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शनिवार, 21 अप्रैल, 2007 को 17:32 GMT तक के समाचार
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क्यों नहीं संन्यास लेते सचिन ?

सचिन
सचिन क्रिकेट के बाद ज्यादा समय घर में रहना पसंद करते हैं
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के ब्रायन लारा के फ़ैसले ने सचिन तेंदुलकर के भविष्य पर बहस तेज़ कर दी है.

दोनों खिलाड़ियों से भले ही दुनिया के कई बल्लेबाज़ थर्राते हों लेकिन दोनों का क्रिकेट जीवन, उन पर दबाव और पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग अलग है.

तो फिर ब्रायन लारा की तर्ज़ पर सचिन संन्यास क्यों ले लें.

वैसे भी उम्र देखी जाए तो लारा 38 के क़रीब हैं जबकि सचिन चार साल छोटे यानी 34 के आसपास हैं यानि कम से कम सचिन दो एक साल क्रिकेट और खेल ही सकते हैं.

लेकिन अब सचिन को साबित क्या करना है. मास्टर ब्लास्टर के नाम कई रिकार्ड हैं..रन हैं.. विकेट हैं... कप्तानी है. अगर कुछ नहीं है तो वो है विश्व कप का ख़िताब.

पाँच विश्व कप खेल चुके सचिन 2011 में होने वाले विश्व कप में शायद खेलें ... शायद न भी खेलें तो फिर क्यों न अभी रिटायर हो जाएं.

हाल ही में सचिन ने नाराज़गी भरे स्वर में कहा था ‘ किसी को मुझे ये बताने की ज़रुरत नहीं कि कब संन्यास लूं. जब मुझे खेलने में मज़ा नहीं आएगा तो मैं संन्यास ले लूंगा.’

सचिन, गांगुली और द्रविड़
भारतीय टीम में बेहद पसंद किए जाते हैं सचिन

अब बड़ा सवाल ये उठता है कि लारा और सचिन जैसे बड़े खिलाड़ियों को कब संन्यास लेना चाहिए. लारा की जीवनशैली उन्हें आने वाले दिनों में व्यस्त रख सकती है लेकिन सचिन जिस तरह का सादा जीवन जीते हैं वैसे में अगर वो क्रिकेट न खेल रहे हों तो साल के सौ दिन वो क्या करेंगे कहना मुश्किल है.

अधिकतर घर में रहने वाले और परिवार के साथ समय बिताने वाले सचिन के लिए क्रिकेट से बड़ा कोई साथी नहीं है. सुरक्षा की अलग चिंताएं हैं जो उन्हें खुल कर बाहर घूमने आदि की अनुमति नहीं देती.

सचिन दुनिया के किसी उस कोने में छुट्टियां नहीं मना पाते जहां क्रिकेट खेली जाती हो क्योंकि क्रिकेट प्रेमी उन्हें घेर लेते हैं और उन्हें छुट्टियां भी होटल के कमरे में बितानी होती हैं.

जहां तक टीम और इन बड़े खिलाड़ियों की बात है लारा को अपनी टीम में उतना सम्मान नहीं मिलता जितना सचिन को मिलता है.

संभवत लारा का घमंड और कभी कभी बिगड़ैल रवैया टीम से उन्हें दूर रखता है. इतना ही नहीं वेस्टइंडीज़ में अलग अलग द्वीपों के खिलाड़ियों में तालमेल की कमी टीम पर दबाव रखती है.

सचिन का पोस्टर
पूरे दक्षिण एशिया में सचिन की ब्रांड वैल्यू ज़बर्दस्त है

तेंदुलकर के साथ ऐसा कुछ नहीं है. खिलाड़ी चाहे किसी राज्य का हो वो सचिन का सम्मान करता ही है. इससे सचिन के टीम में बने रहने की संभावना बढ़ती है लेकिन नुकसान उन खिलाड़ियों को होता है जो सचिन की वजह से टीम में जगह नहीं बना पा रहे हैं.

इतना ही नहीं पैसा भी सचिन के टीम में बने रहने का एक बड़ा कारण हो सकता है. भारत में अब क्रिकेट एक उद्योग की तरह है जहां सचिन जैसे खिलाड़ी ब्रांड एबेंसडर हैं.

अगर वो खेलते हैं तो उन्हें करोड़ों की स्पांसरशिप मिलती है लेकिन अगर वो संन्यास ले लेंगे तो उनकी ब्रांड वैल्यू ख़त्म हो जाएगी और अगर ब्रांड वैल्यू नहीं तो कैसी स्पांसरशिप.

ज़ाहिर है कोई क्यों चाहेगा कि संन्यास लेकर वो आसानी से घर आती लक्ष्मी को ठोकर मार दे. ये एक बड़ा कारण हो सकता है सचिन के संन्यास नहीं लेने का.

तेंदुलकर ने 15 साल की उम्र में 1989 में अपना अंतरराष्ट्रीय कैरियर शुरु किया था. तब क्रिकेट में न तो पैसा था और न ही आयोजकों की भरमार.

अब हालत ये है कि सचिन को खुद नहीं पता कि उनकी संपत्ति कितनी है. उनके भाई अजित उनकी वित्तीय व्यवस्था देखते हैं और निवेश का काम संभालते हैं. अब जब सचिन का होटल बिजनेस और अन्य सभी व्यवसाय भली भांति चल रहे हैं तो सचिन संन्यास की क्यों सोचें.

इसे लालच नहीं कह सकते लेकिन शायद थोड़ा और कमा लेने की इच्छा सचिन को संन्यास नहीं लेने पर मज़बूर कर रही है और लिटिल मास्टर का दिल गा रहा है ‘ दिल मांगे मोर ’

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