करियर में तरक्की चाहिए तो गिरगिट बनिए

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- Author, लेनॉक्स मॉरीसन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
पढ़ाई के दौरान ही आजकल बच्चों को करियर में आगे बढ़ने के गुर सिखाने जाने लगते हैं. आगे कैसे बढ़ना चाहिए, तरक़्क़ी के क्या तरीक़े हैं, अपनी पहचान कैसे बनाएं वगैरह-वगैरह. अंग्रेज़ी में एक शब्द है 'बी योरसेल्फ़'. यानि आप जो हैं, वैसे ही रहिए. आपको किसी के लिए ख़ुद को बदलने की ज़रूरत नहीं है.
ये शब्द हम कमोबेश सभी जगह सुनते हैं, यहां तक कि बहुत सी कंपनियां भी उन्हीं लोगों को नौकरी पर रखना पसंद करती हैं, जो अंदर-बाहर एक जैसे और प्रैक्टिकल होते हैं. जो अपने लिए ख़ुद के बनाए उसूलों पर चलते हैं.
कनाडा की एक स्टार्ट अप सॉफ्टवेयर कंपनी के वाइस प्रेसिडेंट माइकल फ़्रेडरिक ऐसे ही लोगों में से हैं जो अपने मुताबिक काम करते हैं. जिस हालत में ऑफ़िस जाने का मन होता है, उस हालत में ही चले जाते हैं. अपने घर जाने का मन नहीं हुआ तो किसी दोस्त के घर ही चले गए. उसके घर में भी जहां मन हुआ वहीं सो भी गए.

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माइकल कहते हैं कि उन्होंने आज तक अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जी है. उन्हें अच्छी नौकरी भी मिली है. वो किसी के सामने कोई दिखावा नहीं करते. वो जैसे ख़ुद के साथ रहते हैं वैसे ही सबके साथ रहते हैं. जैसे कभी हाफ पैंट पहनकर दफ़्तर चले गए. दोस्तों के घर रात बिताई तो वो भी दफ़्तर में बता दिया. मतलब वो जैसे हैं, उसी तरह ऑफ़िस में भी रहते हैं. उनके बर्ताव में ज़रा भी बनावट नहीं होती. उन्होंने अपने इसी रवैये की वजह से ख़ूब तरक़्क़ी भी हासिल की है.
मगर करियर में कामयाबी का फ़ॉर्मूला इतनी ईमानदारी वाला नहीं है. तरक़्क़ी के साथ-साथ आपके अंदर बनावटीपन भी आना चाहिए. जो कम से कम मैनेजमेंट वाले ओहदों के लिए बेहद ज़रूरी है. वरना आप की तरक़्क़ी रुक सकती है.
लंदन बिज़नेस स्कूल की प्रोफ़ेसर हरमिनिया इबार्रा कहती हैं कि दफ़्तर में पूरी ईमानदारी बरतना आपके लिए नुक़सानदेह होता है.

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प्रोफेसर हरमिनिया का कहना है कि, ''जैसे-जैसे आपकी तरक़्क़ी होती जाती है, आपकी ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती जाती है. काम और ज़िम्मेदारी के लिहाज़ से आपका रोल बदलने लगता है. ऐसे में आपको अपना व्यवहार बदलने की ज़रूरत होती है. सबसे पहले तो आपको अपनी शख़्सियत का लोगों को यक़ीन दिलाना होता है. अपने ओहदे के मुताबिक़ आपको अपना बर्ताव बदलना होता है. हर वक़्त ईमानदारी से काम नही चलता. बनावट लाना ज़रूरी हो जाता है.''
मसलन आपको किस कर्मचारी से किस हद तक बात करनी है. कितनी बात करनी है. कौन-सी बात सबको बतानी है. कौन-सी बात सबसे छुपानी है. इन बातों का ख़्याल रखना बहुत ज़रूरी हो जाता है. अगर आप एक ज़िम्मेदार पद पर आने के बाद भी किसी नए कर्मचारी की तरह से बातें करते रहेंगे. अपने आइडिया, अपनी प्लानिंग, सीनियर से हुई बातें अपने सभी साथियों के दरमियान बताते रहेंग-. ये सोच कर कि आप सभी के सामने एक खुली किताब की तरह से रहना चाहते हैं, तो इससे आपकी विश्वसनीयता ख़त्म हो जाएगी.
प्रोफ़ेसर हरमिनिया का मानना है कि बहुत से लोग ईमानदार रहने की आड़ में ख़ुद को बदलने से बचाते हैं. वो नई चुनौती के लिए तैयार नहीं होना चाहते. नई ज़िम्मेदारयां उठाने से ये कहकर बचते हैं कि वो तो ऐसे ही हैं- ये तरक़्क़ी के लिए ठीक नहीं.
पेशेवर ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है कि आप मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए ख़ुद को कम से कम उस वक़्त के लिए बदलें.

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अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मार्क स्नाइडर के मुताबिक़, ''दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. वो लोग जो ख़ुली क़िताब की तरह होते हैं. जो वो होते हैं, वैसे ही दिखते हं. दूसरे वो लोग जो गिरगिट की तरह होते हैं. ज़िंदगी में कई किरदार जीते हैं. उनके अंदर क्या है, वो बाहर नहीं दिखाई देता.''
प्रोफ़ेसर स्नाइडर का कहना है कि करियर में आगे बढ़ने के लिए हमें गिरगिट की तरह का व्यक्तित्व अपनाना पड़ता है. जिस तरह गिरगिट मौक़े और माहौल के मुताबिक़ ख़ुद को ढाल लेता है, वैसे ही आपको भी ख़ुद को बदलना चाहिए. अपने सीनियर और जूनियर, दोनों से बात करते वक़्त अपने शब्दों के चयन का ख़याल ज़रूर करें.
जो लोग अपने आप में मस्त रहने वाले होते हैं, वो इस बात का ज़रा भी ख़्याल नहीं रखते कि उन्हें किस के सामने कैसे बात करनी है. वो जैसे अपने दोस्तों या रिश्तेदारों के साथ पेश आते हैं, वैसा रवैया दफ़्तर में भी अपनाते हैं. यही वजह है कि ऐसे लोग अक्सर तरक्की की रेस में पिछड़ जाते हैं. इसके विपरीत मौक़े की नज़ाकत के मुताबिक़ ख़ुद को ढालने वालों को इसी बात का फ़ायदा मिलता है. उनका गिरगिट की तरह रंग बदलना काम आता है और वो आगे बढ़ जाते हैं.

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जो लोग मौक़े के मुताबिक़ ख़ुद को नहीं ढालते. सिर्फ़ अपनी शर्तों पर आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं, उनके लिए बहुत-सी मुश्किलें आती हैं. उनकी तरक्क़ी की रफ़्तार धीमी हो जाती है. जो लोग अपनी मिसाल देते हुए कहते हैं कि उन्होंने किसी के लिए ख़ुद को नहीं बदला, बल्कि जो हासिल किया अपनी शर्तों पर किया. वो ये भूल जाते हैं कि उन्हें वो सब पाने में कितना लंबा वक़्त लगा.
आप जैसे हैं वैसे ही सबके साथ रहें, ये एक अच्छी बात है. लेकिन ये आपके करियर के लिए अच्छा मशविरा नहीं. करियर में तेज़ रफ़्तार तरक़्क़ी के लिए गिरगिट बनना ज़रूरी है.
(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)
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