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जिनके लिए 'जल ही जीवन' नहीं, तिल-तिल कर मरने का सबब हो
- Author, ज़ारिया गॉरवेट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
जल ही जीवन है. ये कहावत तो आपने ज़रूर सुनी होगी. ये सच भी है. बिना पानी के ज़िंदगी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है. दूसरे ग्रहों पर भी ज़िंदगी की तलाश में जुटे नासा का सूत्र वाक्य है, पानी का पीछा करो. यानी, पानी की तलाश करो, जहां पानी होगा,वहां ज़िंदगी मिल जाएगी.
पानी हमारे लिए कितना ज़रूरी है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा जा सकता है कि इंसान के शरीर का साठ फ़ीसद हिस्सा पानी होता है. लगभग 60 फीसद हमारा शरीर पानी से मिलकर बना है. 70 किलो वज़न वाले इंसान के भीतर चालीस लीटर पानी होता है.
साफ़ है कि हमारे वजूद के लिए पानी बहुत अहम है. लेकिन अगर हम ये कहें कि दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिनके लिए पानी नेमत नहीं, ज़हमत बना हुआ है तो? भरोसा करना मुश्किल होगा. लेकिन कुछ लोगों की ज़िंदगी की ये कड़वी सच्चाई है. उन्हें पानी की एक-एक बूंद, तिल-तिलकर मार देती है.
ऐसी ही एक महिला हैं ब्रिटेन की रैशेल वारविक. इन्हें पानी से एलर्जी है.
रैशेल वारविक की परेशानी सिर्फ ये नहीं है कि वो पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं. बल्कि इनके शरीर से निकलने वाला पसीना और आंसू भी इन्हें तकलीफ़ देते हैं. जिस्म पर जहां कहीं भी पानी लग जाता है वहीं जलन होने लगती है. सूजन आ जाती है. लाल चकत्ते पड़ जाते हैं.
वे जब दूसरों को तैरते हुए देखती हैं तो उनका भी मन तैरने को करता है. लेकिन अगर रैशेल अपनी एक अंगुली भी पानी में डुबो लें तो भयानक दर्द होने लगता है. इतनी तकलीफ़ सहने के बाद अगर वे रोना चाहें तो रो भी नहीं सकतीं. क्योंकि, जब आंसू चेहरे पर फिसलते हैं तो चेहरा भी सूज जाता है.
वारविक जिससे जूझ रही हैं उस बीमारी का नाम एक्वाजैनिक अर्टीकेरिया है. इस बीमारी में शरीर पर ऐसी खुजली होती है जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो. तकलीफ़ ज़्यादा होने पर बुखार तक हो जाता है. शरीर में पानी होना इस बीमारी की समस्या नहीं है. बल्कि चमड़ी पर पानी लग जाने के बाद परेशानी होती है.
यहां तक कि साफ पानी लग जाने पर भी दिक़्क़त हो सकती है. ये बीमारी वैज्ञानिकों के लिए भी चौकाने वाली है. इसकी असल वजह क्या है कहना मुश्किल है लेकिन तकनीकी तौर पर इसे एलर्जी नहीं कहा जा सकता. बल्कि ये शरीर के अंदर ही पैदा होने वाला एक तरह का इम्यून रिएक्शन है.
रैशेल वारविक महज़ 12 साल की थी जब उन्हें अपनी बीमारी का इल्म हुआ. एक दिन जब वो तैराकी करके पानी से बाहर निकलीं तो उनके जिस्म पर लाल चकत्ते पड़े हुए थे. ग़नीमत ये रही कि उनकी बीमारी फौरन ही डॉक्टर की पकड़ में आ गई. उनका लैब में कोई टेस्ट नहीं कराया गया. बल्कि उनके आधे शरीर को पानी में आधे घंटे तक रखा गया और उसके बाद इस बीमारी का पता चला.
इस बीमारी को सहना वाक़ई बहुत मुश्किल काम है. बारिश के मौसम में तो रशेल की ज़िंदगी और भी मुश्किल हो जाती है. वो घर से बाहर क़दम नहीं निकाल सकतीं. और गर्मी में पसीना ना बहे इसके लिए हल्के से हल्का कपड़ा पहनती हैं और ज़्यादातर ठंडे माहौल में ही रहती हैं. वो किसी भी तरह की वर्ज़िश नहीं करती ताकि जिस्म से पसीना ना निकले. रोज़मर्रा के कामों में उनके शौहर उनकी मदद करते हैं. और सबसे हैरत की बात तो ये है कि वो पानी कम से कम पीती हैं. इसके बजाय वो दूध पीकर पानी की ज़रूरत पूरी करती है.
