आत्ममुग्ध लोग क्यों हो जाते हैं 'कामयाब'?

    • Author, विशाला श्री-पद्म
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

हर ऑफ़िस में एक ना एक व्यक्ति डींग हांकने वाला होता ही है. वह अपने बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बोलता है और साथ काम करने वालों को कमतर आंकता है.

ऐसा व्यक्ति ख़ुद को बेहद ख़ास मानता है और यदि दूसरे लोग उसे भाव ना दें तो तमतमा उठता है. मनोवैज्ञानिक ऐसे आत्ममुग्ध व्यक्ति को 'नार्सिसिस्ट' कहते हैं.

'नार्सिसिस्ट' शब्द यूनान की पौराणिक कथाओं के किरदार नार्सिसस से बना है, जो पानी में बने अपने ही अक्स पर मोहित हो गया था.

दफ़्तरों में इस तरह के आत्ममुग्ध लोग मिल ही जाते हैं. अगर वक़्त रहते उनकी पहचान कर ली जाए तो बेवजह के तनाव से बचा जा सकता है.

'ज़ेन योर वर्क' की लेखिका कार्लिन बोरिसेन्को अपने करियर के शुरुआती दिनों में ऐसे ही एक आत्ममुग्ध बॉस के साथ काम करती थीं.

बोरिसेन्को कहती हैं, "मैं उनकी दीवानी थी, उन्हें करिश्माई और स्मार्ट समझती थी और उनके साथ काम करने को लेकर बहुत उत्साहित थी."

तीन महीने तक साथ काम करने और अपनी बॉस की रोज़ाना की हरकतें देखने के बाद बोरिसेन्को की समझ में आया कि कुछ गड़बड़ है.

बोरिसेन्को का ज़्यादातर वक़्त अपनी बॉस को ख़ुश रखने में बीतता था. दफ़्तर में दूसरे लोगों के सामने उन्हें बॉस की बड़ाई करनी होती थी. यदि ऐसा नहीं होता तो बॉस बुरा मान जाती थीं.

कई दिनों तक लगातार ऐसा होता रहा तो खीझ होने लगी. बोरिसेन्को कहती हैं, "मैं सोचती थी कि वह क्या देखती हैं जो मैं नहीं देखती. वह क्या समझती हैं जो मैं नहीं समझती. धीरे-धीरे समझ में आया कि उनके लिए मैं क्या करती हूं इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह दुनिया को किस नज़रिये से देखती हैं."

बोरिसिन्को अकेली नहीं थीं, जिन्हें बॉस की हेकड़ी से दिक़्क़त थी. दफ़्तर में कई लोग परेशान थे. लेकिन बॉस की कमियों को पहचानने की जगह वे आपस में एक-दूसरे के दुश्मन बन बैठे.

हालात बदलने के लिए कुछ ना कर पाने की खीझ सब पर हावी हो गई और उनमें बॉस को ख़ुश रखने की एक प्रतियोगिता शुरू हो गई.

विश्वास से बनता है करियर

डींग हांकने वालों के साथ काम करना चाहे जितना मुश्किल हो, लेकिन कई शोध दूसरी कहानी कहते हैं. आत्ममुग्ध लोग अपने करियर में अच्छी तरक़्क़ी करते हैं और कंपनी के लिए भी वे काम के होते हैं. सवाल है कि कैसे?

नार्सिसिस्ट आसानी से हार नहीं मानते. नाकामी के बावजूद वे लगातार कोशिश करते रहते हैं. वे झूठ बोलते हैं, बातें बनाते हैं, लेकिन लक्ष्य से ध्यान नहीं हटाते.

ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डॉक्टर टिम जज ने कारोबार पर नार्सिसिस्ट लोगों के असर का अध्ययन किया है. वे कहते हैं कि डींग हांकने वाले लोगों में ऐसी कई ख़ूबियां होती हैं जो उन्हें बॉस की कुर्सी तक पहुंचा देती है.

"वे करिश्माई बनना चाहते हैं. वे मुश्किल हालात में भी नेतृत्व कर लेते हैं. ज़रूरत पड़ने पर वे जोख़िम उठा लेते हैं. किसी कंपनी को मुश्किल वक़्त से निकालने में ये ख़ूबियां ज़रूरी होती हैं."

