You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
इन नौकरियों में क्यों है झूठ बोलने वाले का बोलबाला?
- Author, क्रिस्टीन रो
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
सबसे पहले मैं बता दूं कि मैं झूठ बोलती हूं. बहुत झूठ बोलती हूं.
मैं बातचीत शुरू या ख़त्म करने के लिए, दूसरों की भावनाओं के लिए या अपने लिए, सामाजिक और पेशेवर ज़िंदगी को आसान बनाने के लिए कई झूठ बोलती हूं.
कुछ हद तक हम सभी जानते हैं कि जिन लोगों के साथ हम काम करते हैं वे हमसे झूठ बोल रहे हैं.
वे हर दिन खुश नहीं रह सकते. वे हर दिन काम के प्रति जोश में नहीं रह सकते. उनकी जगह किसी सहकर्मी को प्रमोशन मिल जाए तो इससे उन्हें खुशी नहीं मिल सकती.
लेकिन तब आप क्या कहेंगे जब धोखा सिर्फ़ मूड पर निर्भर न हो, बल्कि यह नौकरी का हिस्सा हो?
एक नये शोध से पता चला है कि कुछ पेशों में झूठ इसलिए चलता है क्योंकि वहां यह धारणा बन गई है कि जो लोग सच को तोड़ते-मरोड़ते हैं, वास्तव में वे ही इन नौकरियों के लिए बेहतर हैं.
दफ़्तर में झूठ बोलना
आम तौर पर दफ़्तर में छल-कपट को नकारात्मक रूप में देखा जाता है. आम धारणा है कि अगर कोई व्यक्ति झूठ का सहारा लेता है तो वह अपने काम में अच्छा नहीं होगा.
छल और कपट से भरोसा टूटता है और यह टीमवर्क के लिए ज़हर का काम कर सकता है.
लेकिन अमरीकी शिक्षाविदों ब्रायन सी गुनिया और एम्मा ई. लेविन के हालिया शोध के मुताबिक जिन नौकरियों में ग्राहक संतुष्टि से ज़्यादा बिक्री बढ़ाने पर जोर रहता है, वहां यह नियम नहीं चलता.
मार्केटिंग में, ग्राहक सेवा के तहत ग्राहक की ज़रूरतों को पूरा करने पर जोर रहता है, जबकि बिक्री सेवा में विक्रेता के अपने लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित रहता है.
कुछ पेशों, जैसे- निवेश बैंकिंग में लगभग पूरी तरह बिक्री बढ़ाने पर फ़ोकस रहता है.
गुनिया और लेविन ने अपने शोध प्रतिभागियों से मार्केटिंग की कुछ नौकरियों और काल्पनिक कर्मचारियों की योग्यता की रैंकिंग करने को कहा.
शोध प्रतिभागियों में अमेजॉन की मैकेनिकल टर्क क्राउडसोर्सिंग के 500 बिज़नेस छात्र और सर्वे करने वाले शामिल थे.
उनको कुछ परिदृश्य बताए गए, जैसे- 'जूली' टैक्सी का किराया बढ़ा-चढ़ाकर बताती है और 'जेम्स' नौकायन के दीवाने बॉस के साथ जाने के लिए इसका आनंद लेने का नाटक करता है.
झूठ से क़ामयाबी
उत्तरदाताओं का मानना था कि जो लोग झूठ का सहारा ले रहे थे, वे बिक्री-उन्मुखी नौकरियों में ज़यादा सफल होंगे. उन्होंने ऐसे लोगों को नौकरी पर रखने को भी प्राथमिकता दी.
उदाहरण के लिए, 84 फीसदी प्रतिभागियों ने बिक्री बढ़ाने वाली नौकरियों में ऐसे लोगों को नौकरी देना पसंद किया.
75 फीसदी प्रतिभागियों ने बिक्री को छोड़कर दूसरी सेवाओं में ईमानदार लोगों को नियुक्त करने का विकल्प चुना.
