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परोपकार का भी कोई फॉर्मूला होता है?
- Author, माइकल रेनियर
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
क्या आपको पता है कि किसी की मदद करने का, परोपकार का कोई फॉर्मूला भी होता है?
यह बात यक़ीन से कही जा सकती है कि आपका जवाब ना में होगा. आप उल्टा सवाल करेंगे कि क्या दूसरों की भलाई करना कोई गणित है, जो उसका फॉर्मूला होगा!
मगर एक शख़्स इस दुनिया में ऐसा हुआ, जिसने परोपकार का फ़ॉर्मूला ईजाद किया. यही नहीं उस फ़ॉर्मूले को सही साबित करने के लिए उसने अपना सब कुछ दूसरों पर न्यौछावर कर दिया. यहां तक कि अपनी जान की बाज़ी भी लगा दी.
उस शख़्स का नाम था जॉर्ज प्राइस. जॉर्ज प्राइस का जन्म 1922 में न्यूयॉर्क में हुआ था. वो अपनी कक्षा के ही नहीं पूरे स्कूल के सबसे तेज़ बच्चे थे.
अंकों से खेलना उनका शौक था. गणित और विज्ञान की तरफ़ झुकाव के चलते ही प्राइस का धर्म और ईश्वर पर से यक़ीन उठ गया. वे घोर नास्तिक हो गए.
शिकागो यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद प्राइस अमरीका के मशहूर मैनहटन प्रोजेक्ट से जुड़ गए, जिसमें अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा ने मिलकर एटम बम बनाया था. इसी प्रोजेक्ट के दौरान प्राइस की मुलाक़ात जूलिया से हुई. दोनों ने शादी कर ली.
प्रोजेक्ट के ख़त्म होने के बाद प्राइस ने तमाम नौकरियां कीं. मगर उन्हें तसल्ली ही नहीं होती थी. हर काम उन्हें अपनी क़ाबिलियत से कमतर लगता था. प्राइस का दिमाग हर जगह लग जाता था.
वे अर्थशास्त्र से लेकर केमेस्ट्री और जीव विज्ञान तक में दखल देते थे. तमाम मसलों पर अपनी राय ज़ोरदार तरीके से रखते थे. एक बार तो उन्होंने विश्व शांति के लिए बाक़ायदा एक योजना तैयार करके अमरीकी संसद को भेजी थी.
पेशेवर ज़िंदगी में उथल-पुथल मची हुई थी. इसी बीच दो बेटियां, एनामरीन और कैथरीन के होने के बाद प्राइस का जूलिया से तलाक़ हो गया. क्योंकि प्राइस नास्तिक थे और जूलिया कट्टर रोमन कैथोलिक थीं.
अमरीका में अपनी ज़िंदगी से तंग आकर जॉर्ज प्राइस 1967 में लंदन चले आए. उन्हें लगता था कि उनके पास ख़ुद को जीनियस साबित करने के लिए बहुत कम वक़्त बचा है.
लंदन में उन्होंने अपने लिए एक सवाल खोजा कि आख़िर इंसान परिवार में क्यों रहते हैं. आख़िर पिता की ज़रूरत क्या है किसी परिवार में? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशते हुए उनके सामने सवाल आ खड़ा हुआ कि आख़िर दूसरों की भलाई का जज़्बा कैसे पैदा हुआ?
इस बारे में तमाम बातें पढ़ते हुए ही जॉर्ज ने प्राइस समीकरण ईजाद किया.
इस फॉर्मूले के ज़रिए प्राइस ने दुनिया को बताया कि आख़िर क़ुदरत में वे जीव ही आगे क्यों बढ़ते हैं जिनके पास ज़्यादा ख़ूबियां होती हैं. जॉर्ज प्राइस के फॉर्मूले के मुताबिक़, कोई भी ख़ूबी (z) जो सेहत (w) को बेहतर करती है, उससे जनसंख्या बढ़ेगी. फिर चाहे वो इंसान की हो, किसी और जानवर की या पेड़-पौधों की.
अगर किसी गुण की वजह से सेहत कमज़ोर होती है तो जनसंख्या भी कम होगी. अपना ये फॉर्मूला लेकर सितंबर 1968 को जॉर्ज प्राइस जा पहुंचे लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की मशहूर गैल्टन लैब में. पहले तो उन्हें किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. मगर जब प्राइस ने अपना फॉर्मूला वहां के वैज्ञानिकों को समझाया तो उन्हें फौरन नौकरी दे दी गई.
साल 1974 तक उनके पास कुछ नहीं बचा था. 6 जनवरी 1975 को जॉर्ज ने ख़ुद को गोली मारकर जान दे दी.
हालांकि जॉर्ज की कहानी इतनी साधारण नहीं थी. ब्रिटेन की लॉरा फैनवर्थ ने जॉर्ज के बारे में रीडर्स डाइजेस्ट में पढ़ा था. उन्हें जॉर्ज पर नाटक करने की सूझी.
लॉरा को पता चला कि तलाक़ के क़रीब एक दशक बाद 1966 में जॉर्ज का एक ट्यूमर हटाने के लिए ऑपरेशन हुआ था. इसे उनके एक दोस्त ने किया था. ट्यूमर तो हट गया मगर इस दौरान एक नस कट गई और ट्यूमर हटाने के लिए उनकी थायराइड ग्रंथि को पूरी तरह से हटाना पड़ा.
