राजनीति का स्तर सिर्फ़ हिंदुस्तान में गिर रहा है, तो आप ग़लत हैं.
पूरी दुनिया में राजनीति पर नज़र रखने वालों का यही मानना है कि पिछले एक दशक में राजनीति ने छिछोरेपन के नए पैमाने गढ़े हैं.
अमरीका में मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने सियासी विरोधियों को पागल, सनकी, भ्रष्ट और धोखेबाज़ कहते हैं.
सोशल मीडिया से हमें अपने नेताओं की सोच का सीधे पता चल जाता है.
सवाल ये है कि क्या ऐसे निजी हमलों से किसी नेता के बारे में जनता की राय पर असर पड़ता है? या फिर वो ऐसी अमर्यादित भाषा से अपने ताक़तवर और मज़बूत होने का संकेत देते हैं, ताकि उनका जनसमर्थन और बढ़ जाए.
राजनीति का नया दौर
अमरीका में विवादित ब्रेट केवेनॉ के सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किए जाने के दौरान, देश में सियासी दरार की गहराई का एहसास हुआ.
जब ब्रेट केवेनॉ ने अमरीकी संसद के सामने बड़बोले बयान दिए. हिंसक विरोध का समर्थन किया और बाद में अपने बयानों को सही ठहराया, तो भी उनकी लोकप्रियता में हेर-फेर नहीं हुआ था. बल्कि जो लोग फ़ैसला नहीं कर सके थे, वो भी ब्रेट के समर्थन में आ गए.
बाद में संसद ने ब्रेट को अमरीकी सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने को हरी झंडी दे दी.
शायद ये राजनीति का नया दौर है, जब आप को विरोधी के ख़िलाफ़ खुलकर बोलने से ही समर्थन मिलता है.
विनीपेग यूनिवर्सिटी के जेरेमी फ्राइमर और इलिनॉय यूनिवर्सिटी की लिंडा स्किटका ने हाल ही में सियासत के इस नए दौर की पड़ताल की. उन्होंने अपनी रिसर्च के नतीजे एक बड़ी पत्रिका में छापे. इस पर नज़र डालें, तो, कई चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं.
मॉन्टेग्यू सिद्धांत
फ्राइमर और स्किटका ने दो राजनीतिक विचारों के पैमाने पर आज के सियासी माहौल को परखा. पहला था, 'मॉन्टेग्यू सिद्धांत'. ये सिद्धांत 18वीं सदी की सामंतवादी अंग्रेज़ मैरी वॉर्टले मॉन्टेग्यू के विचार पर आधारित है. मैरी का कहना था कि, 'विनम्रता से आप को बिना कुछ भी ख़र्च किए सब कुछ हासिल हो सकता है.'
यानी मैरी मॉन्टेग्यू का ये मानना था कि राजनीति में बेअदबी की आप को भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. इसका बहुत नुक़सान होता है.
रेड मीट सिद्धांत
फ्राइमर और स्किटका ने इस सिद्धांत की जगह 'रेड मीट सिद्धांत' पेश किया. इस सिद्धांत के मुताबिक़ आप विरोधी का अपमान कर के अपने समर्थकों के सामने मांस के टुकड़े फेंकते हैं.
इस विचार के मुताबिक़ जब कोई राजनेता अपने विरोधी पर अमर्यादित टिप्पणी करता है, तो, उसका मतलब ये होता है कि वो बोलने वाले नेता को ईमानदार मानता है. उसके बयानों को वाजिब निंदा समझता है. ये मानता है कि ऐसा बोलने वाले दिल से बोलते हैं.
शायद इसकी वजह ये भी है कि आज सियासी दरारें इतनी गहरी हो गई हैं कि किसी भी पार्टी के प्रति श्रद्धा भाव रखने वाले अपने विरोधी पर ज़रा भी यक़ीन नहीं रखते.
रेड मीट सिद्धांत और ट्रंप
फ्राइमर और स्किटका ने इन सिद्धांतों को समझने के लिए कई प्रयोग किए. उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट की समीक्षा की.
जनमत जानने के लिए होने वाले सर्वे की पड़ताल की और ऑनलाइन सवाल-जवाब भी किए. लोगों से ख़ास तौर से ट्रम्प से जुड़े सवाल किए गए.
दो टीवी पत्रकारों पर उनके गाली-गलौज वाले खुले हमले के बारे में पूछा गया.
सर्वे में भाग लेने वालों से बातचीत करने पर पता चला कि जब भी ट्रंप ने घटिया भाषा का इस्तेमाल किया तब उन्हें बहुत कम पसंद किया गया. उनके फैन्स को भी ये ज़बान अच्छी नहीं लगी.
लेकिन, जब भी ट्रंप ने मर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया, उनकी रेटिंग बढ़ गई. जब भी ट्रंप ने सियासी विरोधियों के प्रति सम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया, तो उनके समर्थक उन पर और फ़िदा हो गए.
लेकिन, जब भी ट्रंप ने अपने ऊपर हुई अमर्यादित टिप्पणी का उससे भी घटिया ज़ुबान में जवाब दिया, तो जनता को उनकी बातें पसंद नहीं आईं. उनकी रेटिंग गिरी.
कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि अपमान करने वाले बयानों का जवाब घटिया बयानों से देना जनता को पसंद नहीं है. गाली-गलौज और बेहूदा टिप्पणियों के प्रति अगर नेता चुप रहें, तो ये विकल्प जनता की नज़र में बेहतर है.
मर्यादित राजनीति
फ्राइमर और स्किटका ने 1990 से 2015 के बीच अमरीकी संसद में हुई बहसों के दौरान दिए गए बयानों पर भी जनता की राय जानी. इस दौरान वो अमरीकी संसद को सियासी तौर पर बांट कर नहीं पेश कर रहे थे.
फिर भी, जनता ने जब भी ये महसूस किया कि चर्चा के दौरान गंदी भाषा का इस्तेमाल हुआ, तो उन्होंने इसके प्रति नाख़ुशी जताई.
कुल मिलाकर ये कहें कि जनता को बेहूदा राजनीति नहीं पसंद आई, तो ग़लत नहीं होगा.
फ्राइमर और स्किटका इस नतीजे पर पहुंचे कि मैरी मॉन्टेग्यू का सिद्धांत अब भी राजनीति में अहम है कि विनम्रता आप को ढेर सारे वोट दिला सकती है.
अब जबकि हिंदुस्तान में चुनाव होने वाले हैं. अगले कुछ महीने चुनावी बयानबाज़ी से भरपूर रहेंगे. तो, हमारे नेताओं को भी इस रिसर्च से सबक़ लेना चाहिए. और, 18वीं सदी में दी गई मैरी मॉन्टेग्यू की सलाह पर अमल करने हुए मर्यादित राजनीति ही करनी चाहिए.
राजनीति में मर्यादा अब भी वोट दिला सकती है.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)