|
एक मुलाक़ात: मोहिंदर अमरनाथ के साथ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की जिंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इसी श्रंखला में हम इस बार आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं एक ऐसे डैशिंग क्रिकेट खिलाड़ी से जो अपने ज़माने के ज़बर्दस्त हरफ़नमौला खिलाड़ी थे. क्रिकेट के खेल में कमबैक मैन के रूप में अपनी पहचान बना चुके और दोस्तों में अपनी मधुर आवाज़ के लिए मशहूर इस क्रिकेटर को अपने समय के सबसे हैंडसम खिलाड़ियों में गिना जाता था. जी हां, हम बात कर हैं 1983 के क्रिकेट विश्वकप के फ़ाइनल मुक़ाबले में मैन ऑफ़ द मैच और टूर्नामेंट के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी का ख़िताब पाने वाले मोहिन्दर अमरनाथ की. मोहिंदर जी, क्रिकेट तो वैसे आपके ख़ून में है लेकिन शुरुआती यादें क्या हैं क्रिकेट की? शुरुआती यादें बचपन की हैं. पिताजी चाहते थे कि हम तीनों भाई सिर्फ़ क्रिकेट खेलें और कुछ नहीं. मुझे याद है मैं 10 साल का था हमें सुबह उठाया जाता था. अभ्यास कराया जाता था. पिता जी पढ़ाई पर उतना ध्यान नहीं देते थे. उनकी लाइफ़ ही क्रिकेट थी. हमारे लिए कड़क अनुशासन बनाया गया था. माँ भी इसमें कुछ नहीं कह पाती थी. मैं आज देखता हूँ कि पिताजी के उस अनुशासन से हमें कितना फ़ायदा हुआ. आज मैं जो कुछ भी हूँ उसी की वज़ह से हूँ. ('एक मुलाक़ात' बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के अलावा, बीबीसी हिंदी – मीडियम वेव 212 मीटर बैंड पर और शॉर्टवेव 19, 25, 41 और 49 मीटर बैंड पर - भारतीय समयानुसार हर रविवार रात आठ बजे प्रसारित होता है. दिल्ली और मुंबई में श्रोता इसे रेडियो वन एफ़एम 94.3 पर भारतीय समयानुसार रविवार दोपहर 12 बजे भी सुन सकते हैं.) हम अभी महान क्रिकेटर लाला अमरनाथ के बारे में और भी बात करेंगे. लेकिन अभी आपने बहुत ही दिलचस्प बात कही कि आपके पिता जी आप लोगों पर पढ़ाई के लिए बहुत ज़ोर नहीं देते थे. अभी कुछ दिन पहले ही हमारे मेहमान थे मशहूर सरोद वादक अमज़द अली खाँ साहब. उन्होंने भी यही बात कही थी कि इस औपचारिक पढ़ाई ने देश को बर्बाद कर दिया. अगर आप अच्छा सरोदवादक बनना चाहते हैं तो पीएचडी करके नहीं बन सकते. अगर आप पढ़ाई में अव्वल होते तो शायद बेहतरीन क्रिकेटर नहीं होते. अपने क्षेत्र में अव्वल बनने के लिए भी आपको फ़ोकस करना पड़ेगा. फ़ोकस करना ही पड़ेगा. अगर आप दोनों चीज़ें मिलाते हैं तो आप उतनी उपलब्धियाँ हासिल नहीं कर पाते. तेंदुलकर को ही लें, अगर तेंदुलकर अपनी पढ़ाई पर फ़ोकस करते तो शायद देश को उतना बेहतरीन क्रिकेट खिलाड़ी नहीं मिल सकता था. तो जो भी आप करना चाहते हैं तो उस पर पूरा फ़ोकस होना चाहिए. चाहे वो सिनेमा, संगीत, क्रिकेट कुछ भी हो. तभी आप