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जब पदक से चूक गए भारतीय | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ओलंपिक खेलों में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. इतनी बड़ी आबादी वाले देश में पदकों की संख्या को लेकर सवालों के जवाब देना अधिकारियों के लिए मुश्किल साबित होता है. अभी तक भारत के खाते में आठ स्वर्ण, दो रजत और पाँच कांस्य पदक आए हैं. सभी स्वर्ण पदक हॉकी में मिले हैं. हॉकी में भारत ने एक बार रजत पदक और दो बार कांस्य पदक भी जीता है. व्यक्तिगत मुक़ाबलों में केडी जाधव, लिएंडर पेस, कर्णम मल्लेश्वरी और राज्यवर्धन सिंह राठौर ने पदक जीते हैं. इनमें से राज्यवर्धन सिंह ने रजत पदक जीता है जबकि केडी जाधव, पेस और मल्लेश्वरी ने कांस्य पदक जीते हैं. ये तो रही पदक जीतने की बात. लेकिन कई मौक़े ऐसे भी आए हैं जब भारत पदक जीतते-जीतते रह गया है. 1960 के रोम ओलंपिक में भारत के मिल्खा सिंह इतिहास बनाते-बनाते रह गए. चूक नंगे पाँव दौड़ते हुए मिल्खा सिंह ने 400 मीटर की दौड़ में ओलंपिक रिकॉर्ड तो तोड़ा लेकिन उन्हें चौथे स्थान से ही संतोष करना पड़ा. उन्होंने 45.6 सेकेंड का समय लिया जो कई वर्षों तक भारत का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बना रहा.
कहा जाता है कि दौड़ते समय पीछे मुड़कर देखना मिल्खा सिंह को भारी पड़ा. 1964 के टोक्यो ओलंपिक में गुरुबचन सिंह रंधावा ने भी 110 मीटर बाधा दौड़ में 14 सेकेंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया लेकिन उन्हें पाँचवाँ स्थान ही मिला. प्रेमनाथ ने म्यूनिख ओलंपिक में चौथा स्थान हासिल किया था 1972 के म्यूनिख़ ओलंपिक में भारतीय पहलवान प्रेमनाथ फ्लाईवेट और सुदेश कुमार ने बैंटमवेट में चौथा स्थान प्राप्त किया. 1976 के मॉन्ट्रियल ओलंपिक में श्रीराम सिंह ने 800 मीटर में 1 मिनट 45.77 सेकेंड का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. लेकिन सातवें स्थान पर ही आ पाए. उस दौड़ को जीतने वाले क्यूबा के अलबर्टो ज्वानटोरीना ने बाद में माना कि शुरू में श्रीराम के तेज़ दौड़ने के बदौलत ही वो ओलंपिक रिकार्ड तोड़ पाए. 1984 के लॉस एंजेलेस ओलंपिक में महिलाओं की 400 मीटर बाधा दौड़ में पीटी ऊषा एक सेकेंड के सौवें हिस्से से भी कम समय में काँस्य पदक चूक गई. |
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