इस वजह से उन्हें लगातार थाइरॉक्सिन नाम की दवा लेनी पड़ती थी, ताकि थायराइड की कमी से निपट सकें. कई बार वो दवा लेना बंद करते थे. जिससे वो डिप्रेशन में चले जाते थे.
तलाक़ के बाद भी वो अपनी बेटियों से जुड़े रहे थे. भलाई का फ़ॉर्मूला खोजने से पहले वो इंसानी समाज में परिवार की व्यवस्था को समझने की कोशिश कर रहे थे. ऐसे में तय है कि जॉर्ज ने अपने परिवार के बारे में भी सोचा होगा.
मगर जॉर्ज की सबसे बड़ी उपलब्धि दुनिया को परोपकार की बुनियाद को समझाने की रही. यह सवाल सैकड़ों साल से वैज्ञानिकों के सामने खड़ा था कि आख़िर लोग दूसरों की मदद क्यों करते हैं? जबकि क़ुदरत का नियम कहता है कि जो सबसे बेहतर होगा वही बचेगा. ऐसे में दूसरों की मदद करके क्यों तमाम जीव उन्हें बचाते हैं.
सिर्फ़ इंसान ही नहीं बहुत से दूसरे जीव भी हैं जो दूसरों की भलाई के लिए अपने हित क़ुर्बान कर देते हैं. बरसों तक चार्ल्स डार्विन इस सवाल से जूझते रहे कि कुछ जानवर क्यों दूसरों की मदद में अपना फ़ायदा भी नहीं देखते. नुक़सान उठाते हैं.
फिर डार्विन ने कहा कि असल में ये एक ख़ास समाज के बीच होता है. जैसे कि कुछ चींटियां होती हैं जो रानी चींटी को अंडे देने और अपनी नस्ल को बढ़ाने के लिए ख़ुद बच्चे पैदा नहीं करतीं. इसी तरह वैम्पायर चमगादड़ भूखे रह जाने वाले अपने साथियों को अपने मुंह से ख़ून पिलाते हैं.
डार्विन के सिद्धांत के मुताबिक़ तो परोपकार का भाव पैदा ही नहीं होना चाहिए था. लेकिन ये न सिर्फ़ हुआ बल्कि क़ुदरत में अक्सर देखने को भी मिलता है. जीव वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब नहीं तलाश सके.
साल 1964 में अमरीका के बिल हैमिल्टन ने एक सिद्धांत बताया. बिल के मुताबिक़ लोग सबकी मदद नहीं करते. लेकिन जिनसे वास्ता होता है, जिनसे कोई रिश्ता होता है, उनकी मदद करने की ज़्यादा कोशिश करते हैं.
मतलब यह कि अगर वो अपनी जान की बाज़ी लगाकर अपने भाई-बंधुओं की मदद करते हैं तो उसके पीछे ये वजह होती है कि दोनों के गुणसूत्र एक जैसे होते हैं. एक की मौत होने की सूरत में दूसरा उन गुणों को अगली पीढ़ी को दे सकेगा.
हैमिल्टन के इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए जॉर्ज प्राइस ने नया फ़ॉर्मूला दिया.
wΔz=cov(wi,zi)+E(wiΔzi)
इसके मुताबिक़, किसी के पास ऐसी ख़ूबी है जो दूसरों के ऊपर भारी है, तो लोग उस गुण को अगली पीढ़ी को देने के लिए दूसरों की मदद करेंगे.
जब जॉर्ज प्राइस ने अपना नया फ़ॉर्मूला बिल हैमिल्टन को बताया तो दोनों दोस्त बन गए. दोनों की एक दूसरे को लिखी गई चिट्ठियों से ये बात पता चलती है.
बहरहाल, ज़िंदगी भर नास्तिक रहे जॉर्ज प्राइस आख़िरी कुछ सालों में बेहद धार्मिक हो गए थे.
थायराइड की दवा न लेने की वजह से आख़िरी वक़्त में उनमें पागलपन और भूलने जैसे लक्षण भी दिखने लगे थे.
इसी तरह उनकी बीमारी बढ़ती गई. आख़िरी दिनों में जॉर्ज प्राइस ने मनोवैज्ञानिक के पास जाने का फ़ैसला किया. मगर उससे पहले ही ख़ुद को गोली मारकर जान दे दी.
उनके अंतिम संस्कार में कुछ बेघर लोग, जिनकी जॉर्ज ने मदद की थी, वो शामिल हुए थे. अमरीका से बिल हैमिल्टन भी पहुंचे थे जॉर्ज के अंतिम संस्कार में.
जॉर्ज प्राइस की इस थ्रिलर जैसी कहानी को लॉरा फैनवर्थ ने हाल ही में एक नाटक के तौर पर पेश किया. जिसमें उन्होंने प्राइस की दोनों बेटियों को भी बुलाया था. दोनों को नाटक ख़ूब पसंद आया.
बाद में उन्होंने लंदन में जॉर्ज की क़ब्र पर पत्थर लगवाया और लिखा...पिता, परोपकारी और दोस्त. उस पत्थर पर प्राइस का फॉर्मूला भी उकेरा गया है.