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दफ़्तरों में मिल रही आज़ादी के पीछे कौन?
आज के दौर के दफ़्तर पूरी तरह बदल गए हैं. दफ़्तर में आने के वक़्त की आज़ादी है. अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहनने की छूट है. देर तक काम करने या जल्दी घर जाने की इजाज़त है.
यहां तक कि बहुत सी आईटी कंपनियों में तो काम के घंटों का बीस फ़ीसदी हिस्सा अपने निजी प्रोजेक्ट पर खर्च कर सकते हैं.
खुला होता है दफ़्तरों का माहौल
इसकी बड़ी वजह ये भी है कि आईटी सेक्टर में नित नए बदलाव की वजह से मुक़ाबला बेहद कड़ा है. दूसरों के मुक़ाबले आगे बढ़ने के लिए कर्मचारियों पर हर रोज़ कुछ नया करने, कुछ नया तलाशने का दबाव रहता है.
ऐसे में उन्हें वक़्त और काम की पाबंदियों से आज़ाद करने से कंपनियों को ही फ़ायदा होता है. मनमर्ज़ी के कपड़े पहनने की छूट देने से कर्मचारी दफ़्तर में भी खुला माहौल पाते हैं. मैनेजमेंट का दबाव नहीं महसूस करते.
गूगल, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों के दफ़्तर, ऑफ़िस कम और खेल के मैदान ज़्यादा लगते हैं.
जहां ज़हनी तौर पर आप एकदम आज़ाद महसूस करते हैं. अपने टारगेट पूरे करने के साथ-साथ आप कुछ भी नया तलाशने के लिए काम कर सकते हैं.
अमरीका की मशहूर सिलिकॉन वैली ऐसे खेल के मैदान जैसे दफ़्तरों के लिए मशहूर हो चुकी है. कहा जाता है कि यही अमरीका के आईटी पावरहाउस बनने की वजह है.
आज़ाद माहौल मिलने की वजह से ही सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अमरीकी कंपनियों ने झंडे गाड़े हैं.
चीन और भारत में भी कई कंपनियां ऐसा माहौल अपने कर्मचारियों को मुहैया करा रही हैं. जहां आने-जाने के वक़्त की पाबंदी नहीं है. कई बार तो मुलाज़िमों को घर से भी काम करने की छूट मिल जाती है.
कामयाबी के लिए पाबंदियों से मिली आज़ादी
आख़िर दफ़्तर के ऐसे माहौल की शुरुआत कैसे हुई थी?
हो सकता है कि बहुत से लोग ये कहें कि अमेज़न, एप्पल, एचपी और माइक्रोसॉफ्ट जैसी पावरहाउस कंपनियां शुरू करने वालों ने बड़े छोटे पैमाने पर काम शुरू किया था. उनके पास था तो सिर्फ़ जुनून. जैसे स्टीव जॉब्स ने घर के गैराज में अपनी कंपनी की शुरुआत की थी. इसी तरह आज की दूसरी बड़ी कंपनियों की शुरुआत भी बहुत छोटे स्तर पर हुई थी.
कोई स्थायी दफ़्तर न होने की वजह से इन कंपनियों में गिने-चुने लोग हुआ करते थे. वो दिन-रात काम करते थे, ताकि कामयाबी हासिल कर सकें. उनके इस जुनून को मंज़िल मिलने में बड़ा योगदान पाबंदियों से आज़ाद रहने वाला माहौल भी था. यही वजह है कि आगे चलकर एप्पल, अमेज़न या माइक्रोसॉफ्ट कंपनियों में काम का माहौल खुला ही रखा गया.
दफ़्तरों में आज़ादी की शुरुआत किसने की?
लेकिन, इन कंपनियों से पहले भी अमरीका में एक शख़्स हुआ था, जिसने दफ़्तर में इंक़लाब ला दिया था. उस आदमी का नाम था थॉमस अल्वा एडिसन. एडिसन, अमरीका के महान आविष्कारक थे. हम उन्हें आज के बिजली के बल्ब के जन्मदाता के तौर पर जानते हैं. लेकिन एडिसन ने और भी कई आविष्कार किए थे.
