कोरोना वायरसः बिना सूरज की रोशनी में कैसी होती है ज़िंदगी

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- Author, स्वामीनाथन नटराजन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए पूरी दुनिया में लोगों से अपने घरों के अंदर ही रहने के लिए कहा जा रहा है.
कुछ लोग जो पहले से किन्हीं बीमारियों से पीड़ित हैं उन्हें 12 हफ़्तों तक घर से बाहर नहीं निकलने की सलाह दी गई है.
कई लोगों के लिए तीन महीने तक घर की दहलीज़ में क़ैद और सूरज की रोशनी से दूर रहना बेहद मुश्किल भरा हो सकता है.
कोरोना वायरस की वजह से लोगों को अपने घरों में क़ैद रहना पड़ रहा है.
ऐसे में कई लोगों के लिए बाहर सूरज की रोशनी नहीं देख पाना एक मुश्किल भरा अनुभव साबित हो रहा है.
लेकिन, हर साल सैकड़ों वैज्ञानिक आर्कटिक और अंटार्कटिका जाते हैं.
वे वहां बेहद ठंडे और तकलीफ़देह मौसम में कई तरह के एक्सपेरिमेंट करते हैं.
इन लोगों को महीनों तक वहां सूरज की रोशनी के बिना रहना पड़ता है.
ये लोग इससे कैसे निबटते हैं?
ऐसे ही एक वैज्ञानिक विष्णु नंदन ने बीबीसी को बताया, "शुरुआती कुछ दिनों के लिए मुझे सूरज की रोशनी की कमी खली. इस दौरान मुझे इसके बिना रहने के लिए ख़ुद को ढालने में मुश्किल हुई. जल्द ही मैं इसके मुताबिक़ ढल गया और मुझे अंधेरे में रहने की आदत हो गई."
डॉ. नंदन सी आइस रिमोट सेंसिंग साइंटिस्ट हैं.
वो कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनिटोबा के सेंटर फ़ॉर अर्थ ऑब्ज़र्वेशन साइंस (सीईओएस) में पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्चर हैं.

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दुनिया के एकमात्र आर्कटिक क्लाइमेट रिसर्च अभियान में काम करने वाले वो इकलौते भारतीय थे.
इस अभियान को मोज़ाइक (एमओएसएआईसी) के नाम से जाना जाता है.
अलग-अलग देशों के क़रीब 60 वैज्ञानिक इसका हिस्सा रहे थे.
ये लोग जर्मन रिसर्च आइसब्रेकर आरवी पोलरस्टर्न पर रहे थे.
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बायोलॉजिकल क्लॉक
आर्कटिक क्षेत्र में पहुंचने के बाद इस अभियान से जुड़े सदस्यों ने अपनी जैविक घड़ियों यानि सोने जाने और जागने के वक़्त को मॉस्को के वक़्त के हिसाब से ढाल लिया.
लेकिन, यह आसान नहीं था. और इनके शरीरों ने तत्काल इस बदलाव को लेकर प्रतिक्रिया करना शुरू कर दिया.
नंदन ने बीबीसी को बताया, "मेरी बॉयोलॉजिकल क्लॉक स्टेबल नहीं थी. कुछ दिनों तक मैं नाश्ते के लिए भी नहीं उठा. कई बार मैं बहुत जल्दी सोने चला जाता था, जबकि कुछ दफ़ा मैं देर रात तक जागता रहता था."
नंदन हाल में ही आर्कटिक से 127 दिन लंबे अभियान के बाद वापस लौटे हैं.
क्रायोस्फ़ियर रिसर्च (पृथ्वी के जमे हुए पानी वाले हिस्से का अध्ययन) में अपने 7 साल से ज़्यादा लंबे करियर के दौरान वो आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों में क़रीब 15 बार गए हैं.
वो कहते हैं, "आपको सूर्योदय और सूर्यास्त देखने को नहीं मिलते हैं. कुछ दिन तक सोकर उठने के बाद मुझे काफ़ी थकान महसूस होती थी."
नंदन के मुताबिक़, "जब आप बाहर देखते हैं तो वहां अंधेरा होता है और आपका शरीर आपको जागने नहीं देता है."

