रोबोट के दौर में नौकरी बचाने के तीन तरीके

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- Author, टिम मैकडोनल्ड
- पदनाम, बीबीसी कैप्टिल
जैसे-जैसे मशीनों की कृत्रिम मेधा अधिक उपयोगी और व्यापक हो रही है, श्रमिकों को चिंता होने लगी है कि स्वचालन का नया युग उनके करियर की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है.
प्यू रिसर्च के एक ताज़ा अध्ययन में पाया गया कि विकसित और उभरती हुई 10 अर्थव्यवस्थाओं में ज़्यादातर श्रमिकों को लगता है कि अभी जो काम इंसान करते हैं, अगले 50 साल के अंदर उनमें से ज़्यादातर काम कंप्यूटर करेंगे.
रोजगार बाज़ार पर कृत्रिम मेधा और स्वचालन के प्रभावों को लेकर श्रमिकों की बेचैनी साफ-साफ दिखती है.
कार्यबल का कितना हिस्सा स्वचालित हो जाएगा, इस बारे में अलग-अलग अनुमान हैं. ये अनुमान 9 फीसदी से लेकर 47 फीसदी तक जाते हैं.
आर्थिक सलाहकार कंपनी मैकिंज़ी का अनुमान है कि 2030 तक रोबोट दुनिया भर में 80 करोड़ मजदूरों के बराबर काम करने लगेंगे.
कुछ नौकरियां नाटकीय रूप से बदल जाएंगी जबकि कुछ दूसरी नौकरियां पूरी तरह से गायब हो जाएंगी.
स्वचालन यदि रोजगार बाज़ार को म्यूजिकल चेयर के गेम की तरह बदल रहा है तो क्या यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका है कि म्यूजिक बंद होने के बाद भी आपकी नौकरी बची रहे?
क्या शिक्षा आपके करियर को रोबोट-प्रूफ़ बनाने में मदद कर सकती है?
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कुशलता बढ़ाते रहिए
नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट जोसेफ एऑन के मुताबिक भविष्य में नौकरी सुरक्षित रहे, यह सही नौकरी चुनने पर कम और कुशलता को लगातार बढ़ाते रहने पर ज़्यादा निर्भर करेगा.
एऑन 'रोबोट प्रूफ़ : हायर एजुकेशन इन द एज़ ऑफ़ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस' नामक किताब के लेखक भी हैं.
वह कहते हैं कि यदि श्रमिकों को नये वातावरण में ढलना है तो शिक्षा को पूरी तरह बदलना होगा. वह इस समस्या का निदान ह्यूमैनिक्स (humanics) में देखते हैं, जिसके तीन बुनियादी स्तंभ हैं:
1. तकनीकी दक्षता
यह समझना कि मशीनें कैसे काम करती हैं और उनसे बातचीत कैसे की जाती है.
जैसे-जैसे कृत्रिम मेधा और रोबोटिक्स की क्षमता बढ़ रही है, मशीनें उन भूमिकाओं में भी प्रवेश करेंगी जिनमें अभी इंसान का एकाधिकार है.
कुछ कर्मचारी नहीं टिक पाएंगे, लेकिन अन्य लोग मशीनों के साथ काम करने लगेंगे और शायद वे पहले से कहीं ज़्यादा उत्पादक भी हो जाएंगे.
नये कार्यस्थलों में कोडिंग और इंजीनियरिंग सिद्धांतों की समझ रखने वाले श्रमिकों को तवज्जो मिलेगी.
2. डेटा अनुशासन
मशीनों द्वारा उत्पन्न सूचनाओं को संभालना.
श्रमिकों को सूचनाएं पढ़ने, उनका विश्लेषण और इस्तेमाल करने के लिए डेटा साक्षर होना पड़ेगा. ये सूचनाएं अब प्रमुख व्यावसायिक फ़ैसलों से लेकर स्टॉक के चुनाव और खरीद निर्णय तक सब कुछ निर्देशित कर रही हैं.
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3. मानव अनुशासन
इंसान ऐसा क्या कर सकते हैं जो निकट भविष्य में मशीनें नहीं कर सकतीं.
एऑन इसमें रचनात्मकता, सांस्कृतिक चपलता, हमदर्दी और एक संदर्भ से जानकारी लेने और दूसरे संदर्भ में उसे लागू करने की काबलियत को रखते हैं. शैक्षिक दृष्टि से इसका अर्थ है कक्षा पर कम और प्रायोगिक शिक्षा पर ज़्यादा जोर देना.
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम के मुताबिक स्वचालन से एकाउंटिंग जैसी कई सफ़ेदपोश नौकरियों को ख़तरा होगा, जबकि ओईसीडी (OECD) का कहना है कि कम कौशल वाली नौकरियों पर सबसे ज़्यादा संकट होगा और शिक्षा एवं आमदनी के बीच मज़बूत संबंध बना रहेगा.
दोनों ही स्थितियों में, श्रमिकों की कुशलता पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से पुरानी पड़ती जा रही है.
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जो सीखा वह पुराना पड़ गया
वैश्विक सलाहकार फ़र्म डेलॉयट के फ़्यूचर ऑफ़ वर्क सेंटर ऑफ़ एक्सीलेंस के प्रमुख इंद्रनील रॉय कहते हैं, "एक पीढ़ी पहले तक कोई कुशलता करीब 26 साल में पुरानी पड़ने लगती थी. आज वह करीब साढ़े चार साल में ही पुरानी पड़ जाती है."