उन्नीसवीं सदी का वो दौर टेलीग्राफ़ का था. जब सैमुअल मोर्स और दूसरे लोगों ने मिलकर इलेक्ट्रिकल टेलीग्राफ़ी का आविष्कार किया, तो उससे पश्चिमी देशों में क्रांति सी आ गई. संवाद का ये नया ज़रिया अमरीका में आविष्कारों की बाढ़ लेकर आया. जिन लोगों को कोड मालूम हुआ करते थे. जो टेलीग्राफ़ चला सकते थे, उनकी बाज़ार में बहुत मांग हो गई थी. उन्हें अमरीका में 'नाइट्स ऑफ़ द की' कहा जाता था.
वो अकेले या जोड़ों में काम करते थे. तकनीक के साथ दिन-रात वास्ता पड़ता था. सो दिमाग़ में नई-नई चीज़ों का ख़याल आता रहता था.
इसी दौर की पैदाइश थे थॉमस अल्वा एडिसन.
स्टॉक मार्केट के टिकर का ईजाद किसने किया?
महज़ 12 बरस की उम्र में एडिसन ने अख़बार छापकर बेचना शुरू कर दिया था. उन्होंने रेलवे के टेलीग्राफर्स की मदद से मोर्स कोड सीखा और अपने घर में ही टेलीग्राफ़ सिस्टम लगा लिया. 19 साल की उम्र में एडिसन ने वेस्टर्न यूनियन कंपनी में नौकरी शुरू की थी. लेकिन बचे हुए वक़्त में वो टेलीग्राफ़ से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम किया करते थे.
उनका पहला आविष्कार था इलेक्ट्रॉनिक वोट-रिकॉर्डिग मशीन. इसका कोई ख़रीदार नही मिला. फिर उन्होंने स्टॉक मार्केट का टिकर ईजाद किया, जो उस दौर में 40 हज़ार डॉलर में बिका. आज ये रक़म 7 लाख डॉलर बैठती है.
इस पैसे की मदद से एडिसन ने नेवार्क में अपना कारखाना लगाया. इसमें वो अपने मातहतों के साथ तमाम चीज़ों पर रिसर्च किया करते थे.
जैसे-जैसे एडिसन का कारोबार बढ़ा, उन्हें बड़े दफ़्तर की ज़रूरत पड़ने लगी. 1876 में उन्होंने अपना नया ऑफ़िस बनाया. ये न्यू जर्सी के मेनलो पार्क में था.
34 एकड़ इलाक़े में फैले एडिसन के इस दफ़्तर में प्रयोगशाला थी, मशीनों की दुकान थी. लाइब्रेरी थी, बढ़ई का कारखाना था. मेनलो पार्क स्थित एडिसन के इस ऑफ़िस कॉम्प्लेक्स में उस दौर की ज़्यादातर सुविधाएं मौजूद थीं.
एडिसन काम के एवज़ में पैसे नहीं देते
एडिसन अपने साथ काम करने के लिए जुनूनी लोगों को तलाश करते थे. वो यूनिवर्सिटी में पढ़ने वालों को अपने साथ रखते थे. ऐसा वो इसलिए करते थे ताकि नए-नए रिसर्च होते रहें, नए तजुर्बे होते रहें.
इनमें से ज़्यादातर को काम के एवज़ में पैसे नहीं मिलते थे. एडिसन का कहना था कि लोग उनके साथ सीखने और नए तजुर्बे के लिए जुड़ें. जिसे पैसे चाहिए वो कहीं और जा सकता था.
हां, हर शख़्स को अपने मन के प्रोजेक्ट पर काम करने की आज़ादी थी. उसके लिए हर ज़रूरी चीज़ एडिसन मुहैया कराते थे.
एडिसन के बहुत से सहायकों ने आगे चलकर ख़ूब नाम और पैसा कमाया. रेडियो और टीवी की दुनिया में तहलका मचाया.
