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क्यों हममें से कुछ लोग बेहद तीखा खाना पसंद करते हैं?
- Author, वेरोनिका ग्रीनवुड
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हिंदुस्तान के खाने के बारे में मशहूर है कि ये चटख, तीखा और मिर्च-मसाले से भरपूर होता है. दुनिया में कई और ऐसे देश हैं जहां पर मसालों की मदद से खाने को चटखारेदार बनाया जाता है. मेक्सिकन, चाइनीज़ और इथियोपियाई व्यंजन अपने तीखेपन के लिए मशहूर हैं. दुनिया के तमाम देशों में तुर्श खाने के शैदाई मिलते हैं. वो ऐसा खाना पसंद करते हैं जो मुंह में आग लगा दे.
समय बिताने के तमाम नुस्खों में एक मशहूर नुस्खा दुनिया की सबसे तीखी मिर्चों के बारे में चर्चा करना भी है. लोग ऐसे ही व्यंजनों के बारे में बात करते हैं. किसी को आंध्र प्रदेश का रसम बेहद तीखा लगता है, तो किसी को पंजाबी छोले. किसी को भूत झोलकिया दुनिया की सबसे तीखी मिर्च लगती है, तो किसी को मेक्सिकन चिली.
सबसे तीखा व्यंजन
ठीक यही बात व्यंजन के बारे में कही जाती है. एक भारतीय रेस्टोरेंट में चश्मे पहनकर डिश बनाई जाती है. इसका नाम है विडोवर फ़ॉल. तीखापन नापने के पैमाने स्कोविल स्केल में ये डिश एक लाख की रेटिंग पर आती है. इसके मुक़ाबले कुछ लोग कोरिया की सुसाइड बरीटो को सबसे तीखा व्यंजन मानते हैं.
पश्चिमी देशों में विंडालू से लेकर भूतिया मिर्च और चीन के सिचुआन प्रांत में बनने वाले मिर्च से भरे मांसाहारी सालन दुनिया भर में चर्चा का विषय हैं.
इन क़िस्सों को जानकर कभी आपके मन में ये ख़याल नहीं आता कि आख़िर कुछ व्यंजन तीखेपन की रेस में क्यों दौड़ते हैं क्योंकि कुछ डिश तो ऐसी होती हैं, जो बिना तीखी लगे भी बेहद स्वादिष्ट बनती हैं.
मसालेदार खाना
ये सवाल कई बरस से मानवविज्ञानियों और खान-पान के इतिहासकारों को परेशान किए हुए है. यूं तो आम तौर पर गर्म आबो-हवा वाले देशों में लोगों का खान-पान तीखा और मसालेदार होता है. इसकी वजह शायद ये होती है कि मिर्च-मसालों में बीमारियों से लड़ने की ताक़त होती है.
एक सर्वे से पता चला है कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ रहा है, दुनिया के कई हिस्सों में लोग तीखा और मसालेदार खाना पसंद करने लगे हैं. पहले ऐसा नहीं था. गर्म तापमान वाली जगहों पर मिर्च-मसालों की मदद से खाने को देर तक ख़राब होने से बचाया जाता था. आज तो ख़ैर हर चीज़ को फ़्रिज में डालकर लंबे वक़्त तक इस्तेमाल किया जा सकता है.
तीखा-मसालेदार खाना खाने की एक वजह ये भी हो सकती है कि इससे लोगों को पसीना आता है. ये पसीना हमें गर्म मौसम में ठंडा रखने में मददगार होता है. लेकिन जिन इलाक़ों में हवा में गर्मी के साथ नमी भी रहती है, वहां ये नुस्खा बेअसर ही रहता है क्योंकि शरीर से निकलने वाला पसीना हवा से सूखेगा नहीं और हमें ठंडा महसूस नहीं होगा.
एक रिसर्च से पता चला है कि वर्ज़िश के बाद जो लोग गर्म पानी पीते हैं, उनके शरीर का तापमान ठंडा पानी पीने वालों के मुक़ाबले ज़्यादा जल्दी से गिरता है.
काली मिर्च से मशहूर था भारत
वैसे, मिर्च भारत जैसे गर्म देशों की उपज नहीं है. पहले ये सिर्फ़ अमरीकी महाद्वीप में मिलती थी. लेकिन यूरोपीय लोगों के साथ ये पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में पूरी दुनिया में फैल गई. इससे पहले अदरख, काली मिर्च और दालचीनी जैसे तीखे मसाले पूर्वी देशों से यूरोप तक पहुंचे थे. भारत तो काली मिर्च की वजह से ही यूरोपीय देशों में मशहूर था.
मसालेदार खाना कोई हालिया उपज नहीं. अठारहवीं सदी में छपी एक ब्रिटिश कुक बुक में भी जावित्री, जायफल और लौंग के इस्तेमाल का ज़िक्र है. हालांकि बाद में ब्रिटेन में इन मसालों का प्रयोग बहुत कम हो गया था.
जानकार मानते हैं कि यूरोपीय देशों में सत्रहवीं सदी के आते-आते मसालों के दाम बहुत गिर गए थे. आसानी से मुहैया होने की वजह से हर कोई खाने में मसालों का इस्तेमाल करने लगा था. इसीलिए रईसों ने मसालों के इस्तेमाल से मुंह फेर लिया. एक साथ ढेर सारे मसालों वाला खाना खाना यूरोप के अमीरों के बीच असभ्यता की निशानी बन गया. इसी वजह से यूरोपीय देशों में मसालेदार खान-पान कम हो गया. अमीर लोग एक या दो मसाले वाले व्यंजनों पर ज़ोर देने लगे.
मिर्च के बग़ैर खाना बेस्वाद
असल में किसी भी जीव की तरह पहले हम चखकर ये देखते हैं कि कोई चीज़ खाने लायक़ है या नहीं. जब हमारी ज़ुबान को ये पता हो जाता है कि किसी चीज़ को खाना ख़तरनाक नहीं है, तो हम उसके आदी होने लगते हैं. बहुत से लोगों को मिर्च का तीखापन लुभाता है. मिर्च के बग़ैर खाना उन्हें बेस्वाद लगता है.
आज मिर्च-मसालों वाला खाना पश्चिमी देशों में भी ख़ूब लोकप्रिय हो रहा है. शायद इसका ताल्लुक़ स्वाद से ज़्यादा मौज-मस्ती से है. मिर्च खाने की वजह से हमारी ज़ुबान पर आग-सी लग जाती है. हमें पसीना आने लगता है. कई बार लोगों को उल्टी भी आने लगती है.
बहुत से लोगों को इसमें मज़ा आता है. तुर्शी का वो लुत्फ़ उठाते हैं. वो ये दावा कर सकते हैं कि वो तीखी से तीखी मिर्च बर्दाश्त कर सकते हैं.
यानी आज तीखे, मसालेदार खाने को पसंद करने के पीछे कोई वैज्ञानिक वजह नहीं. हम ये सोचकर तीखा नहीं खाते कि मसालों में कीटाणुओं से लड़ने की ताक़त भी होती है.
आज तो होड़ इस बात की लगती है कि कौन सबसे ज़्यादा तीखे गोलगप्पे खा सकता है.
तो, क्या आप भी तीखी रेस में शामिल होने को तैयार हैं?
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