क्या वाकई जैविक कारणों से पीछे हैं महिलाएं?

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    • Author, ऐंजेला सैनी
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल के लिए

मशहूर वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने अपनी किताब 'Descent of Man' में स्त्रियों के बारे में एक टिप्पणी की थी. डार्विन का मानना था कि महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों के मुक़ाबले पीछे हैं.

1871 में प्रकाशित अपनी इस किताब में डार्विन ने लिखा, "स्त्रियों और पुरुषों की क्षमताओं में बहुत अंतर होता है और पुरुष हर क्षेत्र में स्त्रियों के मुक़ाबले अधिक सफलता हासिल करते हैं."

उनके हिसाब से इस अंतर की वजह यह है कि स्त्रियां पुरुषों के मुक़ाबले जैविक रूप से ही कमतर होती हैं. पर यह सच नहीं है. असलियत यह है कि डार्विन ने उन सामाजिक हालात को नज़रअंदाज़ कर दिया जहां स्त्रियों को पुरुषों के मुक़ाबले बेहद कम अवसर मिलते हैं और उनकी आज़ादी भी सीमित होती है.

डार्विन

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इमेज कैप्शन, डार्विन प्रतिभावान वैज्ञानिक थे मगर उनके भी कुछ पूर्वाग्रह थे.

असल में, उनके दौर में महिला वैज्ञानिक, महिला आर्किटेक्ट और महिला राजनेता न के बराबर थीं और इसकी वजह यह थी कि विक्टोरियाई समाज में स्त्रियों को वोट देने का अधिकार नहीं था, विश्वविद्यालयों में पढ़ने की आज़ादी नहीं थी और विवाहित महिलाओं को संपत्ति का अधिकार नहीं था. डार्विन ने इस सब पर ग़ौर नहीं किया और सामाजिक ढांचे की वजह से मौजूद असमानता को जैविक अंतर मान लिया.

यकीनन, वे पूर्वाग्रह के शिकार थे. अपनी पूरी बुद्धिमत्ता के बावजूद स्त्रियों के प्रति उनका नज़रिया अपने दौर की सोच से प्रभावित था. आख़िरकार वे विक्टोरियन युग के एक पुरुष जो थे.

लेकिन मज़े की बात यह है कि आज भी कई लोगों की सोच इस मानसिकता से आगे नहीं बढ़ पाई है और वे भी ऐसे ही अजीबोग़रीब तर्क देते हैं.

गूगल और लिंगभेद

कुछ ही दिनों पहले गूगल के एक युवा पुरुष सॉफ्टवेयर इंजीनियर जेम्स दामोर ने एक लेख में दावा किया कि गूगल में तकनीकी और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर स्त्रियों की संख्या कम होने की वजह स्त्रियों और पुरुषों के बीच का जैविक अंतर है.

दामोर ने लिखा कि अगर हम इस बात को मान लें कि सभी असमानताओं की वजह सामाजिक कारक या भेदभाव ही नहीं होते तभी हम वास्तविकता को स्वीकार कर पाएंगे.

सुंदर पिचाई

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इमेज कैप्शन, गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई

इस लेख की प्रतिक्रिया होनी ही थी. दामोर को नौकरी से निकाल दिया गया और चारों तरफ़ से उनके समर्थन और आलोचना में दिए जाने वाले तर्कों की बाढ़-सी आ गई. इसी गुरुवार को गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने इस विवाद के संबंध में होने वाली बैठक कर्मचारियों के ऑनलाइन उत्पीड़न की आशंका से अचानक रद्द कर दी.

अगर हमें महिलाओं और पुरुषों के कामकाजी प्रदर्शन के अंतर को समझना है तो इनके पीछे के सामाजिक कारकों को समझना भी बेहद ज़रूरी है. तभी हम समझ पाएंगे कि कैसे सामाजिक पूर्वाग्रह वैज्ञानिक मान्यताओं को भी प्रभावित कर देते हैं.

गूगल के इंजीनियर दामोर के मुताबिक तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या कम होने की वजह 'महिलाओं और पुरुषों के बीच का प्राकृतिक अंतर' हो सकता है, लेकिन उन्होंने इस बात पर ग़ौर नहीं किया कि लिंगभेद, यौन उत्पीड़न और भेदभाव से सिलिकॉन वैली भी अछूती नहीं है.

एक हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक तकरीबन 60 फीसदी महिलाओं को अपने वरिष्ठ अधिकारियों की अवांछित यौन चाहतों (sexual advance) का सामना करना पड़ता है और यकीनन, सिलिकॉन वैली में महिलाओं की संख्या कम होने के पीछे 'कुदरती अंतर' नहीं, बल्कि दूसरे बड़े कारण हैं.

