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नौकरी पाने में आपके साथ भेदभाव हुआ क्या?
- Author, टिफैनी वेन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
एकरूपता से बेहतर है विविधता. अलग रूप, रंग, नस्ल, लिंग और संस्कृतियों के लोग सामूहिक रूप से एक जैसे लोगों के मुकाबले बेहतर फ़ैसले कर सकते हैं.
किसी कंपनी या संगठन में काम करने वाले सभी लोग एक जैसे न हों, इससे अब शायद ही किसी को इंकार होगा.
महिलाएं भी पुरुषों की तरह सक्षम हैं. शारीरिक विकलांगता अब कोई बाधा नहीं है और जाति या नस्ल से किसी की कुशलता प्रभावित नहीं होती.
मैनेजमेंट कंसल्टेंसी फर्म मैकिन्से के मुताबिक जिन कंपनियों में लैंगिक और नस्लीय विविधता ज्यादा होती है, वे कंपनियां औसत के मुकाबले बेहतर मुनाफा कमाती हैं.
इन सबके बावजूद जब नौकरी देने का मौका आता है, तब अल्पसंख्यक और हाशिये पर खड़े लोगों के साथ भेदभाव होता है.
कई बार नौकरी देने वालों को भी पता नहीं होता कि उन्होंने किसी के साथ भेदभाव किया है या किसी को बेवजह ही काम पर नहीं रखा.
योग्य उम्मीदवार की तलाश
अपने स्टाफ में किसी नये सदस्य की भर्ती करते समय नियोक्ता उन खूबियों की सूची बनाते हैं जो उनके कर्मचारी में होनी चाहिए. यहीं से भेदभाव की शुरुआत हो जाती है.
नौकरी देने वाले किसी पद पर रहे पिछले कर्मचारी के गुणों का पैमाना बना लेते हैं और नये आवेदकों में वैसी ही खूबियां तलाशते हैं.
जिस काम के लिए किसी को नौकरी पर रखा जा रहा है, वह काम पहले कर चुका आदमी एक प्रोटोटाइप या रेफरेंस प्वाइंट बन जाता है.
हार्वर्ड कैनेडी स्कूल की रिसर्च फेलो सिरी यूओटिला कहती हैं, "यदि संगठन में गोरे लोगों की बहुलता है तो इसे बदलना बहुत मुश्किल है."
कई संगठन जोखिम नहीं लेना चाहते. पिछले कर्मचारी की तरह का ही कोई व्यक्ति मिल जाए तो जोखिम कम रहता है.
नौकरी पर रखने वाले यह भी चाहते हैं कि जिसे काम पर रखा जाए वह उन जैसा ही हो. इसे होमोफिली कहते हैं. इससे बचने के लिए यूओटिला लिंक्डइन या दूसरे ऑनलाइन नेटवर्क के जरिये अलग-अलग तरह के लोगों को नौकरी पर रखने की सलाह देती हैं.
नौकरी वाले विज्ञापन
नौकरी के विज्ञापन की भाषा यह तय करती है कि किस तरह के लोग आवेदन करेंगे.
यूओटिला कहती हैं, "कुछ शब्दों को पुरुषों से और कुछ को महिलाओं से जोड़ दिया गया है."
नौकरी के विज्ञापन में यदि हंसमुख, सहयोगपूर्ण और टीम जैसे शब्द हों तो मान लिया जाता है कि जरूरत किसी महिला की है. दूसरी तरफ लीडर, आक्रामक या निंजा जैसे शब्द मर्दों से जोड़कर देखे जाते हैं.
कनाडा में हुए एक शोध से पता चला कि विज्ञापन में मर्दाना शब्द हों तो महिलाएं उस नौकरी की तरफ आकर्षित नहीं होतीं. उन्हें लगता है कि कंपनी में ज्यादा मर्द होंगे और वे फिट नहीं होंगी.
ऑनलाइन जॉब पोर्टल 'टोटलजॉब्स' ने लैंगिक भेदभाव के विश्लेषण के लिए 75 हजार से ज्यादा विज्ञापनों को देखा और पाया कि साइंस और मार्केटिंग के विज्ञापन मर्दों की तरफ झुके हुए दिखते हैं. शिक्षा और कस्टमर सर्विस के विज्ञापन महिलाओं को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं.
विज्ञापन में सिर्फ ऐसे शब्दों को लिखना संभव नहीं जो लैंगिक पहचान से अछूते हों. यूओटिला सुझाती हैं कि पुरुषों और महिलाओं की पहचान से जोड़ दिए गए शब्दों में एक संतुलन बनाया जाए.
