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शनिवार, 07 जून, 2008 को 10:45 GMT तक के समाचार
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फटाफट खेल ने बदले क्रिकेट के पैमाने?

आईपीएल
आईपीएल के बाद लोगों को ताबड़तोड़ क्रिकेट की आदत पड़ गई है
आईपीएल के ख़त्म होने के बाद लोगों ने ‘विदड्रॉल सिम्पटम’ को झेला. आईपीएल पीछे छूट गया है, इसकी चकाचौंध ने लोगों को अपना आदी बना दिया था.

अब लोगों को उम्मीद है कि 'सलमान खान और उनका दम' शाम को इडियट बॉक्स यानी टेलीवीज़न के साथ उनकी इस डेट को बनाए रखेगा. ऐसे लोगों को शुभकामनाएँ.

जो धोनी और वॉर्न ने किया, क्या पता कि सलमान या ऋतिक बेहतर कर पाएँ. छोटी स्क्रीन पर हम कई जाने-पहचाने चेहरे देख सकते हैं, शायद दूसरी वेश-भूषा में कुछ वैसा ही खेल खेलते हुए जो साढ़े तीन घंटे में पूरा हो जाता है.

लेकिन यहाँ अकसर बल्लेबाज़ रक्षात्मक शैली में खेलते हैं और गेंदबाज़ अपनी गेंद पर रन नहीं देते. ऐसे मैराथन सेशन में हिस्सा लेने और खेल की बारीकियाँ देखने का धैर्य किसके पास है.

पचास ओवर या टेस्ट बोरिंग?

मेरे एक युवा रिश्तेदार का मानना है कि क्रिकेट का मतलब है छक्के जड़ना. वे मानते हैं कि जो गेंद को रक्षात्मक तरीके से खेलते हैं वो क्रिकेट नहीं जानते. मुझे ये तर्क बोरिंग लगता है.

इस युवा रिश्तेदार और उनके दादा जी को आजकल तब तक नींद नहीं आती जब तक वे बल्ले से गेंद की धज्जियाँ उड़ाने का रोमांच अनुभव न कर लें. दादा जी करीब 80 साल के हैं और पूरी ज़िंदगी टेस्ट मैचों का आनंद उठाते हुए गुज़ारी है.

अब ऐसे में उन लोगों का क्या हो जो उन दो उम्र सीमाओं के बीच की सीमा में हैं. कोई इस युवा और बुज़र्ग शख़्स को कैसे समझाए कि क्रिकेट समान स्तर वाली टीमों का खेल है.

गेंदबाज़ अपने पूरे हुनर का इस्तेमाल करता है ताकि बल्लेबाज़ को अपने जाल में फँसा सके जबकि बल्लेबाज़ पूरी कोशिश करता है कि वो गेंदबाज़ पर हावी हो सके.

इस पाँच दिन के ड्रामे पर ख़तरा मंडरा रहा है, ख़तरा उन लोगों से है जिनका परिचय एक ऐसे खेल से करवा दिया गया है जहाँ पलक झपकते ही दुनिया में सब कुछ ख़त्म हो जाता है.

इस दुनिया में 50-50 ओवर का खेल भी लंबा लगता है. मेरे युवा रिश्तेदार ने मुझे याद दिलाया कि 50-50 ओवर वाले खेल का वो हिस्सा उबाऊ होता है जब बीच के ओवर चल रहे होते हैं और बल्लेबाज़ इक्का-दुक्का रन लेने के अलावा और कुछ नहीं करते.

इस बहस में अब उन लोगों को हिस्सा लेना पड़ेगा जो क्रिकेट के क़ायदे बनाते हैं और जिन्हें लगता है कि आम जनता के तर्क को सुनना चाहिए.

पैसा देने वालों के दास..

 जितना ज़्यादा आप कमाते हैं, उतना ही ज़्यादा आप पैसा देने वालों के दास बन जाते हैं. यही साधारण सा समीकरण क्रिकेट से जुड़ी बहस को और हवा देगा

पैसे की थैलियाँ लेकर घूमने वाले लोगों को लगता है कि छोटे अरसे वाले खेल में ज़्यादा मुनाफ़ा है.

लेकिन टेस्ट क्रिकेट को इस ग्रह से मिटाने की चाह रखने वाले इन लोगों की राह में अब भी रोड़े हैं.. ख़ासकर तब जब आज भी अच्छी ख़ासी संख्या में लोग हैं जो ताबड़तोड़ और जल्द ख़त्म हो जाने वाले मैच के मुकाबले हुनर से खेले गए मैच को देखना पसंद करते हैं.

सबसे अहम बात ये है कि खिलाड़ी ख़ुद अभी बदले नहीं हैं, किसी अन्य फॉर्मेट के मुकाबले वे अब भी टेस्ट मैच खेलना पसंद करते हैं.

लेकिन ये भी सच है कि पैसा लुभाता है. जिन खिलाड़ियों और कमेंटेटरों को इससे फ़ायदा हुआ है वो अब दुनिया को ये जतलाना चाहते हैं कि क्रिकेट को इस कॉस्मेटिक सर्जरी की ज़रूरत थी.

जितना ज़्यादा आप कमाते हैं, उतना ही ज़्यादा आप पैसा देने वालों के दास बन जाते हैं. यही साधारण सा समीकरण बहस को और हवा देगा.

क्या पता हम जल्द ही लंबे अरसे वाले खेल में बदलाव देखें, ये बदलाव जल्द ही हो सकते हैं..शायद हमने-आपने जब सोचा हो उससे पहले ही ये तब्दीली हो जाए.

अख़बारों के किसी कोने में इंद्रजीत सिंह बिंद्रा की ये चेतावनी छपी है कि आईसीसी को चिंता है कि ट्वेन्टी-20 की लोकप्रियता से टेस्ट क्रिकेट ख़तरे में पड़ सकता है.

इसी चिंता के कारण आईसीसी अब शायद चाहता है कि वो टेस्ट के फॉर्मेट में कुछ दिलचस्प बदलाव करे. हालांकि इंद्रजीत सिंह बिंद्रा ने आश्वासन दिया है कि वो क़ायदे-क़ानूनों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे.

ऐसी छोटी-छोटी नेमतों के लिए शुक्रिया....

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

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