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तेज़ रफ़्तार सफ़र का भविष्य क्या है?
- Author, लूसी जोन्स
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
जब 2003 में आवाज़ से भी दोगुनी तेज़ रफ़्तार से उड़ने वाला विमान 'कॉन्कॉर्ड' रिटायर किया गया, तो ऐसा लगा कि हम तेज़ रफ़्तार सफ़र की उल्टी दिशा में चल पड़े हैं.
फ्रांस और ब्रिटेन का ये साझा शाहकार बंद होने का मतलब था इंसान के एक सपने का अवसान.
जब दुनिया दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से तकनीक की तरक़्क़ी की छलांगें लगा रही हो, तो, कॉन्कॉर्ड जैसे तकनीकी शाहकार की मंज़र से विदाई अजीब लगती है.
हालांकि कॉन्कॉर्ड के रिटायर होने की वजह सिर्फ़ तकनीक नहीं थी. इससे सफ़र करना बहुत महंगा था. ये शोर बहुत करता था. फिर जो लोग इस महंगे सफ़र का बोझ उठा सकते थे, उनके सामने वीडियो कॉल से मीटिंग करने का विकल्प आ चुका था.
जब आप स्काइप से दूर बैठे लोगों से रूबरू हो सकते हैं, तो वहां उड़ कर जाने की क्या तुक?
फिर भी, दुनिया भर के इंजीनियर इंसान के सफ़र की रफ़्तार को तेज़ करने के तरीक़े तलाश रहे हैं.
हाइपर लूप ट्रेन
इंजीनियरों की यात्रा की रफ़्तार तेज़ करने की कोशिशों का एक नतीजा है हाइपरलूप ट्रेन. ये ट्रेनें लोगों को लंदन से स्कॉटलैंड केवल 45 मिनट में पहुंचाने का वादा कर रही हैं. हाइपरलूप ट्रेन एक बंद ट्यूब में दौड़ने वाली ट्रेन होती है, जिसमें हवा के ख़िलाफ़ दौड़ने की चुनौती ख़त्म हो जाती है.
इस वजह से किसी भी गाड़ी को तेज़ स्पीड से दौड़ाया जा सकता है. खुले माहौल में चलने पर हवा की ताक़त से लड़ना पड़ता है. बंद ट्यूब में किसी गाड़ी को दौड़ाने पर उसे हवा के ख़िलाफ़ ताक़त नहीं लगानी पड़ती. सो, सफ़र की स्पीड तेज़ हो जाती है.
एलन मस्क की कंपनी टेस्ला और स्पेसएक्स के इंजीनियर इस ट्रेन को पूरी तरह से विकसित करने के लिए पिछले कुछ सालों से मशक्कत कर रहे हैं.
ये हाइपरलूप ट्रेनें रफ़्तार वाले सफ़र का अच्छा विकल्प हो सकती हैं. सुनने में तो कम से कम ऐसा ही लगता है. मगर, मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग के लेक्चरर मार्क क्विन कहते हैं कि बात इतनी आसान भी नहीं.
क्विन के मुताबिक़,'पहले भी ऐसे विकल्प आज़माए गए हैं, मगर वो तकनीकी चुनौतियों से पार नहीं पा सके. इसकी सबसे बड़ी चुनौती है कि लंबी ट्यूब या पाइप में लगातार हवा का दबाव कम बनाए रखना. इसमें बहुत ईंधन ख़र्च होगा. ऊर्जा महंगी होगी.'
हाइपरलूप ट्रेन की दूसरी चुनौती है इसकी जगह. अब अगर किसी ऐसी जगह पर इसकी ट्यूब बिछाई जाती है, जहां धरती के भीतर उथल-पुथल या हलचल होती रहती है. तो, वहां आवाज़ से भी तेज़ रफ़्तार से ट्रेन दौड़ाने के लिए दूसरी भौगोलीय चुनौतियां भी झेलनी होंगी. फिर आवाज़ से भी तेज़ रफ़्तार से गाड़ी दौड़ाने का मतलब शोर बहुत होगा. थरथराहट होगी, दबाव ज़्यादा होगा. ऐसी गाड़ी को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल होगा.
मार्क क्विन कहते हैं कि, 'एलन मस्क ने इस चुनौती से निपटने के लिए सुझाया कि वो ट्रेन के आगे बड़ा सा कंप्रेसर लगा दें. ये हाइपरलूप ट्रेन के सामने से आ रही हवा को खींच कर इसे पीछे की तरफ़ धकेलेगा. मगर इसका ये मतलब होगा कि आप ख़ुद को ज़मीन के भीतर चल रही जेट इंजन वाली ट्रेन में सवार करेंगे. फिलहाल इसके नियम क़ायदे दुनिया में कहीं नहीं बने हैं.'