नौकरी पर रखे जाने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारियों और टीम वर्क के बारे में जानकारी देना भी कारगर तरीका हो सकता है.
कुछ संगठनों ने सिर्फ डेमोग्राफी के स्तर पर विविधता लाने की जगह अपने टैलेंट पूल को बड़ा करने पर काम किया और कामयाबी पाई.
मिसाल के लिए, टेक्नोलॉजी कंपनियां सिर्फ कंप्यूटर के छात्रों को नौकरी पर रखने की जगह अपनी जरूरत के हिसाब से जीवविज्ञान, न्यूरो साइंस या मनोविज्ञान को छात्रों को भी नौकरी पर रख सकती हैं.
यूओटिला कहती हैं, "कर्मचारियों की कुशलता और उनकी पृष्ठभूमि का दायरा बढ़ाया जा सकता है. हमारी सलाह होती है कि नौकरी के विज्ञापनों में विशिष्ट योग्यता की सूची छोटी रखी जाए."
मशीनी भेदभाव
नौकरी के आवेदन जब बढ़ने लगते हैं तो मैनेजर लोग सही कैंडिडेट छांटने के लिए कंप्यूटर की मदद लेते हैं.
कई प्रोग्राम इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि नाम, लिंग और कुछ दूसरे तरह के डेमोग्राफिक डेटा को अलग कर दिया जाता है. लेकिन, मशीन का बढ़ता इस्तेमाल नियुक्ति प्रक्रिया में अलग तरह का भेदभाव बढ़ा रहा है.
कंप्यूटर प्रोग्राम उस डेटा के आधार पर काम करते हैं, जो उनमें फीड किया हुआ होता है. फीड किए हुए डेटा में ही यदि पूर्वाग्रह है तो कंप्यूटर से छांटे गए आवेदकों की सूची में भी भेदभाव रह जाएगा.
पेनसिल्वेनिया के हेवरफोर्ड कॉलेज में कंप्यूटर साइंस की असिस्टेंट प्रोफेसर सॉरेल फ्रिडलर कहती हैं कि एल्गोरिथ्म में अक्सर कंपनी के मौजूदा और पिछले कर्मचारियों के डेटा फीड कर दिए जाते हैं. ऐसे में इस बात की भरपूर संभावना रहती है कि कंप्यूटर प्रोग्राम मौजूदा कर्मचारियों की योग्यता के पैटर्न को ही अपना ले.
फ्रिडलर उम्मीद जताती हैं कि आने वाले समय में ऐसे प्रोग्राम तैयार होंगे जो ज्यादा पारदर्शी होंगे और किसी को चुनने और छांटने की पुख्ता वजह बता पाएंगे.
भाषायी नस्लीयता
नौकरी का इंटरव्यू फोन पर हो तो आवेदक को देखकर उसे खारिज करने की संभावना खत्म हो जाती है. लेकिन, आवाज़ सुनकर भी किसी व्यक्ति की नस्ल और उसकी सामाजिक-आर्थिक हैसियत के बारे में पता लगाया जा सकता है.
अराकांस स्टेट यूनिवर्सिटी के एक शोध से पता लगा कि नियोक्ता सामाजिक-भाषिक सूचनाओं के आधार पर भी आवेदकों की कैटेगरी बना लेते हैं.
इस शोध का मकसद यह पता लगाना था कि उन आवेदकों का क्या होता है जिनकी आवाज़ लगती तो काले लोगों जैसी है, लेकिन वे असल में काले नहीं होते.
शोध से पता चला कि करीब 89 फीसदी लोग आवाज़ सुनकर यह पता लगा लेते हैं कि बोलने वाला व्यक्ति गोरा है या काला. इस तरह चिह्नित किया गया व्यक्ति, चाहे गोरा ही क्यों ना हो, उसके साथ उचित सलूक नहीं होता.
अराकांस स्टेट यूनिवर्सिटी की फाय कोशिएरा कहती हैं, "किसी की आवाज़ सुनकर उसकी हैसियत का भी पता लगाया जा सकता है. अगर किसी व्यक्ति के बोलने का लहज़ा यूरोपियन हो तो हम उसके बारे में कुछ धारणाएं बना लेते हैं."
कोशिएरा के मुताबिक ऐसे पूर्वाग्रह सब में हो सकते हैं. जरूरत उनको समझने की और उनसे बचने की है.
पहला प्रभाव
चुने हुए आवेदक जब आमने-सामने के इंटरव्यू के लिए ऑफिस पहुंचते हैं तो उनका पहला प्रभाव
यानी फर्स्ट इंप्रेशन मायने रखता है. डील-डौल और वेशभूषा भी अहम भूमिका निभाती है.