ये नतीजे दिलचस्प हैं, लेकिन निश्चित नहीं. गुनिया और लेविन के शोध प्रतिभागियों को बहुत कम भुगतान किया गया था.
मैकेनिकल टर्क जैसी सर्वे एजेंसियां पर बहुत कम पैसे देने और शोषण करने के आरोप लगते रहे हैं.
यह भी तय नहीं है कि सर्वेक्षण के उत्तरदाताओं का विश्वास नौकरी देने वाले मैनेजरों से मेल खाता हो.
शिकागो यूनिवर्सिटी के बूथ स्कूल ऑफ बिज़नेस की लेविन कहती हैं, "हमने जानबूझकर बिज़नेस छात्रों को शामिल किया क्योंकि आगे चलकर वही इस क्षेत्र में काम करेंगे."
लेविन का कहना है कि मैनेजमेंट की नौकरियों में जाने के इच्छुक छात्र वास्तव में ऐसा मान सकते हैं कि "इन पेशों में झूठ बोलना एक योग्यता की तरह है. भविष्य में नौकरियों पर रखते समय भी यही बातें उनके मन में होंगी."
झूठ का बोलबाला
झूठ बोलना कुछ हद तक स्वाभाविक है.
दार्शनिक डेविड लिविंगस्टोन स्मिथ ने अपनी किताब 'व्हाई वी लाई: द इवॉल्यूशनरी रूट्स ऑफ़ डिसेप्शन एंड द अनकांशस माइंड' में लिखा है- "कुदरत धोखे से भरी हुई है."
वायरस जिस शरीर में रहते हैं, उसी की प्रतिरक्षा प्रणाली को धोखा देते हैं. गिरगिट शिकारियों को चकमा देने के लिए रंग बदलते हैं.
इंसान भी अपवाद नहीं हैं, दफ़्तरों में भी नहीं. मिसाल के लिए, नौकरियों देने वाले मैनेजर मानते हैं कि लगभग सभी आवेदक अपनी योग्यता के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर दावे करते हैं.
कुछ नौकरियों में (जैसे अंडरकवर जासूस के लिए) झूठ बोलना ज़रूरी होता है. कुछ लोगों के लिए कूटनीति झूठ का पर्याय है.
कुछ कंपनियां रणनीतिक तौर पर भी झूठ बोलती हैं, जैसे- कॉल सेंटर अपने कर्मचारियों को निर्देश देते हैं कि वे किसी दूसरे देश में स्थित होने का दिखावा करें.
झूठ स्वाभाविक लगता है
सामान्य तौर पर दफ़्तरों के छल-कपट को परिभाषित करना मुश्किल है.
ग्राहक सेवाओं, ख़ास तौर पर महिला कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले भावनात्मक श्रम में कर्मचारियों को अपनी भावनाएं जाहिर न करने को कहा जाता है.
क्या आप वास्तव में चाहेंगे कि कोई फ्लाइट अटेंडेंट, बारटेंडर या मनोचिकित्सक आपसे यह कहे कि आपको अशांति से चिंतित होना चाहिए, या उनको आपसे घिन आती है या उनको आपसे कोई सहानुभूति नहीं है?
कुछ नौकरियों में भद्रता दिखाने या देखभाल के प्रदर्शन की ज़रूरत होती है जो आंशिक रूप से कृत्रिम (और तनावपूर्ण) होती है.
लेविन कहती हैं, "लोगों को लगता है कि जो लोग अपनी भावनाएं नियंत्रित कर पाते हैं वे उनकी तुलना में ज़्यादा सक्षम हैं जो ऐसा नहीं कर पाते."
सोशल मीडिया पर प्रभावशाली लोगों के लिए यह ख़ास तौर पर सच है, जो प्रामाणिकता और बेचने की कला के बीच का फर्क मिटा देते हैं.
उदाहरण के लिए, इंस्टाग्राम के सितारे खर्चीली सगाई का दिखावा करके चौंका देते हैं, लेकिन भ्रम टूटने पर यह उलटा पड़ सकता है.