एऑन बदलाव की तेज़ गति को अनिवार्य रूप से नकारात्मक नहीं मानते. विश्वविद्यालयों को आजीवन शिक्षा देने और करियर के बीच में ट्रेनिंग पर ध्यान केंद्रित करना होगा.
वह कहते हैं, "हम लगातार पुराने पड़ते जा रहे हैं. कुछ मायनों में यह हम सब के लिए खुद को फिर से शिक्षित और अपडेट करने का बड़ा मौका है. जो ऐसा कर पाएंगे, वे तरक्की करने में सक्षम होंगे."
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की वर्तमान शिक्षा प्रणाली इस नई वास्तविकता के लिए तैयार नहीं है.
बहुत सारे विश्वविद्यालय चार साल के स्नातक पाठ्यक्रमों और अकादमिक शोध पर ज़्यादा ध्यान देते हैं.
एऑन कहते हैं कि छात्रों को स्नातक बनाने जितना ही महत्वपूर्ण है उनको मानविकी में मास्टर करने में मदद करना.
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अनुभव ही काम आएगा
समाधान वास्तविक दुनिया के अनुभवों पर ज़्यादा जोर देने से मिलेगा. इसका मतलब पढ़ाई के दौरान नौकरी या लंबी अवधि की इंटर्नशिप करना भी हो सकता है.
करियर के अनुभव के साथ-साथ यह छात्रों को मोल-भाव करना और सहकर्मियों के साथ घुलने-मिलने का कौशल भी सिखाता है.
"यह आपको नये अवसर देखने और कमियां दूर करने के मौके भी देता है. यही वह जगह है जहां आप तय कर सकते हैं कि आपको कोई कंपनी शुरू करनी है या कुछ और करना है."
रॉय इस बात से सहमत हैं कि अमूर्त जीवन-कौशल कई नियोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं.
डेलॉयट के कुछ प्रगतिशील ग्राहक एनालिटिक्स जैसे कौशल के लिए कृत्रिम मेधा का इस्तेमाल करते हैं.
गहन तकनीकी कौशल के लिए वे फ्री-लांसर की सेवाएं लेते हैं और सिर्फ़ उन लोगों को नौकरी पर रखते हैं जो जीवन-कौशल और संगठन से निकटता रखने वाले मूल्यों से समृद्ध हों.
मगर रॉय का कहना है कि इस तरह के कौशल ज़्यादातर विश्वविद्यालयों के वातावरण के बाहर से ही आते हैं.
मैकिंज़ी का अनुमान है कि 2030 तक लोग 2016 की तुलना में तकनीकी कौशल का उपयोग करते हुए 55 फीसदी ज़्यादा समय बिताएंगे.
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नौकरियां बढ़ेंगी!
वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम को लगता है कि स्वचालन से नौकरियां घटेंगी नहीं बल्कि बढ़ेंगी, क्योंकि कुछ नौकरियां ख़त्म होंगी मगर उससे ज़्यादा नौकरियां पैदा होंगी.
रॉय कहते हैं कि भविष्य के कार्यस्थलों पर रोबोट इंसानों के साथ काम करेंगे. डेलॉयट के कुछ ग्राहकों के पास कृत्रिम मेधा वाली प्रणालियां हैं तो बैठकों में भी हिस्सा लेते हैं.
एऑन इस बात से सहमत हैं कि मशीनों के साथ हमारे बदलते संबंधों को समझना और उसके मुताबिक शिक्षा को ढालना महत्वपूर्ण है.
"ठीक उसी तरह जैसे जब हमारे पास सेल्फ ड्राइविंग कार हो तो ड्राइविंग की ट्रेनिंग बदल जाएगी. इसलिए यदि तकनीक कुछ क्षेत्रों को चलन से बाहर कर रही है लेकिन यह इंसानों को चलन से बाहर नहीं कर पाएगी."
सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इंसानों को उन कौशल पर ध्यान लगाने की जरूरत है जिनकी नकल करना मशीनों की कृत्रिम बुद्धि के लिए कठिन है.
विशेष तौर पर एक संदर्भ से ज्ञान अर्जित करना और दूसरे संदर्भ पर इसे लागू करना. ह्यूमैनिक्स (Humanics) अपने आप में तीन अलग-अलग विषयों का संयोजन है.
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इंसान की बराबरी मुश्किल
एऑन कहते हैं, "हम इंसान रचनात्मक हैं, मौलिक हैं और उद्यमशील हैं. हम अन्य लोगों के साथ घुलने-मिलने में, उनके साथ काम करने सक्षम हैं. हममें संवेदना है."
"हम सांस्कृतिक रूप से चपल हो सकते हैं, अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों के साथ काम कर सकते हैं. हम वैश्विक होने में सक्षम हैं."
रॉय का कहना है कि अमरीका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के विश्वविद्यालय बहु-विषयक पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं. लेकिन अन्य देशों के कॉलेज और विश्वविद्यालय अब भी पारंपरिक ढर्रे पर चल रहे हैं.
तकनीक हमारी उम्मीदों को लगातार बड़ा कर रही है. बदलाव निश्चित है. रॉय कहते हैं कि मशीनें हर रोज बाधाएं तोड़कर हैरान कर रही हैं.
इसलिए शायद म्यूजिकल चेयर जैसे रोजगार बाज़ार में श्रमिकों को बचे रहने में मदद करना काफी नहीं है.
हो सकता है कि उनको ऐसे हालात में भी बचे रहने की जरूरत हो जहां सारी कुर्सियां लगातार घूम रही हों.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैप्टिल पर उपलब्ध है.)
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