कोरोना वायरसः उन दोस्तों का क्या करें जो सोशल डिस्टेंसिंग नहीं मानते?

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- Author, मैडी सेवेज
- पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़
मैड्रिड में छह हफ्ते के लॉकडाउन के बाद जब अधिकतम 10 दोस्तों को मिलने की अनुमति दी गई तो कुछ लोग फौरन अपने पसंदीदा बीयर बार में इकट्ठा होने लगे या अपने घर पर डिनर पार्टी रख ली.
लेकिन दूसरे लोग इस उलझन में थे कि कैसे मिलना-जुलना है. कुछ लोगों ने यह भी महसूस किया कि उनकी जान-पहचान के लोगों का रवैया बदला-बदला सा है.
मैड्रिड में रहने वाली प्रोजेक्ट मैनजर एंबर ने वीकेंड में अपने एक दोस्त के घर पर दोस्तों की बड़ी बैठक करनी चाही तो कई लोग तनाव में आ गए.
उनके अधिकतर दोस्त 30 से 40 साल के बीच के हैं. वे घबरा गए कि उनके समूह का एक सदस्य कैसे वायरस के साथ इतना जोखिम उठा रहा है.
एंबर कहती हैं, "यह संक्रमण का समय है और निश्चित रूप से लोग एक-दूसरे को थोड़े संदेह के साथ देख रहे हैं."
मास्क पहनने की सलाह
कोलोराडो की एवॉन काउंटी अमरीका में सबसे पहले खुलने वाली जगहों में से एक है.
यहां रहने वाले 21 साल के छात्र गार्विन वोल्फ वैन डर्नूट अपने उन दोस्तों से मिलने में घबराते हैं जो उनकी तरह सतर्क नहीं हैं.
वह कहते हैं, "कुछ लोगों ने छोटी पार्टियां और मेल-मुलाकात का कार्यक्रम रखा तो किसी ने दिशानिर्देश नहीं माने."
वे कार में पास-पास बैठकर घूमे और मास्क पहनने से इंकार कर दिया, जबकि कोलोराडो में सार्वजनिक जगहों पर मास्क पहनने की सलाह दी गई है.
"यह भ्रमित करने वाला है जबकि हम अब भी लोगों को मरते देख रहे हैं. लेकिन लोग ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे उनके लिए यह महामारी ख़त्म हो गई हो."

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हमारी सीमाएं अलग-अलग क्यों हैं?
डर्नूट दिशानिर्देशों का उल्लंघन करने वालों से बातचीत करने में असहज हो गए.
उन्होंने एक लड़की के स्नैपचैट पर व्यंग्य करते हुए टिप्पणी कर दी तो लड़की ने उनको अनफ्रेंड कर दिया.
हालांकि वे कभी बहुत करीब नहीं थे लेकिन डर्नूट को लगता है कि अब उनकी कभी बातचीत नहीं होगी.
इंग्लैंड की केंट यूनिवर्सिटी में स्वास्थ्य मनोवैज्ञानिक डॉक्टर केट हैमिल्टन-वेस्ट का कहना है कि ज़्यादातर लोग आसानी से यह समझ लेते हैं कि लॉकडाउन में जितना संभव हो सके घर पर ही रहना चाहिए.
फिर भी यह मानवीय स्वभाव है कि यदि सरकार लोगों को ज़्यादा विकल्प देती है तो उनका व्यवहार अलग-अलग रूपों में दिखता है.
जोखिम उठाने वाले...
आंशिक रूप से इसकी वजह यह है कि अलग-अलग व्यक्तित्व के लोग कम या ज़्यादा जोखिम उठाने वाले हो सकते हैं या उनके मूल्य एक-दूसरे के विपरीत हो सकते हैं.
मिसाल के लिए, दूसरों की रक्षा करना- यह एक ऐसी चीज़ है जिसे लोग अलग-अलग मात्रा में महत्व देते हैं.
कुछ लोगों के लिए यह दूसरी चीज़ों, जैसे कि अपने फ़ैसले लेने की आज़ादी, से कम महत्वपूर्ण हो सकता है.
स्वीडन में (जहां कभी लॉकडाउन नहीं रहा) लुंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि लोग स्वैच्छिक सिफारिशों का कितना पालन करेंगे, इसका सबसे बड़ा संकेत यह है कि वे दूसरों के फायदे के लिए ख़ुद को बदलने के लिए कितने तैयार हैं.
उन्होंने इस तरह के जिम्मेदार सामाजिक व्यवहार को सर्वेक्षणों और गेम-आधारित प्रयोगों से मापा, जो इस बात पर केंद्रित था कि ज़्यादा पैसे कमाने के लिए वे दूसरों को कितने जोखिम में डाल सकते हैं.
कोविड-19 के बारे में स्वास्थ्य जानकारियां
सामाजिक होना इस बात का संकेत था कि वे शारीरिक दूरी और स्वच्छता उपायों का पालन करेंगे, मास्क खरीदेंगे और कोविड-19 के बारे में स्वास्थ्य जानकारियां जुटाएंगे.
हैमिल्टन-वेस्ट का कहना है कि व्यवहार को प्रभावित करने वाले कुछ दूसरे संभावित कारक भी हैं, जैसे- विभिन्न मीडिया, दोस्तों और परिवार या डॉक्टरों से मिलने वाली सूचनाएं और बीमारी के अपने पिछले तजुर्बे.
जो लोग आम तौर पर सेहतमंद रहते हैं और पीछे कभी गंभीर रूप से बीमार नहीं पड़े वे यह मानने लगते हैं कि वायरस उनको नहीं पकड़ेगा, भले ही इस बात के सबूत हों कि जवान और तंदुरुस्त लोग भी कोविड-19 से मर चुके हैं.
हैमिल्टन-वेस्ट कहती हैं, "हम बीमारी का एक 'निजी मॉडल' बना लेते हैं. इसके बारे में हम सबकी अपनी-अपनी धारणाएं हैं जैसे कि अगर हमें बीमारी होती है तो इसके गंभीर लक्षण क्या होंगे, वे कितने दिनों तक रहेंगे और उनका प्रभावी इलाज कैसे होगा."
ये निजी मॉडल संकट के हमारे तजुर्बे से भी जुड़े हो सकते हैं. मिसाल के लिए, जोखिम वाले किसी रिश्तेदार के साथ रहना या किसी ऐसे व्यक्ति को जानना जो कोविड-19 से बीमार पड़ा या मर गया.