नंबर एक बन सकते हैं. लाला अमरनाथ एक बेहतरीन खिलाड़ी थे. लेकिन अगर प्राकृतिक न्याय की बात करें तो लाला अमरनाथ को उतना न्याय नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था. हालांकि आपने उनकी तुलना में अधिक लोकप्रियता हासिल की. एक पिता और क्रिकेट खिलाड़ी की तरह वो कैसे थे? जहाँ तक उनकी शोहरत की बात है तो पिता जी की तुलना सचिन तेंदुलकर से की जा सकती है. वो अपने समय में उतना ही लोकप्रिय थे जितना सचिन आज हैं. और रहा मेरा सवाल तो मैं मानता हूँ कि जितना उन्होंने जितनी उपलब्धियाँ हासिल कीं मैं नहीं कर पाया. नहीं मेरे कहने का तात्पर्य था कि चयनकर्ता टीम में चयन को लेकर उनके साथ न्याय नहीं कर पाते थे और आपके साथ भी... वो अन्याय को सहन नहीं कर पाते थे. अपनी बात साफ़गोई से कह देते थे. जब आप ऐसा रुख़ रख़ते हैं तो आपके दुश्मन भी अधिक होते हैं और उनके व्यक्तित्व की ये बातें मेरे अंदर भी आईं. मैं भी अन्याय को सहन नहीं कर पाता था और बोल देता था. लोगों को ये बात पसंद नहीं आती थी. उनका एक पिता और क्रिकेट गुरू के रूप में उनका योगदान बहुत है. देखने में वो बहुत कड़क मिजाज़ लगते थे लेकिन अंदर से बहुत नरम दिल थे. हाँ वो गुस्सा बहुत करते थे. मुझे एक घटना याद है, हमें उन्होंने पंजाब में एक बोर्डिंग स्कूल में भेजा था. जब उनकी रुख़सती का वक़्त आने लगा तो हम रोने लगे. हमें देख एक पिता की तरह उनकी आँखों में भी आँसू आ गए थे कि बेटा दूर हो रहा है. हाँ, अनुशासन में कोई कटौती नहीं करते थे. उनका मानना था कि अगर क्रिकेट खेलना है तो अनुशासन में रहना ही पड़ेगा. मैं तो उनको हमेशा द्रोणाचार्य के रूप में देखा करता था. मेरा मानना है कि क्रिकेट को उनको जितनी समझ थी उतनी किसी को नहीं होगी. चाहे तकनीकी की बात हो या खेलने का अंदाज़. अपने क्रिकेट जीवन में सबकुछ देखा था और हमें बचपन से ही वो सब सिखाया था. उन्होंने हमें बताया कि जब आप बड़े खिलाड़ी बनोगे और भारत के लिए खेलोगे तो किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा इसके लिए भी उन्होंने हमें तैयार किया था. मेरा व्यक्तित्व उनसे अलग था. वो आक्रामक थे और मैं शांत स्वभाव का था. मेरा मानना था कि अगर आप ख़ुद को बेहतर दिखाना चाहते हैं तो आपको अपने प्रदर्शन से ही अपने को बेहतर सिद्ध करना पड़ेगा. पिताजी ने कभी हमारे तरीके में दख़ल नहीं दिया. हाँ, एक पिता की तरह उन्होंने हमेशा हमारा समर्थन किया. वो कहा करते थे कि हम सिर्फ़ अपना खेल खेलें और राजनीति में न पड़ें. ऐसा एक बार ही हुआ था. मेरा टीम में चयन नहीं हुआ था तो मैंने चय़नकर्ताओं को जोकरों का समूह कह दिया था. लेकिन मैंने पिता जी को पहले बता दिया था कि मैं क्या करने जा रहा हूँ. पिता जी ने कहा कि ये कठिन होगा लेकिन अगर तूने सोच लिया है तो जा मैं तेरे साथ हूँ. हम लाला अमरनाथ के प्रिय खिलाड़ियों की बात करेंगे आप के खेल के बारे में बात करेंगे लेकिन अमरनाथ जी पहले अपनी पसंद के गाने बताएँ? मुझे आज कल जो गाना पसंद आ रहा है वो है ..