कुछ थ्योरी इस बात पर ज़ोर देती हैं कि त्वचा की ऊपरी सतह पर ज़्यादातर डेड सेल होते हैं या फिर उसे नम रखने वाली चिकनी परत होती है. त्वचा की इस सतह पर जब पानी गिरता है तो यहां कुछ टोक्सिन उत्पन्न होते हैं और इससे इम्यून रिएक्शन होता है. कुछ थ्योरी इस बात की तरफ़ भी इशारा करती हैं कि डेड सेल्स वाली सतह पर पानी से किसी तरह का केमिकल रिएक्शन होता है और वही अंदर तक जाकर इम्यून रिएक्शन को जन्म देता है.
यूरोपियन सेंटर फॉर एलर्जी फाउंडेशन (ई.सी.ए. आर. एफ) के संस्थापक स्किन स्पेशलिस्ट, मार्क्स मॉरर कहते हैं कि इस बीमारी की वजह चाहे जो भी हो, लेकिन ये एक ऐसी भयानक बीमारी है जो मरीज़ की ज़िंदगी को पूरी तरह से बदलकर रख देती है.
मॉरर ऐसे बहुत से मरीज़ों को जानते हैं जो पिछले क़रीब 40 सालों से इस बीमारी से जूझ रहे हैं. वो जब सुबह उठते हैं तो शरीर पर सूजन के साथ ही उनकी आंख खुलती है.
इलाज के लिए मरीज़ को एंटी हिस्टामाइन दी जाती हैं. हमारी चमड़ी में इम्यून सेल जिन्हें मास्ट सेल कहा जाता है, वो जलन पैदा करने वाले हाई हिस्टामाइन प्रोटीन सेल पैदा करती हैं. किसी नॉर्मल रिएक्शन में ये हिस्टामाइन फ़ायदेमंद होते हैं. लेकिन अगर पानी से रिएक्शन होता है तो ये त्वचा पर सूजन ला देते हैं. इनसे खुजली होती है और चमड़ी पर लाल चकत्ते पड़ जाते हैं.
इस बीमारी के इलाज के लिए लगातर रिसर्च किये जा रहे थे. आखिरकार अगस्त 2009 में यूरोपियन सेंटर फॉर एलर्जी फाउंडेशन (ई.सी.ए. आर. एफ) की कोशिशें रंग लगाईं.
शोध में ओमालिज़ुमाब नाम की दवा के बारे में पता चला जो कि दमे के मरीज़ों को दी जाती है. और ये दवा एक्वाजेनिक अर्टिकेरिया के मरीज़ों के लिए भी वरदान से कम नहीं है.
हालांकि इस बीमारी के इलाज के लिए नई दवाओं की खोज लगातार की जा रही है. लेकिन मुश्किल ये है कि तज़ुर्बे के लिए बड़ी संख्या में मरीज़ नहीं मिल पाते हैं.
क़रीब 23 करो़ड़ लोगों में से किसी एक को एक्वाजेनिक अर्टिकेरिया यानी पानी से एलर्जी की शिकायत होती है. इस हिसाब से सिर्फ दुनिया में आज की तारीख़ में केवल 32 लोग इस मर्ज के शिकार हो सकते हैं.
वैज्ञानिक मार्कस मोरर कहते हैं कि उन्हें रिसर्च के लिए सिर्फ़ अर्टिकेरिया के मरीज़ तो मिल जाते हैं. लेकिन, अक्वाजेनिक अर्टिकेरिया के मरीज़ कम ही मिल पाते हैं. अब चूंकि मरीज़ कम होते हैं, तो, दवा बनाने वाली कंपनियां भी इस तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं देतीं हैं. और ना ही मोटी रक़म इस मर्ज़ की दवा विकसित करने पर खर्च करना चाहती हैं.
दवा बनाने वाली कंपनी नोवार्टिस का साफ़ कहना है कि वो इस बीमारी के लिए दवा ईजाद करने में पैसा नहीं लगाना चाहती हैं. कंपनी के प्रवक्ता का कहना है कि वो बिना लाइसेंस की दवा बेचने में यक़ीन नहीं रखते हैं.
सालों की खोज के बाद नतीजा ये सामने आता है कि तिल-तिल कर मारने वाली इस रहस्यमय बीमारी का इलाज तालाशने में साइंस नाकाम तो नहीं. मगर पैसे की कमी ने रिसर्च का रास्ता रोक रखा है.
अगर कोई सरकार या दवा बनाने वाली बड़ी कंपनी या कोई पैसे वाला शख़्स इस बारे में गंभीर हो, तो पानी से होने वाली इस परेशानी का हल खोजा जा सकता है. फिर रैशेल वारविक जैसे लोग भी आम इंसानों जैसी ज़िंदगी जी सकेंगे.
मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.
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