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सामाजिक मेल-मुलाकातों में...
पाबंदियां उठ जाने के बाद सामाजिक मेल-मुलाकातों में हम कितने सतर्क रहेंगे, उस पर इन तजुर्बों का बड़ा असर हो सकता है.
मैड्रिड में, एंबर ने महसूस किया कि जो लोग लॉकडाउन में सिटी सेंटर के अपार्टमेंट में रहे और जो समृद्ध उपनगरों में या पहाड़ों में रहे और रोज अपने कुत्ते के साथ टहलने निकलते रहे, उनके रवैये में बड़ा अंतर है.
सिटी सेंटर में रहने वालों ने घर से बाहर निकलने में भी वायरस का ख़तरा महसूस किया. इसीलिए एंबर को लगता है कि उनमें से कई लोग अभी घुलने-मिलने को लेकर ज़्यादा सावधानी बरत रहे हैं.
इसके उलट, रोम में रहने वाले 34 साल के ऑस्ट्रेलियाई एलेक्जेंडर का कहना है कि उनके दोस्त "बहुत कम तनाव" में हैं.
वे सब तुरंत ही इकट्ठे होकर बार जाने के लिए तैयार हो गए. हालांकि वे खुली छत वाले बार चुनते हैं और छोटे-छोटे समूहों में मिलते हैं.
"हर कोई नियमों का पालन करना चाहता है क्योंकि ऐसा करना एक नागरिक की जिम्मेदारी के तौर पर देखा जाता है."

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अलग भावनात्मक प्रतिक्रियाएं
एलेक्जेंडर को लगता है कि उनके दोस्तों का व्यवहार एक जैसा होने की वजह यह है कि महामारी के दौरान उन सबके अनुभव एक जैसे रहे हैं.
उनमें से कोई भी शहर के किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता जो कोरोना वायरस का मरीज़ हुआ हो.
मनोवैज्ञानिक हमारे व्यवहार को आकार देने में भावनाओं के महत्व की ओर भी इशारा करते हैं.
जिन लोगों में घबरा जाने की प्रवृत्ति पहले से मौजूद है उनके लिए लॉकडाउन के बाद फिर से घुलना-मिलना मुश्किल होगा.
लेकिन हैमिल्टन-वेस्ट का कहना है कि अगर कोई नियमित रूप से सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों या अन्य स्वास्थ्य निर्देशों का उल्लंघन करता है तो हो सकता है कि वह कोविड-19 से जुड़े तनाव को झेल रहा हो.
"यदि हम इसे लेकर बहुत अधिक चिंतित हैं तो हम ऐसी चीज़ें कर सकते हैं जिससे हमें अच्छा लगे."
सोशल डिस्टेंसिंग
वायरस के बारे में सोचने से बचने के लिए लोग ऐसे काम नहीं करते जो उनको इसकी याद दिलाए जैसे सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना या हाथ धोना.
वे दूसरे लोगों से मिलना-जुलना शुरू करते हैं और उसी तरह शारीरिक संपर्क चाहते हैं जैसे वे महामारी से पहले रहते थे.
कुछ दूसरे लोगों के लिए नए दिशानिर्देशों का पालन करने से इंकार करना अलग तरह की परेशानियों, जैसे- घर पर निजी संबंधों, सामाजिक अलगाव या वित्तीय मुश्किलों की प्रतिक्रिया हो सकती है.
मॉन्ट्रियल की क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक डॉक्टर मिरियम किरमायर कहती हैं, "कभी-कभी ऐसी चीज़ें बगावत की वजह से नहीं होतीं, बल्कि अकेलापन, हताशा या ज़रूरत की वजह से भी होती हैं."
महामारी के दौरान ऐसे लोगों के लिए दूसरों से मिलना, भले ही इसमें जोखिम हो, हालात से निपटने का तरीका होता है.