तू ही मेरी शब है सुबह है...इसमें सबकुछ बयान हो जाता है. और मुझे गाना आज की भारतीय टीम पर भी फ़िट बैठता लगता है. पुराने समय का एक गाना है ..जाने कहाँ गए वो दिन..फ़िल्म मेरा नाम जोकर का. मेरे ख़याल से इसमें ज़ज़्बाज हैं, फ़ीलिंग्स हैं. ये पुरानी यादों में ले जाता है. जब आप कुछ हासिल करते हैं, नहीं करते. अज़ीब दास्ताँ है ये कहाँ शुरू कहाँ ख़तम...ये मेरी बीबी को भी बहुत पसंद है. आपको एक पंजाबी गाना सुनाता हूँ...जोगिया दे कन विच कन दिया मुंदरा...... नए गाने में ...तुम्हें देख-देख सोना..तुम्हें देख-देख जगना बेहतर बन पड़ता है. पुराने गानों में....ये रात ये चाँदनी फ़िर कहाँ... ख़ूबसूरत लगता है. पिछले कुछ सालों में बढ़िया संगीत सुनने को मिला है. पूरब और पश्चिम की धुनों का बेहतरीन मिश्रण कर अच्छा संगीत आज कल के लोग बना रहे हैं. पुराने समय में किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी हुआ करते थे. अगर ग़म भरा संगीत सुनना हो तो मुकेश साहब की बात हुआ करती थी. आजकल सोनू निगम अच्छा गा रहे हैं. हर क्षेत्र में प्रतिभा पहले भी होती थी लेकिन अभी अवसर बढ़े हैं. नए-नए लोग सामने आ रहे हैं. संगीत से मुझे हमेशा बेहद लगाव रहा है. मुझे याद है बचपन में हम बिनाका गीतमाला सुना करते थे. ख़ाना खा के पूरा परिवार संगीत सुनता था. मैं जब खेलने जाता था तो अपना म्यूज़िक सिस्टम ले कर जाता था. सोनू निगम के कई गाने हैं. एक शाहरुख़ के लिए गाना गाया है उन्होंने जो धूप से जुड़ा है...हर घड़ी बदल रही है धूप ज़िंदगी...ये गाना काफ़ी कुछ बयान करता है. लाला अमरनाथ के प्रिय खिलाड़ी कौन होते थे. वो आप से क्रिकेट पर किस तरह की बातचीत किया करते थे? वो अपने क्रिकेट-टूर के बारे में अधिक बातें बताते थे. डॉन ब्रेडमैन को बहुत ऊँची नज़र से देखते थे और उनकी बहुत बातें किया करते थे. डॉन ब्रेडमैन के साथ खेलने को वो अच्छा अनुभव मानते थे. पिता जी ब्रेडमैन के आक्रामक रुख़ के कायल थे. और बताते थे कि ब्रेडमैन भी उनके खेल के तरीके को पसंद करते थे. 1947-48 टूर में वो भारतीय टीम का कप्तान बनकर ऑस्ट्रेलिया गए थे. अन्य अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों में वो पाकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ फ़ज़ल महमूद की तारीफ़ किया करते थे. वो कहते थे कि फ़ज़ल महमूद अगर भारत के पास होते तो परिणाम कुछ और ही होते. इन दो खिलाड़ियों की वो बहुत बात किया करते थे. भारतीय खिलाड़ियों में वो सीके नायडू का बहुत सम्मान किया करते थे. जो उनके पहले