बचपन से ही भर जाते हैं पूर्वाग्रह

लेकिन अगर डार्विन के पूर्वाग्रहों को माफ़ किया जा सकता है तो दामोर के पूर्वाग्रह भी माफ़ किए जाने चाहिए. क्योंकि एक अकेले वही नहीं हैं जिनकी सोच ऐसी है. हममें से अधिकांश के दिलो-दिमाग़ में बचपन से ही ऐसे जेंडर स्टीरियोटाइप भर दिए जाते हैं. जो खिलौने हमें दिए जाते हैं, जैसा व्यवहार हमसे किया जाता है, वह इन पूर्वाग्रहों को ही बढ़ाता है.

एक अध्ययन के मुताबिक पांच वर्ष के बच्चे में भी यह समझ विकसित हो जाती है कि उसके जेंडर से कैसा व्यवहार अपेक्षित है.

गुड़िया

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इमेज कैप्शन, 5 साल का बच्चा भी लिंग को लेकर अवधारणाएं बना लेता है.

एक प्रयोग के दौरान छोटे बच्चों को रोज़मर्रा के कामकाज की तस्वीरें दिखाई गईं. इनमें से एक तस्वीर में एक लड़की कुल्हाड़ी से लकड़ी काट रही थी. बाद में जब बच्चों से पूछा गया कि उन्होंने तस्वीरों में क्या देखा तो कई बच्चों ने बताया कि एक तस्वीर में एक लड़का लकड़ी काट रहा था. उनके पूर्वाग्रह ग्रस्त मस्तिष्क के लिए यह याद रख पाना मुश्किल था कि लड़की भी लकड़ी काट सकती है.

इसीलिए, पुरुष प्रधान कार्यस्थलों में इन पूर्वाग्रहों से निजात पाना और समतावादी नज़रिया अपनाना बेहद कठिन होता है. स्टीरियोटाइप सोच यथास्थिति को बढ़ावा देती हैं और सामाजिक ढांचे में कोई रद्दोबदल न करने की हिमायती होती है.

यह एक जाना-माना सच है कि प्राय: बॉस उन्ही कर्मचारियों को प्रोत्साहन देना चाहते हैं जिनमें उन्हें अपनी छवि दिखाई दे. ऐसे में किसी भी पुरुष-प्रधान संगठन में विविधता को बढ़ावा देना बेहद मुश्किल हो जाता है.

कई बार जो लोग यथास्थिति को बदलना चाहते हैं, उन्हें इसके नतीजे भुगतने पड़ते हैं. हाल में अमरीका में हुए एक अध्ययन के मुताबिक जिन महिलाओं के व्यवहार में विविधता के प्रति सम्मान होता है, उनके बॉस उन्हें ख़राब रेटिंग देते हैं.

वक़्त लगेगा सोच बदलने में

असल में, समाज में मौजूद लैंगिक भेदभाव का समूल नाश करने में कई पीढ़िया लगेंगी. लेकिन इसे कम करने के लिए कुछ तरीके अपनाए जा सकते हैं. पूर्वाग्रह संबंधी परीक्षणों से लोगों को अपने अवचेतन मन के पूर्वाग्रहों को पहचानने में मदद मिलती है.

अगर सबके वेतन की जानकारी सबको हो, तो महिलाएं और पुरुष सभी यह जान सकते हैं कि कहीं उनके साथ कोई भेदभाव तो नहीं किया जा रहा. आरक्षण से समस्या पूरी तरह हल तो नहीं होती, लेकिन एक संतुलन बनाने में मदद ज़रूर मिलती है.

लेकिन इन कदमों से हर कोई खुश नहीं होता. जेम्स दामोर ने इन्हें 'अनुचित और भेदभावकारी' कहा और लिखा कि "हम अवचेतन पूर्वाग्रह प्रशिक्षण (Unconsicous Bias Training) के प्रभावों का आकलन नहीं कर पाए हैं और ऐसे उपायों से ज़रूरत से ज़्यादा सुधार होने या इसका उल्टा असर होने की संभावना रहती है.

असल में, सबसे ज़रूरी है अपने दिलो-दिमाग़ पर छाए पूर्वाग्रहों को दूर करना. असली लड़ाई हमें खुद से लड़नी है. हम अपने आस-पास जो भी देखें उस पर खुले दिमाग़ से विचार करें और तभी कोई निष्कर्ष निकालें न कि पूर्वाग्रहों को ही सच मान लें.

ऐंजेला सैनी ब्रिटेन में साइंस जर्नलिस्ट और ब्रॉडकास्टर हैं. वह 'इनफ़ीरियर: हाउ साइंस गॉट विमिन रॉन्ग ऐंड द न्यू रिसर्च दैट्स रीराइटिंग द स्टोरी' की लेखिका भी हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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