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नींद और स्वास्थ्य
शरीर के लिए ज़रूरी विटामिन डी देने के अलावा सूर्य की रोशनी आपका मूड भी अच्छा करती है.
दिन और रात के बीच कोई साफ़ फ़र्क नहीं होने के चलते शरीर की सामान्य गति गड़बड़ा जाती है.
नींद में इस तरह के असंतुलन से आप थकान और चिड़चिड़ाहट महसूस करते हैं.
अगर हफ़्तों और महीनों तक ऐसा जारी रहे तो आपकी सेहत पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.
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सर्दियों के दौरान यानी अक्टूबर की शुरुआत से मार्च के अंत तक उत्तरी ध्रुव अंधेरे में डूबा रहता है.
नंदन ने कहा, "मुझे बहुत कम सोने वाले कॉक्रोच की तरह लग रहा था. कम नींद के चलते मैं थका हुआ रहता था. कई दफ़ा तो मुझे दोपहर में काम करने के लिए भी ख़ुद को मोटिवेट कर पाने में मुश्किल होती थी."
बाहर का मौसम बेहद सख़्त था. तापमान माइनस 55 डिग्री सेल्शियस तक चला जाता था और तेज़ हवाएं चलती थीं.
ध्रुवों पर रहने का बड़ा अनुभव रखने वाले नंदन को सख़्त अंधेरे के उलट मौसम का भी अनुभव है.
गर्मियों के दौरान पोल्स पर लगातार सूरज की रोशनी पड़ती है.
नंदन कहते हैं, "जब आपको 24 घंटे सूरज की रोशनी मिलती है तो आपमें सुबह काफ़ी एनर्जी रहती है, लेकिन शाम के वक़्त आप बुरी तरह से टूट जाते हैं. अगर आधी रात को मेरी नींद टूट जाती थी तो मैं वापस सो नहीं पाता था."

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बेहद चौकन्ने
एडवांस्ड इंस्ट्रुमेंट्स से लैस रिसर्च लैब वाला तैरता पोलरस्टर्न मोज़ाइक वैज्ञानिकों का घर था. इस पोलरस्टर्न ने एक रिकॉर्ड बनाया.
23 फ़रवरी को यह इतना आगे तक गया कि यह भौगौलिक उत्तरी ध्रुव से केवल 156 किलोमीटर दूर ही रह गया.
नंदन बताते हैं, "ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई शिप इतने बुरे सर्द मौसम में नॉर्थ में इतना आगे तक गया."
नंदन राडार सैटेलाइट्स और सरफ़ेस-बेस्ड राडार सेंसर्स का इस्तेमाल समुद्री बर्फ़ की मोटाई नापने के लिए करते हैं.
समुद्री बर्फ़ ही दुनिया के सबसे बड़े धरती पर रहने वाले शिकारी ध्रुवीय भालू का घर होती है.
नंदन ने कहा, "एक बार ऐसा हुआ कि एक भालू हमारी साइट पर आ गया और हमारे इंस्ट्रूमेंट्स से खेलने लगा."

