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ऑफ़िस के काम पूरे करने के लिए छुट्टी लेना कितना सही?
- Author, क्रिस स्टोकल-वॉकर
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
दफ़्तरों में कर्मचारी घट रहे हैं और हर कोई अपना अच्छा प्रभाव बनाकर रखना चाहता है. लेकिन अगर आप छुट्टी लेकर ऑफ़िस के अधूरे काम निपटा रहे हैं तो दोबारा सोचने की ज़रूरत है.
चौबीस (24) साल की पल्लवी शर्मा एक ट्रैवेल कंपनी में कंटेंट क्रिएटर हैं. वह अक्सर हफ़्ते के छह या सात दिन काम करती हैं.
नौकरी करते हुए वह एक स्थानीय यूनिवर्सिटी में पढ़ाई भी करती हैं. बिना छुट्टी के काम करने को वह अपनी नौकरी का हिस्सा मानती हैं.
कई बार तो काम ख़त्म करने के लिए दिन के घंटे पूरे नहीं पड़ते. वह कहती हैं, "छूट गए काम को पूरा करने के लिए मुझे कभी-कभी रविवार या सरकारी छुट्टियों के दिन भी काम करना पड़ता है."
वह इसका बुरा नहीं मानतीं. उनको लगता है कि इससे उनका काम बेहतर होता है क्योंकि घर पर ऑफ़िस के माहौल का दबाव नहीं होता. "मैं छुट्टी के समय काम करती हूं तो नतीजे बहुत बेहतर होते हैं."
पल्लवी ऐसा सोचने वाली अकेली नहीं हैं. ब्रिटेन के ब्राइटन शहर में रहने वाले न्यूट्रिशन और फ़िटनेस एक्सपर्ट टॉम जेनेन ने पिछले साल अपनी पहली छुट्टी लेकर ऑफ़िस के बचे हुए काम निपटाए.
जेनेन की कंपनी जो उत्पाद बेचती है उनका विवरण लिखने के साथ-साथ उनके पास कई दूसरे काम थे. ऑफ़िस के घंटों में वह यह काम पूरा नहीं कर पाए.
"मैंने एक दिन की छुट्टी ली, घर पर बैठा और सारे उत्पादों के विवरण लिखे. मैं अपने समय से उठा, अपने लिए कॉफ़ी बनाई, लैपटॉप लेकर सोफ़े पर बैठा और संगीत बजाकर काम करता रहा."
इनबॉक्स में आने वाले संदेशों, सहकर्मियों के साथ बातचीत और दफ़्तर के तनाव से दूर रहते हुए जेनेन ने एक दिन में ही वह सारा काम निपटा दिया, जो लंबे समय से लटका हुआ था. लेकिन इसके लिए उनको एक अनमोल छुट्टी गंवानी पड़ी.
जेनेन और वर्मा दोनों ने लीविज़्म को अपनाया है. यह एक अवधारणा है जिसमें लोग ऑफ़िस के काम के बोझ को कम करने के लिए छुट्टी का इस्तेमाल करना मंज़ूर करते हैं.
वित्तीय संकट से कार्यभार संकट तक
हेरियट-वॉट यूनिवर्सिटी में मानव संसाधन प्रबंधन के एसोसिएट प्रोफ़ेसर जेम्स रिचर्ड्स को लगता है कि वेतनभोगी पेशेवर कर्मचारियों के लिए यह हमेशा किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है.
रिचर्ड्स लीविज़्म के प्रसार पर विस्तृत सर्वे कर रहे हैं. वह कहते हैं, "आपके पास नौकरी का एक क़रार है, लेकिन आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप बदलती समय-सीमा और मांग को पूरा करें."
चार्टर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ़ पर्सनेल एंड डेवलपमेंट (CIPD) के सर्वे के मुताबिक़ ब्रिटेन में पिछले साल दो-तिहाई एचआर पेशेवरों ने छुट्टी के दिन दफ़्तर के काम किए. यह तादाद बढ़ रही है.
मैनचेस्टर बिजनेस स्कूल में संगठनात्मक मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर और CIPD के अध्यक्ष कैरी कूपर कहते हैं, "यह और बढ़ने वाला है, क्योंकि पिछली मंदी के बाद से ज़्यादातर संगठनों ने कर्मचारियों की तादाद घटाई है."
"अभी तो हमने यह महसूस करना शुरू किया है कि यह कितना बड़ा मुद्दा है."
कूपर का अनुमान है कि दुनिया भर के क़रीब एक तिहाई कर्मचारियों ने छूटे हुए काम को पूरा करने के लिए छुट्टी लेकर घर पर काम किया है. उनको डर है कि अगर एक और मंदी आ गई तो इसमें और इज़ाफ़ा होगा.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ 2007 में (मंदी से पहले) दुनिया भर में 17 करोड़ 80 लाख बिना नौकरी के थे.
2009 में यह तादाद बढ़कर 20 करोड़ 50 लाख हो गई. इससे काम के प्रति नज़रिया बदल गया.
मंदी के बाद की दुनिया में "कम ही ज़्यादा है" आदर्श वाक्य बन गया. काम उतना ही रहा, लेकिन करने वाले लोग घट गए जिससे काम का बोझ बढ़ गया.
जेनेन कहते हैं, "हमारे पास 100 लोगों की टीम हो सकती है और अब भी काम पूरा होना बाक़ी है."
"मैं कोशिश करूंगा कि अच्छी छाप छोड़ूं"
कूपर कहते हैं, "अगर आप असुरक्षित महसूस कर रहे हैं तो आप यह सुनिश्चित करेंगे कि आप हमेशा काम करते रहें और (कंपनी के लिए) आप ज़रूरी बन जाएं."
