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जिनकी कहानियों में सेक्स अपील थी और ख़ौफ़ भी
- Author, लूसी स्कोल्स
- पदनाम, बीबीसी कल्चर
हाल ही में एक अंग्रेज़ी फ़िल्म रिलीज़ हुई जिसका नाम था, 'माय क़ज़िन रैशेल'.
ये फिल्म एक सस्पेंस थ्रिलर एक रोमांटिक थ्रिलर थी, जिसका निर्देशन रोजर मिशेल ने किया था. फ़िल्म में मुख्य किरदार अभिनेत्री रैशेल वीज़ ने निभाया था.
ये फ़िल्म ब्रिटिश लेखिका डैफ्ने ड्यू मॉरिया के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी. डैफ्ने ड्यू मॉरिया को मशहूर ब्रिटिश लेखिका तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनके उपन्यासों को, उनके काम को उतनी शोहरत नहीं मिली, जितने की वो हक़दार थीं.
यहां तक कि उनके उपन्यास 'रेबेका' को टाइम्स के साहित्यिक सप्लीमेंट ने 1938 में बेहद औसत दर्जे का करार दिया था. हालांकि 25 साल बाद उसी टाइम्स अख़बार ने रेबेका को बेहद लोकप्रिय साहित्यिक कृति बताया. 'रेबेका' पर एक फ़िल्म भी बनी.
असल में डैफ्ने ड्यू मॉरिया हमेशा ही अपने किरदारों में रहस्य, रोमांच भरती थीं. वो उनके ज़रिए सेक्स अपील भी पैदा करती थीं और ख़ौफ़ भी. लेखिका के तौर पर डैफ्ने का करियर लंबा चौड़ा रहा. उन्होंने 81 बरस की अपनी ज़िंदगी में 16 तो नॉवेल लिख डाले.
अल्फ्रेड हिचकॉक की फ़िल्म
इसके अलावा डैफ्ने ने कई कहानियां, जीवनियां, नाटक, आत्मकथा लिखीं और अपने शहर कॉर्नवाल के बारे में भी क़िताब लिखी. उनकी कई कहानियों और क़िताबों पर फ़िल्में बनीं. मसलन उनके उपन्यास 'रेबेका' पर भी फ़िल्म बनी.
इसकी कहानी एक ऐसी महिला के बारे में है, जिसकी शादी ऐसे शख़्स से होती है, जिसकी पहली बीवी मर चुकी होती है. पूरा उपन्यास घर में क़ैद इस महिला के ख़ौफ़ के इर्द-गिर्द घूमता है. ये ख़ौफ़ उसके पति की पहली पत्नी का होता है.
डैफ्ने के कमोबेश हर उपन्यास या कहानी में ऐसे किरदार मिल जाते हैं, जो पढ़ने वाले के अंदर डर पैदा करते हैं. फिर चाहे उनकी कहानी 'द बर्ड्स' हो या फिर 'माय कज़िन रैशेल'. 'द बर्ड्स' पर मशहूर निर्देशक अल्फ्रेड हिचकॉक ने फ़िल्म भी बनाई थी.
इसमें कहानी ये थी कि परिंदों का एक झुंड अमरीका के एक शहर पर हमला बोल देता है. इसी तरह डैफ्ने की लिखी कहानी, 'डोंट लुक नाऊ' पर इसी नाम से निकोलस रोग ने फ़िल्म बनाई थी. ये फ़िल्म यूं तो सस्पेंस थ्रिलर थी. इसकी कहानी इटली के वेनिस शहर पर आधारित थी.
कहानी के साथ इंसाफ
फ़िल्म में एक जो़ड़ा अपनी बेटी का मातम मनाता दिखाया गया है. लेकिन फ़िल्म की चर्चा इसके हीरो डोनाल्ड सदरलैंड और हीरोइन जूली क्रिस्टी के बीच के सेक्स सीन को लेकर ज़्यादा हुई थी.
ख़ुद डैफ्ने ने माना था कि निकोलस रोग ने उनकी कहानी के साथ इंसाफ़ किया था.
हालांकि अल्फ्रेड हिचकॉक ने भी डैफ्ने की कहानियों पर कई फ़िल्में बनाईं, मगर उनमें से ज़्यादातर की कहानियों में छेड़खानी से डैफ्ने नाख़ुश रहीं. डैफ्ने की कहानियों में किरदारों की सेक्स अपील भी काफ़ी अच्छे से बताई जाती थी.