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सुरक्षित रहने के लिए इनके पास राइफ़लों से लैस लोग होते हैं जो कि भालुओं पर नज़र रखते हैं.
विष्णु कहते हैं कि बेहद सख़्त माहौल ने उनके सचेत रहने का स्तर और बढ़ गया.
उन्होंने कहा, "जब आप 24 घंटे अंधेरे में रहते हैं तो आप कहीं ज़्यादा सावधान रहते हैं."
इसकी वजह से उन्हें अपने रोज़ाना के रुटीन को कायम रखने में मदद मिली.
ब्रेकफ़ास्ट के बाद उनकी टीम फ़ील्ड लैब में काम पर निकल जाती थी. इसी लैब में उनके इंस्ट्रूमेंट्स लगे थे.
ज़्यादातर बार ऐसा होता था कि भूख नहीं होने के चलते नाश्ता बिना किए ही वैज्ञानिक काम पर निकल जाते थे.
ये लोग लंच के लिए शिप पर लौटते थे और फिर से चार घंटे के लिए फ़ील्ड वर्क पर निकल जाते थे.
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आराम का वक़्त
वो कहते हैं, "जब आप बर्फ़ पर होते हैं तो आप ऊर्जा ख़र्च करते हैं और आपका शरीर कैलोरीज़ ख़त्म करता है. मैंने चार महीनों में 10 किलो वज़न घटाया है."
शिप पर मौजूद किचन में उन्हें रेगुलर खाना मुहैया कराया जाता था.
इसके अलावा कुछ टीम मेंबर खाना बनाने में भी दिलचस्पी दिखाते थे.
विष्णु ने वेजिटेबल बिरयानी और पालक टोफ़ू करी बनाई थी. साथ ही उन्होंने बेक्ड तंदूरी चिकेन और फ़िश भी पूरी टीम के लिए बनाई.
टीम को फ़ोकस्ड रखने में मनोरंजन की भी अहमियत थी. हफ़्ते में तीन बार उनके लिए बार नाइट्स होती थीं और आराम के वक़्त के दौरान ये लोग गेम्स खेलते थे.
टीम क्रिसमस और नए साल के मौक़ों को सेलिब्रेट भी करती थी. इस दौरान विष्णु का जन्मदिन भी मनाया गया.
इसके बावजूद, आइसोलेशन में रहने के अपने नुकसान हैं.
उन्होंने कहा, "फ़रवरी के आसपास कई लोग बहुत ज़्यादा काम की वजह से बुरी तरह से थक गए थे."

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ध्रुव से लॉकडाउन तक
नॉर्थ पोल से दूर निकलने के बाद ही विष्णु नंदन को सूरज की पहली किरण देखने को मिली.
नंदन ने कहा, "मुझे अंधेरे से चिढ़ नहीं है, शिप पर यही हमारा जीवन होता है."
जब वह कनाडा के काल्गरी में वापस लौटे तो उन्हें पता चला कि पूरी दुनिया लॉकडाउन में है. कनाडा में दाख़िल हो रहे बाकी लोगों की तरह से ही उन्हें भी सेल्फ़-आइसोलेशन में जाने के लिए कहा गया.
सख़्त स्थितियों में जीवन से आपको पाबंदियों में रहने में ज़्यादा मुश्किलें नहीं आती हैं.
वो कहते हैं, "शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए आपको जिम जाने की ज़रूरत नहीं है. आप घर पर एक्सरसाइज़ कर सकते हैं और इसके लिए कई अच्छे वीडियोज़ मौजूद हैं."

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नंदन के मुताबिक, कुछ देशों में लोगों को लॉकडाउन के दौरान दिन में एक बार एक्सरसाइज़ करने की इजाज़त है. लेकिन, जो लोग घर से बाहर नहीं निकल सकते, उन्हें ख़ुद को व्यस्त रखना चाहिए.
वो कहते हैं, "घर पर कोई न कोई काम ज़रूर करिए. हमारे जीवन का यही वक़्त ऐसा है जब हम आपाधापी वाली व्यस्तता में नहीं हैं. ऐसे में इस वक़्त का बढ़िया इस्तेमाल कीजिए."
वो कहते हैं कि लोगों को भूखे रहने की आदत डालनी चाहिए ताकि वे कठिन परिस्थितियों में टिक सकें.
वो कहते हैं, "यह ज़िंदगी के रीसेट होने जैसा है. तकरीबन एक आख़िरी लड़ाई जैसा."

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