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दक्षिण कोरिया का एक द्वीप जो कार्बन मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है
- Author, ब्रायन लुफ़किन
- पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ
क्या एक छोटा-सा द्वीप पूरे देश के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने का ब्लूप्रिंट तैयार कर सकता है?
दक्षिण कोरिया के दक्षिणी तट पर स्थित गैपेडो द्वीप में इन दिनों इसी परिकल्पना का परीक्षण किया जा रहा है.
यह दुनिया का पहला कार्बन-मुक्त द्वीप बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. यहां पहले से ही सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है.
गैपेडो के एक वर्ग किलोमीटर से भी कम भू-भाग में लगभग 200 बाशिंदे रहते हैं. उनकी सामुदायिक ऊर्जा की ज़रूरतें दो पवन चक्कियों से मिलने वाली अक्षय ऊर्जा से पूरी होती हैं.
गैपेडो के ज़्यादातर घर सौर ऊर्जा से रौशन हैं. घर की मूलभूत आवश्यकताएं सूरज से मिलने वाली ऊर्जा से पूरी होती हैं.
यहां के निवासी जिन मेयोंग हुवान कहते हैं, "मैं गैपेडो का निवासी हूं और पिछले छह साल से यहां का प्रमुख था."
"पूरे जेजू प्रांत और दक्षिण कोरिया में सिर्फ़ हमारा द्वीप ही पूरी तरह सौर और पवन ऊर्जा से चलता है. इस द्वीप की 45 फ़ीसदी ऊर्जा पर्यावरण के अनुकूल है."
असल में यह द्वीप जितनी बिजली की खपत करता है, उससे अधिक बिजली पैदा करता है. अतिरिक्त बिजली ग्रिड को दे दी जाती है.
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टिकाऊ उर्जा स्रोत की तलाश
ख़ुशहाल भविष्य सुनिश्चित करने के लिए इतना ही काफ़ी नहीं है. दक्षिण कोरिया का जेजू प्रांत छुट्टियां बिताने वाले सैलानियों की पसंदीदा जगह है. जेजू को टिकाऊ ऊर्जा स्रोत की तलाश है.
गैपेडो जेजू तट से कुछ ही दूरी पर एक छोटा सा द्वीप है, जो पूरे जेजू प्रांत के भविष्य के समाधान का ख़ाका तैयार कर रहा है.
यहां पर एक बड़ी परियोजना का परीक्षण हो रहा है. 2030 तक जेजू प्रांत में कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने का लक्ष्य रखा गया है.
यह एक साहसिक योजना है, जिसकी सफलता के लिए ज़रूरी है कि गैपेडो का मॉडल कामयाब हो. इस पर अब तक 10 करोड़ डॉलर का निवेश हो चुका है.
दक्षिण कोरिया के उष्णकटिबंधीय पर्यटन केंद्र जेजूडो में हर साल डेढ़ करोड़ से अधिक सैलानी पहुंचते हैं.
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अक्षय ऊर्जा से टिकाऊ विकास
यहां सैलानियों की तादाद बढ़ने की उम्मीद है. पर्यटकों की भीड़भाड़ वाला प्रांत अगले दशक के अंत तक सभी वाहनों और बिजली उत्पादन को अक्षय ऊर्जा में बदलना चाहता है.
इस परियोजना में फ़िलहाल हवाई जहाज़ों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन शामिल नहीं है.
2018 में जेजू इंटरनेशनल और सोल गिम्पो एयरपोर्ट के बीच का हवाई रूट सबसे व्यस्त माना गया था. इस रूट पर साल में 76 हज़ार उड़ानें हुई थीं.
होटलों और हवाई जहाज़ों से भरे टूरिस्ट हॉटस्पॉट में इस तरह का महत्वाकांक्षी पर्यावरण लक्ष्य रखना अतिउत्साही लगता है.
लेकिन सौर और पवन ऊर्जा जैसे ऊर्जा के अक्षय भंडारों पर ज़ोर देने वाली परियोजना जेजू जैसी जगहों के लिए बहुत अहम है, क्योंकि पर्यटन केंद्र के रूप में इसका भविष्य इसी पर निर्भर हो सकता है.