एडिसन के साथ रिसर्च करने वाले देर रात तक काम किया करते थे. वीकेंड पर पार्टियां होती थीं. सब मिलकर गाते-बजाते थे. ये खुली सोच वाला माहौल था. वो अपनी टीम को 'मकर्स' या कीचड़ में काम करने वाला कहते थे.
साथ ही एडिसन कहते थे कि, 'नियम क़ायदे जाएं भाड़ में. हम तो बस कुछ हासिल करना चाहते हैं.'
ग़लतियों की आज़ादी से 1600 नए पेटेंट तक
कुल मिलाकर एडिसन का दफ़्तर यूनिवर्सिटी का कैंपस लगता था. आज की आईटी कंपनियों के दफ़्तर का माहौल उस जैसा ही है. उनकी लैब में ग़लतियां करने की आज़ादी थी.
इस खुले माहौल के शानदार नतीजे निकले. 58 साल में एडिसन और उनकी टीम ने 1600 नए पेटेंट के लिए दावेदारी की. इनमें से एक हज़ार से ज़्यादा में उन्हें कामयाबी मिली.
इनमें से ज़्यादातर पेटेंट एडिसन ने मेनलो पार्क स्थित अपने ऑफ़िस में काम करते हुए पाए थे.
इनमें माइक्रोफ़ोन से लेकर लाइट बल्ब के नए फ़िलामेंट और इंडक्शन कॉइल तक शामिल थे. आज इन में से कई चीज़ों के सुधरे हुए रूप हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इस्तेमाल करते हैं.
जैसे आज स्टीव जॉब्स या मार्क ज़ुकरबर्ग के बड़े अंधभक्त और मुरीद हैं. उसी तरह एडिसन के भी जुनूनी प्रशंसक थे. इनमें से एक क्लैरेंस डैली ने तो एक तजुर्बे के लिए अपना हाथ तक कटवा लिया था. बाद में उस रिसर्च को एडिसन ने रोक दिया. डैली की कैंसर से मौत हो गई थी.
लोगों का मज़ाक़ उड़ाते थे एडिसन
काम के वक़्त एडिसन बहुत सख़्त मिज़ाज हुआ करते थे. वो लोगों का ऐसा मज़ाक़ उड़ाया करते थे कि लोग नौकरी छोड़कर भाग जाते थे. फिर भी उनके जुनूनी अंधभक्त थे.
एडिसन की एक और ख़ूबी थी. वो अपने आविष्कारों को बड़े कारोबारियों को ख़रीदने के लिए मना लेते थे. जैसे कि 1879 में उन्होंने अपने डायनमो से 40 नए बल्ब जलाकर हज़ारों लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा था.
उस दौर में बिजली सप्लाई का काम भी बहुत मुश्किल हुआ करता था. एडिसन के नए आविष्कार की मदद से ये काम आसान हुआ.
1887 में थॉमस अल्वा एडिसन अपना दफ़्तर मेनलो पार्क से न्यू जर्सी के वेस्ट ऑरेंज ले आए. आख़िरी दिनों में वो घर से काम किया करते थे. एडिसन की मौत 1931 में हुई थी.
एडिसन ने दफ़्तर का जो नया माहौल बनाया, उसका फ़ायदा ड्यूपॉन्ट, वेस्टिंगहाउस, जनरल इलेक्ट्रिक, जनरल मोटर्स और बेल लैबोरेट्री जैसी मशहूर कंपनियों को हुआ. बीसवीं सदी की शुरुआत में इन कंपनियों ने एडिसन के काम करने के तरीक़ों को अपनाकर ख़ूब तरक़्क़ी की.
इसकी बड़ी वजह थी, काम करने की आज़ादी.
यही कारण है कि आज माइक्रोसॉफ़्ट, एप्पल, अमेज़न और गूगल जैसी कंपनियां, अपने कर्मचारियों को काम की शर्तों में नहीं बांधती हैं.
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