सवाल है कि क्या स्वयं पर मुग्ध होने की ख़ूबी जन्मजात होती है या यह समय के साथ विकसित होती है? टिम जज कहते हैं कि दोनों चीज़ें हो सकती हैं.

कुछ लोगों में आत्ममुग्धता का गुण जन्म से ही होता है तो कुछ दूसरे लोगों में यह परवरिश, उनकी आर्थिक हैसियत और ऑफ़िस के हालात पर निर्भर करता है.

ऊंची सामाजिक-आर्थिक हैसियत वाले घरों में पैदा हुए बच्चे घमंडी हो जाते हैं. परिवार का लाड़-प्यार उनके अहंकार को और बढ़ा देता है. यह सब उन्हें नार्सिसिस्ट बना देता है.

बड़े नेताओं के गुण

आत्ममुग्धता एक विकार है, लेकिन कई जाने-माने लोग भी ऐसे रहे हैं. टिम जज कहते हैं, "चुनौतियों से जूझने वाले और बदलाव लाने वाले नेताओं में अक्सर ऐसे गुण मिलते हैं. अमरीका के कई करिश्माई राष्ट्रपति नार्सिसिस्ट रहे हैं." जॉन एफ़. कैनेडी और रोनाल्ड रीगन इसके प्रमुख उदाहरण हैं.

सवाल है कि क्या सचमुच आत्मकेंद्रित और बड़बोले लोग अपने करियर में अच्छा करते हैं?

डॉक्टर टिम जज इस सवाल पर हामी भरते हैं. वे कहते हैं, "उनका फ़ोकस ग़ज़ब का होता है. वे दूसरों पर नहीं बल्कि अपनी ज़रूरतों का ध्यान रखते हैं. यह फ़ोकस ही उन्हें कामयाबी दिलाता है. पैसे दिलाता है और सम्मान भी दिलाता है."

यदि आप चाहते हैं कि कोई निवेशक आप पर पैसे लगाए या ग्राहक आपको पैसे दें तो अपने ऊपर विश्वास बहुत ज़रूरी है. लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि यह विश्वास भ्रम ना बन जाए.

कैलिफ़ोर्निया के हास बिज़नेस स्कूल में लीडरशिप के प्रोफ़ेसर डॉन मूर कहते हैं कि अति आत्मविश्वास के ख़तरे बहुत हैं. ख़ुद के बारे में ग़लत धारणा बनाने की मूर्खता कई ग़लतियां करा सकता है.

तो फिर अति-आत्मविश्वास से भरे लोगों की कामयाबी का राज़ क्या है?

मूर कहते हैं, "आत्मविश्वास से दमकते चेहरे पर लोग भरोसा कर लेते हैं. वे उनके मुरीद बन जाते हैं. वे बढ़-चढ़कर बातें करने वालों को बढ़ावा देते हैं."

किस्मत बढ़ाती है अहंकार

नौकरी में प्रमोशन पाने के लिए या तो आपको अच्छा होना होता है या फिर आपकी क़िस्मत अच्छी होनी चाहिए.

मूर कहते हैं, "अच्छी किस्मत से कुछ मिला तो उसे अपनी काबिलियत समझ लेने की ग़लती करने में देर नहीं लगती. तब आप यह मानने लगते हैं कि आप जैसे हैं, असल में उससे कहीं बढ़कर हैं."

कम आत्मविश्वास इससे भी ख़तरनाक है. इसमें आदमी ख़ुद को किसी भी काम के लिए अनफ़िट समझ लेता है.

ज़रूरी है कि ख़ुद को पहचाना जाए. अपनी ख़ूबियों के साथ-साथ कमज़ोरियों का भी पता होना चाहिए. मूर कहते हैं, "अपने ऊपर भरोसा रखिए. आत्ममुग्ध लोगों से भी एक सबक सीखना चाहिए. ख़ुद पर विश्वास रखने का सबक."

कार्लिन बोरिसेन्को के मुताबिक़, नार्सिसिस्ट अपने लिए वैसे हालात तैयार कर लेते हैं जहां वे होना चाहते हैं. कई बार वे बदलाव के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं.

"अमरीका के डॉनल्ड ट्रंप बेहतरीन उदाहरण हैं. उन्हें पक्का भरोसा था कि वे राष्ट्रपति बनेंगे इसलिए वे राष्ट्रपति बन गए. अगर उन्हें यह विश्वास नहीं होता तो ऐसा कभी नहीं हो पाता."

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