उनकी कहानी 'द मेनस' में ऐसा ही किरदार गढ़ा गया था. हालिया फ़िल्म 'माय कज़िन रैशेल' में भी यही देखने को मिला. उनके ऐतिहासिक उपन्यासों 'फ्रेंचमैन्स क्रीक' और 'जमैका इन' में भी रहस्य, रोमांच और ढेर सारी सेक्स अपील आपको पढ़ने को मिलेगी.
लेकिन ये कहना ग़लत होगा कि डैफ्ने ने सिर्फ़ सस्पेंस थ्रिलर ही लिखे. उन्होंने साइंस फिक्शन में भी हाथ आज़माया. जैसे कि उनके उपन्यास द हाउस ऑन स्ट्रैंड्स में एक वैज्ञानिक के अजीबो-ग़रीब रिसर्च का ज़िक्र है.
रूल ब्रिटानिया नाम का उपन्यास
वहीं उनकी कहानी 'द ब्लू लेंसेज़' में एक महिला जब आंख के ऑपरेशन के बाद आंख खोलती है, तो उसे हर इंसान के सिर पर जानवर का सिर दिखाई देता है. वहीं 'द ब्रेकथ्रू' कहानी में एक मरते हुए लड़के की आत्मा को क़ैद करने की कोशिश करते हुए दिखाया गया है.
उनकी कहानी 'द मेनस' में एक ऐसी फ़िल्मी तकनीक का ज़िक्र है, जिसमें फ़िल्म के किरदार की सेक्स अपील को सीधे दर्शक को महसूस कराने की कोशिश होती है.
डैफ्ने के बारे में ये भी कह सकते हैं कि उन्होंने ब्रेग्ज़िट की भविष्यवाणी करने वाला उपन्यास भी लिखा था.
असल में डैफ्ने ने 1972 में 'रूल ब्रिटानिया' नाम का उपन्यास लिखा था. इसमें कहानी ये थी कि ब्रिटेन पहले कॉमन मार्केट (यूरोपीय यूनियन का पूर्ववर्ती समूह) का सदस्य बना. फिर ब्रिटेन ने कॉमन मार्केट से ख़ुद को अलग कर लिया.
जिसके बाद अराजकता फैल गई. चीज़ों के दाम बढ़ गए. बेरोज़गारी का आलम हो गया. सामाजिक उथल-पुथल मच गई. ब्रिटेन के यूरोप से रिश्ते बेहद ख़राब होने का ज़िक्र भी डैफ्ने ने अपने उपन्यास में किया था. जिसके बाद ब्रिटेन में इमरजेंसी लगानी पड़ी.
'माय कज़िन रैशेल'
उपन्यास में आगे की कहानी में ब्रिटेन की मदद के लिए दोस्त अमरीका आगे आता है. फिर दोनों देश मिलकर USUK नाम का संगठन बनाते हैं. लेकिन डैफ्ने ने उपन्यास में लिखा कि इस गठबंधन के ख़िलाफ़ उसके अपने क़स्बे कॉर्नवाल के लोग बग़ावत कर देते हैं.
दिलचस्प बात ये कि 1972 में आए इस उपन्यास के एक साल बाद ही ब्रिटेन यूरोपीय आर्थिक समुदाय का सदस्य बना था. आज जब ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने का फ़ैसला किया तो लगता है कि डैफ्ने ने आज का मंज़र 1972 में ही बयां कर दिया था.
डैफ्ने 1908 में ब्रिटिश क़स्बे कॉर्नवाल में पैदा हुई थीं. उनकी ज़्यादातर ज़िंदगी वहीं गुज़री. उनके पिता सर जेराल्ड ड्यू मॉरिया और मां मुरिएल ब्यूमोंट भी कलाकार थे. जबकि डैफ्ने के दादा जॉर्ज ड्यू मॉरिया कार्टूनिस्ट और लेखक थे.
डैफ्ने की मौत 1989 में हुई. आज भी उनके लिखे उपन्यास काफ़ी लोकप्रिय हैं. हाल ही में बनी फ़िल्म 'माय कज़िन रैशेल' इस बात की मिसाल है. ये फ़िल्म भारत में भी रिलीज़ हुई थी.
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