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असहमत दोस्तों से कैसे बात करें?
मनोवैज्ञानिक अध्ययनों ने बहुत पहले साबित किया है कि दूसरों से मिलना-जुलना हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत को अच्छा कर सकता है.
किरमायर कहती हैं, "हम सामाजिक हैं और अपने करीबियों से मिलकर हमें बड़ा सुकून मिलता है."
सोशल डिस्टेंसिंग को लेकर जो लोग अलग रवैया अपना रहे हैं उनको समझना या कम से कम उनके साथ हमदर्दी रखना पहला कदम है. दोस्तों के साथ सहमत या असहमत होना ही विकल्प नहीं है.
आपके दोस्त का व्यवहार ख़ुद आपकी सेहत और आपके संपर्क में आने वाले लोगों की सेहत को जोखिम में डाल सकता है. वे ख़ुद के लिए भी ख़तरा बढ़ा रहे हैं.
किरमायर का कहना है कि नियम तोड़ने वालों से सीधे भिड़ जाना उनको रक्षात्मक बना सकता है. हमें स्वीकार करना चाहिए कि "कोई अपना व्यवहार बदले यह वास्तव में हमारे वश में नहीं होता."
शारीरिक नजदीकी
फिर भी कुछ तरीके हैं जिनसे ऐसी मुश्किल बातचीत को आसान बनाने में मदद मिल सकती है.
"अपने दोस्त को गैर-जिम्मेदार या लापरवाह कहने की जगह आप अपने मूल्यों और तजुर्बों पर ध्यान दीजिए और उसकी सेहत के प्रति परवाह दिखाते हुए अपनी बात कहिए."
हैमिल्टन-वेस्ट का कहना है कि अगर आपका दोस्त अपना व्यवहार बदलने को राजी नहीं है तो फिर आपको फ़ैसला करना है कि क्या आप उसके साथ शारीरिक नजदीकी बनाने जा रहे हैं.
"अगर इसमें आपके ख़ुद के लिए और आपके दूसरे दोस्तों के लिए जोखिम है तो यह कहने में कोई बुराई नहीं है कि 'मैं अभी आपसे नहीं मिल सकता. मैं अन्य दोस्तों को संक्रमित करने का जिम्मेदार नहीं बनना चाहता."
आप जहां जा रहे हैं वहां क्या हो रहा है इस पर लगातार नज़र रखना भी अहम है. मिसाल के लिए, अगर आप किसी दोस्त के जन्मदिन पर गए हैं तो दूसरे लोग भी आ सकते हैं.

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क्या कोविड की वजह से हम दोस्ती तोड़ लें?
एक कमरे में 20 लोगों के होने का मतलब है दूरी बनाकर रखना लगभग नामुमकिन है. वहां यह कहने में कोई बुराई नहीं है कि "मैं यहां सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा, इसलिए अब मैं जा रहा हूं."
हैमिल्टन-वेस्ट कहती हैं, "इस वक़्त अच्छे दोस्त के बारे में हमारी अवधारणा को बदलने की ज़रूरत है. मुझे लगता है कि इस बारे में सोचना हम सबके लिए उपयोगी है."
मनोवैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि यदि मिलने-जुलने को लेकर आप किसी दोस्त से लगातार भिड़ रहे हैं तो रिश्ते पर इसका गहरा असर हो सकता है.
लेकिन किरमायर और हैमिल्टन-वेस्ट दोनों ही ऐसे दोस्तों को अपनी ज़िंदगी से निकाल देने के फ़ैसले के प्रति सावधान करती हैं.
किरमायर कहती हैं, "हम सबको यह तय करने में सक्षम होना चाहिए कि रिश्ते में हम किस बात पर समझौता नहीं कर सकते, लेकिन महामारी का यह समय दोस्ती के बारे में अंतिम या कठोर फ़ैसला लेने का सही समय नहीं है."
"मेरी सलाह है कि रिश्ते तोड़ने से पहले कई सवाल पूछें. पहला, क्या यह कठिनाई किसी बड़े पैटर्न या पहले से चल रहे किसी मुद्दे के कारण है या सिर्फ़ सोशल डिस्टेंसिंग के दिशानिर्देशों से संबंधित है?
फिर, क्या आपने अपनी असहजता अपने दोस्त को बताई है? क्या आपने कभी यह बताया है कि आप इस बारे में क्यों फिक्रमंद हैं?"
उनका सुझाव है कि नई सीमाएं बनाकर अच्छी दोस्ती को बचाया जा सकता है.
मिसाल के लिए सोशल मीडिया या वीडियो कॉल के जरिये संपर्क करना और संकट ख़त्म होने तक महामारी के बारे में किसी चर्चा से बचना.
हैमिल्टन-वेस्ट भी इससे सहमत हैं. "जब हम इन परिस्थितियों से बाहर आ जाएंगे तब हमें पता चलेगा कि असल में हम अब भी अच्छे दोस्त हैं."
"मुझे लगता है कि इन परिस्थितियों में दोस्तों को खोना शर्मनाक है."

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