सीवी (CV) औसत दर्जे का हो मगर व्यक्तित्व आकर्षक हो तो भी चुन लिए जाने की संभावना रहती है.
ब्रिटेन में यदि आप सामान्य से ज्यादा मोटे हैं तो आपको काम मिलना मुश्किल होता है. सीवी के साथ तस्वीर चिपकी हो तो वहीं से छंटनी हो जाती है.
लीड्स बेकेट यूनिवर्सटी के सीनियर रिसर्च फेलो स्टुअर्ट फ्लिंट कहते हैं, "सामान्य लोगों के मुकाबले मोटे लोग कमतर समझे जाते हैं. अगर रंग-रूप, भाषा, लिंग या किसी और वजह से वे दूसरे दर्जे में रखे गए हों तो उनके लिए हालात और मुश्किल हो जाते हैं. जैसे मोटी महिलाओं को मोटे पुरुषों के मुकाबले ज्यादा अनफिट माना जाता है."
फ्लिंट के मुताबिक भारी-भरकम लोगों को आलसी और भोंदू समझा जाता है. हालांकि, इस बात के सबूत नहीं हैं कि वे कम वजन के लोगों के मुकाबले कम काम करते हैं या कम बुद्धिमान होते हैं.
फ्लिंट कहते हैं कि नियोक्ता को इस बारे में बताकर इस भेदभाव का असर कम किया जा सकता है.
कुछ मामलों में आवेदकों को पर्दे की आड़ में रखने से भी फायदा होता है. अमरीकी सिंफ़नी संगीतकारों ने ऑडिशन के दौरान प्रतिभागियों की पहचान छिपाने के लिए एक पर्दे का इस्तेमाल किया तो महिला प्रतिभागियों के अगले राउंड में पहुंचने की संभावना 50 फीसदी बढ़ गई.
इंटरव्यू के समय पर्दा लगाना व्यावहारिक नहीं लगता, लेकिन इंटरव्यू में होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए दूसरे उपाय तलाशे जा सकते हैं.
युओटिला का सुझाव है कि इंटरव्यू के सवाल पहले तय कर लेने चाहिए. उनको उसी क्रम में पूछा जाना चाहिए और नंबर देने में देर नहीं करनी चाहिए.
इंटरव्यू का ढांचा तय हो तो कई तरह के भेदभाव से बचा जा सकता है. ढांचा तय ना हो तो रूप-रंग, वेशभूषा जैसी कई चीजें असर कर जाती हैं. इसे हैलो इफेक्ट कहते हैं.
युओटिला के मुताबिक कोई आवेदक यदी पहली नज़र में भा जाता है तो इंटरव्यू लेने वाले का नजरिया बदल जाता है. उसके जवाब का मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ तरीके से नहीं होता. मानदंड यदी पहले से निर्धारित हों तो इस पूर्वाग्रह का असर कम किया जा सकता है.
नीदररलैंड्स की कंसल्टेंट एलेक्जांड्रा वेन गीन ने अपने शोध से दिखाया है कि अगर कई सारे आवेदकों के इंटरव्यू एक साथ लिए जाएं तो भेदभाव से बचा जा सकता है.
मोल-भाव
किसी आवेदक को नौकरी पर रख लिए जाने के बाद भी उसके साथ भेदभाव की संभावना बनी रहती है.
मेलबर्न की मोनाश यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर आंद्रे लिब्रांट कहते हैं, "सामान्यतः माना जाता है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले तनख्वाह के लिए मोल-भाव कम करती हैं. मगर ऐसा नहीं है. जहां तनख्वाह के लिए मोल-भाव के संकेत मिलते हैं, वहां महिलाएं भी मोल-भाव करती हैं. लेकिन, जहां दुविधा की स्थिति रहती है तो महिलाएं इससे परहेज करती हैं."
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो महिलाएं खुद के लिए ज्यादा मांग करती हैं उन्हें लालची समझा जाता है. सामाजिक रूप से दंडित किया जाता है.
ऐसी स्थिति से बचने के लिए लिब्रांट कंपनियों को खुद अपना ऑडिट करने की सलाह देते हैं.
वह कहते हैं, "भेदभाव दूर करने के लिए संगठनों को खुद देखना चाहिए कि इसकी शुरुआत कहां से हो रही है और इसे कैसे खत्म किया जा सकता है."
(नोटः ये टिफैनी वेन की मूल स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी के पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं)
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिककरें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)
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