छोटे मोटे झूठ
कई बार दूसरों के हित में छोटे-मोटे झूठ बोल देना एक नैतिक विकल्प के रूप में देखा जाता है.
लेविन कहती हैं, "शोध के दौरान मैंने पाया कि कई लोग उस झूठ का स्वागत करते हैं और उसकी तारीफ भी करते हैं जो उनके फायदे के लिए बोला गया हो."
मिसाल के लिए "कर्मचारियों को लगता है कि उनके सहकर्मियों को अपने फीडबैक में उनका बचाव करना चाहिए."
"कैंसर के मरीजों को उनके डॉक्टर झूठी दिलासा दिलाएं तो इसे भी सराहा जाता है."
समाज के लिए बोले गए ऐसे झूठ या बेईमानी की पहचान यह है कि इसका मकसद दूसरे की भलाई या मदद हो, न कि अपना फायदा.
इस तरह के रवैये पर सांस्कृतिक असर भी हो सकता है. कुछ शोध बताते हैं कि समूहवादी संस्कृतियों में सामाजिक सद्भाव बचाने के लिए लोगों के झूठ बोलने की संभावना अधिक रहती है.
मेरीलैंड यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक मिचेल गेल्फैंड ने एक अध्ययन में 8 देशों के 1,500 बिज़नेस छात्रों को ऐसी व्यापारिक सौदेबाज़ी की स्थिति दी, जिसमें झूठ बोलने से मदद मिलने वाली थी.
झूठ लगभग सभी ने बोले, लेकिन समूहवादी देशों (जैसे दक्षिण कोरिया और ग्रीस) के छात्रों ने व्यक्तिवादी देशों (जैसे ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी) के छात्रों की तुलना में ज़्यादा झूठ बोला.
गेल्फैंड कहती हैं, "कभी-कभी अलग सोच भी नियमों को तोड़ने-मरोड़ने जैसा लगता है."
कुछ अध्ययनों में रचनात्मकता और बेईमानी में भी एक संबंध पाया गया है, क्योंकि रचनात्मक क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए अपनी धोखाधड़ी को तर्कसंगत बना देना आसान होता है.
पता लगाना मुश्किल
दफ़्तरों में झूठ के प्रति सहिष्णुता (या प्रोत्साहन) का पता लगाना मुश्किल हो सकता है.
सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ हांगकांग में मैनेजमेंट के प्रोफेसर लॉन्ग वांग कहते हैं, "किसी भी संगठन या उद्योग में धोखाधड़ी के मानदंडों को गोपनीय रखा जाता है, कम से कम उनको जनता की नज़रों से बचाकर रखा जाता है."
लेकिन उनको लगता है कि इस तरह के मानदंड टिकाऊ नहीं रह पाते. वांग कहते हैं, "समय के साथ वे बाहर निकल जाते हैं."
छोटे-मोटे धोखे हमेशा हानिकारक नहीं होते. लेकिन सामान्य तौर पर, यदि दफ़्तर में लोग सच्चाई पर भरोसा करने में सशक्त महसूस करें तो ऐसे दफ़्तर अधिक प्रभावी होंगे.
कुछ प्रमुख नेता इसके अच्छे उदाहरण हैं जिनके झूठ के बड़े नुकसानदेह और विभाजनकारी नतीजे हो सकते हैं.
तो क्या वे सारे छोटे-मोटे झूठ जो मैं बोलती रहती हूं, क्या वे नौकरी में मुझे बेहतर बनाते हैं? शायद नहीं.
लेकिन मुझे उनके बारे में बहुत तनाव लेने की ज़रूरत नहीं है.
जैसा कि लेविन कहती हैं, "हम इस बात की बहुत परवाह करते हैं कि दूसरे लोग हमारे प्रति क्या इरादा रखते हैं, लेकिन हम इस पर बहुत ध्यान नहीं देते वे सच बोल रहे हैं या झूठ."
(बीबीसी कैपिटल पर इस स्टोरी को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी कैपिटल को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)