हॉन्गकॉन्ग क्यों बना लुप्तप्राय जानवरों का ठिकाना

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- Author, लूसी जोन्स
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
जैसे-जैसे शहरों का दायरा और आबादी बढ़ रही है, शहरों के आस-पास रहने वाले जंगली जानवरों के लिए चुनौती बढ़ती जा रही है. उनके इलाक़ों में इंसान का दखल बढ़़ता जा रहा है. नतीजा ये कि उन्हें अब ख़ुद को नए माहौल के हिसाब से ढालना पड़ रहा है.
इक्कीसवीं सदी के इंसान के साथ रहना मामूली चुनौती नहीं है. लेकिन, कुछ जानवरों ने इस चुनौती को स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उससे पार भी पाया है.
इसके लिए इन जानवरों को अपने खान-पान से लेकर बर्ताव तक में बदलाव लाना पड़ा है. कुछ जंगली जानवर तो पूरी तरह से शहरी हो गए हैं.
ब्रिटेन की लाल चील
शहर के आसमान में दो मीटर तक पंख फैलाए बड़े से परिंदे को देखना चौंकाने वाला मंज़र होता है. ऐसा पंछी जब बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स से लेकर बहुमंज़िला इमारतों और सुपरमार्केट के ऊपर मंडराने लगे, कंक्रीट के जंगल के बीच फ़ुर्ती से शिकार करता दिखे, तो नज़ारा अद्भुत हो जाता है.
लाल चीलों की नस्ल को फिर से आबाद करने की कोशिशों के चलते आज ये पंछी इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के बहुत से शहरों में देखा जा सकता है.

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इस चील का खाना अक्सर फेंका हुआ मांस होता है. शहरों में इसके लिए सड़े हुए मांस का जुगाड़ करना आसान होता है. सड़कों के किनारे, कचरों के ढेर में से मांस तलाशना, इस चील को अब रास आने लगा है. रीडिंग नाम के शहर में तो लोगो ने जान-बूझकर मांस के टुकड़े बाहर कचरे के साथ फेंकने शुरू किए थे, ताकि इस चील को आसानी से शिकार मिल सके. मांस की तलाश में लाल चीलें अक्सर आसमान से तेज़ी से ज़मीन पर झपट्टा मारती देखी जाती हैं.
हालांकि चील का ये हमलावर अंदाज़ सब को पसंद नहीं आता. कई लोगों ने मांस के साथ कीटनाशक मिलाकर रख दिए, जिससे इनमें से कई चीलों की मौत हो गई. यही वजह है कि लाल चीलों की आबादी में तेज़ी से इज़ाफ़ा नहीं हो रहा है.
हालांकि एक दौर ऐसा था, जब शहरी इलाक़ों में चीलों का देखा जाना बहुत आम बात थी. शेक्सपीयर ने लंदन को चीलों और कौवों का शहर कहा था. हालांकि बार्ड ऑफ़ एवन के दौर के बाद की सदियों में इन्हें शहरों से मिटा दिया गया. लेकिन, लाल चीलें एक बार फिर शहरों में आशियाना बनाने को लौट आई हैं.


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बर्लिन के जंगली सुअर
जर्मनी की राजधानी बर्लिन में जंगली सुअरों का दिखना आम बात है. अपने मज़बूत धड़ और तेज़ दांतों के लिए मशहूर इन सुअरों के धारीदार बच्चे देखने में प्यारे लगते हैं. अगर आप बर्लिन के मशहूर एलेक्ज़ेंडरप्लात्ज़ शॉपिंग स्क्वॉयर पर खड़े हों, तो ये सुअर आप को आसानी से दिख जाते हैं.
इन्हें शहर के दूसरे हिस्सों में भी घूमते हुए देखा जा सकता है. कहा जाता है कि इस वक़्त बर्लिन में क़रीब तीन हज़ार जंगली सुअर आबाद हैं. बर्लिन के आस-पास के जंगलों में भी ये जानवर ख़ूब पाए जाते हैं.
कई बार इन सुअरों की वजह से सड़क हादसे भी होते हैं. इनके झुंड पार करते वक़्त ट्रैफिक रुक जाता है. इन सुअरों की इंसानों और कुत्तों से झड़पें भी हो जाती हैं. यही वजह है कि जर्मनी के पर्यावरण संगठन एनएबीयू को अक्सर इन जंगली सुअरों की शिकायतें मिल जाती हैं.
बर्लिन में केवल एक शख़्स को इन सुअरों को मारने का लाइसेंस है. इनके शिकार की मनाही है. और इन्हें शिकार बनाने वाले जानवरों की कमी. नतीजा ये कि बर्लिन में जंगली सुअरो की आबादी और बढ़नी तय है.