"आप रात में भी ईमेल भेजेंगे, रात में भी काम करेंगे. आप अधिक छुट्टियां नहीं लेंगे या अगर आपने छुट्टी ली है तो परिवार तो छुट्टी मनाएगा, लेकिन पति-पत्नी पूल के क़रीब बैठकर काम करते रहेंगे."
अहम बात यह है कि कर्मचारी इसका ज़िक्र भी नही करेंगे कि वे ऐसा कर रहे हैं.
वर्मा कहती हैं, "मैं कंपनी पर और अपने ग्राहकों पर एक अच्छी छाप छोड़ना चाहती हूं जब तक कि यह बोझ मेरे नतीजों पर बुरा असर न डाले."
उनको लगता है कि उनके नियोक्ता "समझदार और दयालु" हैं. "कुछ भी होता है तो वे कहते हैं कि मैं छुट्टी ले लूं, लेकिन मुझे काम पूरा करना अच्छा लगता है."
काम का बोझ ज़्यादा है और आप यह कर नहीं सकते- यह स्वीकार करना आपकी नौकरी जाने की वजह बन सकता है.
समस्या बड़ी होती जा रही है और कंपनियां इससे निपटने में बहुत कम दिलचस्पी दिखा रही हैं.
CIPD ने ब्रिटेन की जिन कंपनियों का सर्वे किया, उनमें से 63 फीसदी कंपनियों में छुट्टी के दिन काम करने की समस्या देखी गई, लेकिन उनमें से आधी से ज़्यादा कंपनियों ने इससे निपटने के लिए कोई कोशिश नहीं की है.
कूपर कहते हैं, "यह लाइन मैनेजरों से जुड़ा है. एक समाधान तो यह है कि जहां पर लोग छुट्टी के दिन घर पर ऑफ़िस के काम कर रहे हैं उनके लाइन मैनेजर सामाजिक और दयालु हों."
काम के बोझ से जूझ रहे कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार हो और उनके लिए किस तरह सहायक माहौल बनाया जाए ताकि वे अपनी समस्या सामने रख सकें, इसका प्रशिक्षण बहुत अहम है.
CIPD की वरिष्ठ रोज़गार संबंध सलाहकार रैचेल सफ़ कहती हैं, "मैनेजरों को अपने कर्मचारियों का तनाव हल्का करने में मदद करनी चाहिए, न कि उसे बढ़ाना चाहिए."
"बहुत सारे मैनेजर इसमें नाकाम रहते हैं क्योंकि उनको इसका प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, जबकि वही पहले व्यक्ति होते हैं जिनसे कोई समस्या होने पर कर्मचारी संपर्क करते हैं."
लीविज़्म (leaveism) की समस्या वाली एक चौथाई कंपनियों ने CIPD को बताया है कि वे इसे कम करने के उपाय कर रही हैं, जिसके लिए कर्मचारियों को बेहतर समर्थन दिया जा रहा है.
काम और ज़िंदगी के बीच संतुलन
कुछ नियोक्ता अपने कर्मचारियों के छुट्टी के दिन काम करने के जोखिम को समझते हैं. वर्मा ने अपने काम के बोझ के बारे में बॉस से बात की. कंपनी का विस्तार हो रहा था, इसलिए अतिरिक्त नियुक्ति की मंजूरी मिल गई.
वर्मा का काम एक सहयोगी के साथ बंट गया. वह कहती हैं, "मेरे नियोक्ता ने माना कि मेरे पास काम का बोझ ज़्यादा था. उन्होंने मुझे एक प्रशिक्षु कर्मचारी रखने की अनुमति दी जिससे मेरा बोझ कुछ कम हो."
जेनेन जब छुट्टी से वापस ऑफ़िस पहुंचे तो छुट्टी लेने की वजह के बारे में उनकी मैनेजर से बात हुई.
"वह बहुत निराश हुए कि मैं छुट्टी लेकर आराम करने की जगह ऑफ़िस का काम करता रहा."
"मैं समझता हूं कि उनका मतलब क्या था. यह ज़रूरी है कि आप ख़ुद को बहुत ज़्यादा धक्का न दें. यदि आप बर्नआउट से बचना चाहते हैं तो काम और ज़िंदगी के बीच संतुलन बहुत ज़रूरी है."
कूपर भी इसे अहम मानते हैं, "मुझे लगता है कि हम लीविज़्म की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं."
"हमें वरिष्ठ लोगों को यह समझाने की ज़रूरत है कि अगर संतुलन बेहतर रहेगा तो हमारी उत्पादकता में सुधार होगा."
"यदि लोग मर कर काम करें तो न सिर्फ़ वे बर्नआउट के शिकार हो जाएंगे, बल्कि इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि उनकी उत्पादकता सुधर जाएगी."
जेनेन के बॉस ने उनको फिर से छुट्टी लेकर ऑफ़िस के छूटे हुए काम न करने को कहा. जेनेन को यह ताकीद भी मिली कि काम ज़्यादा होने की कोई समस्या हो तो वह उनसे बात करें.
जेनेन ने बात सुनी लेकिन उस पर अमल नहीं किया. उन्होंने फिर से छुट्टी लेकर कंपनी की वेबसाइट के लिए आलेख लिखा.
वह कहते हैं, "मेरे बॉस नहीं जानते. लेकिन शायद इस लेख के बाद ऐसा नहीं रह जाएगा."
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी वर्कलाइफ़ पर उपलब्ध है.)
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