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चुनौतियां भी कम नहीं
गैपेडो की कुदरती ख़ूबियां परियोजना के लिए चुनौती पेश कर रही हैं. समुद्र का खारा पानी और वहां से उठने वाली हवा बिजली के इलेक्ट्रॉनिक चार्जिंग केंद्रों को ख़राब कर देती हैं.
दूसरी जगहों के मुक़ाबले यहां के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम ज़ल्दी बेकार हो जाते हैं. गैपेडो अब तक इसका समाधान नहीं ढूंढ़ पाया है.
प्रोजेक्ट 2030 की कामयाबी के लिए गैपेडो अपने बुनियादी ढांचे को बेहतर कर रहा है. साथ ही लोगों को इस बात के लिए मनाया जा रहा है कि वे कार्बन जीवाश्म ईंधन वाली गाड़ियां न चलाएं.
कार्बन-मुक्त आबोहवा के लिए ज़रूरी है कि इलेक्ट्रॉनिक चार्जिंग केंद्र हमेशा काम करते रहें. इसका समाधान तलाशे बिना इस द्वीप को कार्बन-मुक्त नहीं बनाया जा सकता.
जिन मेयोंग हुवान कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि हम इस द्वीप को और अधिक नुक़सान नहीं पहुंचाएंगे."
"यदि हम इसे आज जितना साफ-सुथरा बनाए रख सकें और कार्बन-मुक्त व्यवस्था तैयार कर सकें तो गैपेडो विश्व-स्तरीय पर्यटन केंद्र बन जाएगा."
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ज़ीरो-कार्बन का सपना
पर्यावरण संगठन सिएरा क्लब के उप निदेशक कैस रोरबैक कहते हैं, "जलवायु परिवर्तन (जैसे समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी) का असर पूरी दुनिया के द्वीपों पर पड़ेगा."
इन दिनों पूरी दुनिया में जीरो-कार्बन परियोजनाएं आम हैं. जीवाश्म ईंधनों से होने वाले हानिकारक कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन कम करने की कोशिश हो रही है.
पिछले साल कार्बन डायऑक्साइड का वैश्विक उत्सर्जन 37 गीगा टन रिकॉर्ड किया गया था. यह मात्रा साल दर साल बढ़ती ही जा रही है.
ज़ीरो-कार्बन परियोजनाओं से इस पर नियंत्रण रखने की कोशिश हो रही है.
बीते हफ्ते संयुक्त राष्ट्र ने एक ऐतिहासिक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें चेतावनी दी गई है कि साल 2100 तक समुद्र का औसत तल 1.1 मीटर तक बढ़ सकता है. यह जेजू जैसे द्वीपों के लिए बहुत ही बुरी ख़बर है.
अच्छी ख़बर यह है कि छोटा सा द्वीप गैपेडो पूरे दक्षिण कोरिया को यह रास्ता दिखा सकता है कि कैसे टिकाऊ विकास को हासिल किया जा सकता है. यह अक्षय ऊर्जा के लिए बढ़ते वैश्विक प्रयासों का भी हिस्सा है.
अमरीका के स्वच्छ ऊर्जा संगठन रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट के ज़ीरो-कार्बन सिटी एक्सपर्ट जैकब कोर्विडे कहते हैं, "दो देश- भूटान और सूरीनाम पहले ही कार्बन-तटस्थ बन चुके हैं."
"वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 16 फीसदी हिस्से को कार्बन तटस्थ बनाने के लिए हमारी प्रतिबद्धताएं पहले से हैं. हम उम्मीद करते हैं कि अगले दशक में यह संख्या नाटकीय रूप से बढ़ेगी."
अगर अन्य पर्यटन केंद्र भी ऐसा ही करने की सोचते हैं तो हो सकता है कि जेजू का गैपेडो कार्बन-मुक्त भविष्य का मॉडल पेश कर सके.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी वर्कलाइफ पर उपलब्ध है.)
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