इन चुनौतियों से पार पाने के हालात फिलहाल तो नहीं दिख रहे हैं.
सुपरसोनिक उड़ान
स्पीड वाले सफ़र का दूसरा तरीक़ा हो सकता है, सुपरसोनिक उड़ान. बूम सुपरसोनिक नाम की छोटी सी कंपनी, सुपरसोनिक उड़ान के परीक्षण कर रही है. इस कंपनी को रिचर्ड ब्रैनसन से भी मदद मिल रही है.
कॉन्कॉर्ड के ज़माने से ये सुपरसोनिक तकनीक काफ़ी बेहतर हो गई है. अब ऐसे विमान चार के बजाय तीन इंजनों की मदद से ही उड़ान भर सकेंगे.
सुपरसोनिक विमानों के साथ सब से बड़ी चुनौती ये है कि ये जब ज़मीन के क़रीब होते हैं तो बहुत शोर मचाते हैं. अमरीकी अंतरिक्ष कंपनी कम शोर वाली सुपरसोनिक तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रही है.
नासा के इंजीनियर कम शोर मचाने वाले यात्री विमान को विकसित करने में जुटे हैं. नासा के एरोनॉटिक रिसर्च मिशन के सह प्रशासक जयवोन शिन ने 2016 में कहा था कि, 'एक सुपरसोनिक एक्स विमान विकसित कर के जनता को सुपरसोनिक सफ़र मुहैया कराने की दिशा में हमारा अगला कदम है.'
अप्रैल 2018 में अमरीकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन को प्रयोग के लिए एक्स-प्लेन बनाने का ठेका दिये जाने का एलान किया गया था.
हाइपरसोनिक सफ़र
हाल के दिनों में हाइपरसोनिक सफ़र के क्षेत्र में भी काफ़ी रिसर्च हो रहा है. हाइपरसोनिक सफ़र का मतलब है माक-5 यानी आवाज़ से पांच गुना तेज़ रफ़्तार स्पीड.
हालांकि अभी ये रिसर्च मिसाइल तकनीक विकसित करने के लिए ही हो रहा है. जर्मनी में इंजीनियर स्पेसलाइनर नाम के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. ये यात्री स्पेस प्लेन होगा.
हालांकि फिलहाल इस प्रोजेक्ट के पास पैसे की कमी बताई जा रही है. रिसर्च के लिए पैसे आ भी जाएंगे, तो भी ऐसे विमान को तैयार होने में कई दशक लगेंगे. सबसे बड़ी चुनौती तो आवाज़ पर क़ाबू पाने की होगी.
इन विकल्पों के बारे में जानने के बाद लगता है कि बहुत तेज़ स्पीड वाले सफ़र का ख़्वाब अभी बहुत दूर है. लेकिन, इस ख़्वाब को पूरा करने में स्क्रैमजेट और रैमजेट तकनीक मददगार हो सकती है.
रैमजेट में बिना कंप्रेसर के सामने से आ रही हवा को दबा दिया जाता है. सुपरसोनिक स्पीड के दौरान इस हवा का तापमान काफ़ी बढ़ जाता है.
मार्क क्विन कहते हैं कि, 'ये तकनीक कम से कम सुनने में बेहतर लग रही है. मगर चुनौती ये है कि जब आप तेज़ी बढ़ाते हैं, तो तापमान भी बढ़ जाता है. जब हवा का तापमान 2000 केल्विन तक पहुंच जाता है, तो होता ये है कि हवा में मौजूद ऑक्सीजन या नाइट्रोजन जलने लगती है.'
इस चुनौती का विकल्प है स्क्रैमजेट. इसमें हवा को एक बड़े झटके से धीमा करने के बजाय उसे छोटे-छोटे झटकों से धीमा किया जाता है. इससे सुपरसोनिक स्पीड बनी रहती है और हवा बहुत गर्म भी नहीं होती.
तेज़ रफ़्तार सफ़र की एक और चुनौती है इससे होने वाला प्रदूषण. इसके लिए हाइड्रोजन को ईंधन के तौर पर इस्तेमाल करने का विकल्प सुझाया गया है. क्योंकि हाइड्रोजन के जलने से कार्बन डाई ऑक्साइड नहीं पैदा होती. हालांकि हाइड्रोजन तैयार करना बहुत महंगा सौदा है.
मार्क क्विन कहते हैं कि, 'अगर बिजली तैयार करने का ऐसा तरीक़ा मिल जाए, जो कम प्रदूषण पैदा करे और सस्ता भी हो, तो हाइड्रोजन को पानी से अलग कर के ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. फिलहाल ये विकल्प भी कोसों दूर है'.
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