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हांगकांग के पीली कलंगी वाले तोते
हांगकांग में इन कलंगी वाले तोतों को कोकातू कहते हैं. इस परिंदे का पूरा शरीर सफ़ेद होता है, सिवाए कलंगी के. ये तोता दुनिया के दुर्लभ जीवों में से एक है. इसकी नस्ल के ख़ात्मे का अंदेशा है. वजह ये है कि इन पालतू बनाए जा सकने वाले तोतों की दुनिया भर में भारी डिमांड है.
शहरीकरण और कीटनाशकों की वजह से इनकी आबादी घटती जा रही है. इन्हें आसानी से खाना नसीब नहीं होता. और बारिश भी इनकी दुश्मन है. मगर पीली कलंगी वाले ये तोते हांगकांग के शहरी नज़ारे का अहम हिस्सा हैं.
आज की तारीख़ में इस प्रजाति के केवल 200 तोते हांगकांग में बचे हैं. हांगकांग का प्रशासन इन्हें बचाने के लिए बहुत जद्दोज़हद कर रहा है. यही वजह है कि शहरीकरण के बावजूद ये तोते आसानी से हांगकांग में दिख जाते हैं.


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अमरीका के छोटे भेड़िए
न्यूयॉर्क में किसी भेड़िए की बिलबिलाहट सुनना अब लोगों के लिए चौंकाने वाली बात नहीं रह गई है. उत्तरी अमरीका के इन भेड़ियों ने शहरों में इंसानो के साथ रहना सीख लिया है. इनसे आकार में बड़े भेड़ियों के ख़ात्मे की वजह से पर्यावरण के चक्र में जो ख़ालीपन आया था, उसे इन छोटे भेड़ियों ने भर दिया है.
2015 में इस भेड़िए जिसे अमरीका में कोयोट कहते हैं, की क्वींस इलाक़े की एक छत पर खड़े होने की तस्वीर वायरल हो गई थी. कोयोट अक्सर न्यूयॉर्क के खंडहरों में आशियाना बनाकर रहते हुए देखे जा सकते हैं. एक बार हाल नाम का ये छोटा भेड़िया न्यूयॉर्क के मशहूर सेंट्रल पार्क में टहलता देखा गया था.
ये भेड़िये ख़रगोश और चूहों का शिकार करते हैं. लेकिन, न्यूयॉर्क में इन्होंने कचरे में फेंके गए खाने को भी अपना भोजन बनाना शुरू कर दिया है. इनकी बड़ी आबादी ने अमरीका के कई राज्यों के शहरों में ठिकाने बना लिए हैं. इन्हें शिकागो से लॉस एंजेलेस और बोस्टन से ऑस्टिन तक देखा जाता है.

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मुंबई के तेंदुए
मुंबई के संजय गांधी नेशनल पार्क में 35 से 41 के बीच तेंदुए रहते हैं. ये पार्क मुंबई शहर के बाहर है. चमकीली रोशनी में घूमते तेंदुओं की तस्वीर हम कई बार मीडिया में देख चुके हैं. भारत के सबसे ज़्यादा आबादी वाले शहर मुंबई में लोमड़ियों और दूसरे छोटे जानवरों के अलावा तेंदुए का देखा जाना आम घटना हो गई है. कई बार तेंदुए इंसानों पर भी हमला कर देते हैं.
असल में तेंदुए के रहने के इलाक़ों पर लगातार इंसान का क़ब्ज़ा होता जा रहा है. नतीजतन ये शहरी इलाक़ों का रुख़ कर रहे हैं. लेकिन तेंदुओं के शहर की तरफ़ आने से बच्चो और बड़ो के लिए घर से बाहर निकलना दूभर हो जाता है.
हालांकि, एक हालिया रिसर्च बताती है कि ये तेंदुए इंसानों को रेबीज़ नाम की बीमारी से बचाते हैं. क्योंकि इनमें से ज़्यादातर कुत्तों को अपना शिकार बनाते हैं. और ये कुत्ते ही अक्सर रेबीज़ का वायरस फैलने की वजह बनते हैं, तो, तेंदुए अगर शहर में आते हैं, तो उससे भी इंसानों का भला होता है.


(नोटः ये लूसी जोन्स की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)
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