कप्तान थे. और वीनू माँकड़ के बारे में भी वो बातों किया करते थे. उनकी गेंदबाज़ी के बारे में वो कहा करते थे कि वीनू माँकड़ जैसा स्पिनर हमारे पास नहीं था. सिर्फ़ उनकी गेंदबाज़ी ही नहीं उनकी बल्लेबाज़ी और व्यक्तित्व की भी बात किया करते थे. लाला अमरनाथ के बेटे मोहिंदर अमरनाथ, वीनू माँकड़ के बेटे अशोक माँकड़, सुनील गावस्कर के बेटे रोहन गावस्कर और अमिताभ बच्च्न के बेटे अभिषेक बच्चन. क्या ये बहुत कठिन होता है कि किसी बड़े बाप की औलाद होते हुए अपने आपको साबित करना? जब आप किसी भी क्षेत्र में कुछ भी हासिल करना चाहते है तो आपकी पहचान अकेले बनेगी लेकिन अंत में अपने प्रदर्शन से आप ख़ुद को साबित करते हैं. हाँ परिवार की वज़ह से थोड़ी सहायता मिलती है. जब हम मैदान में खेलने जाते थे तो ऐसा नहीं होता था कि गेंदबाज़ हाफ़ वाली गेंद डाल देगा बल्कि किसी स्टार का बेटा होना तो और भी चुनौतीपूर्ण काम है. क्योंकि आप पर प्रदर्शन का दबाव भी अधिक होता है. आपके प्रदर्शन की तुलना तो बाद में आपके पिता से होती है कि बेटा ऐसा खेला, पिता जी ऐसा खेला करते थे. मोहिंदर अमरनाथ को पहला मौका कब और कैसे मिला...कुछ याद है? बिल्कुल याद है. पहले मैं स्कूल टीम के साथ इंग्लैंड गया था 1967 में और फ़िर ऑस्ट्रेलिया 1968-69 में. उसके बाद ऑस्ट्रेलिया की टीम आई थी और जालंधर में उत्तरी क्षेत्र के ख़िलाफ़ एक तीन दिवसीय मैच था. बिल लॉरी की टीम थी. इस मैच में मैंने 68 रन बनाए थे और दो विकेट भी लिए थे. इसके बाद मुझे तीसरे टेस्ट मैच में मौका मिला था. कुछ किया भी था कि ऐसे ही सस्ते में निपट गए थे? उस समय मैं एक गेंदबाज़ की तरह खेलता था. मैंने दूसरी पारी में दो विकेट लिए थे. और उस श्रँखला में शायद मैं ही ऐसा भारतीय गेंदबाज़ था जिसने विकेट लीं थीं. मुझे वो श्रँखला याद है क्योंकि जयपुर के मैच में सलीम दुर्रानी ने दो छक्के मारे थे. अगर मुझे सही याद है तो आपके भाई सुरेंदर अमरनाथ ने पहले ही मैच में शतक मारा था. सुरेंदर ने न्यूज़ीलैंड में ऑकलैंड टेस्ट में शतक मारा था. और शायद ये रिकॉर्ड ही होगा कि पिता और पुत्र दोनों ने अपने पहले ही टेस्ट में शतक मारा हो. पिता जी ने इंग्लैंड में शतक मारा था. मीडिया और टीम में आपका एक नाम बहुत प्रसिद्ध हुआ- जिमी अमरनाथ. इसकी क्या कहानी है. असल में पिताजी ने ही ये नाम रखा था. शायद ये उस समय के अंग्रेज़ी राज का असर था. पिताजी ने तीनों भाइयों के नाम रखे हुए थे. बड़े भाई सुरेंदर का टॉमी था और उन्हें टॉम बुलाया जाता था. मेरा जिमी था और घर में मुझे जिम कहा जाता था. और तीसरे भाई राजेंदर को जॉनी जॉन के नाम से पुकारा जाता था. लेकिन बहनों के नाम बिल्कुल देसी ही थे. आपको क्रिकेट जीवन की बड़ी सफ़लता कब और कैसे मिली थी? न्यूज़ीलैंड-वेस्टइंडीज़ के दौरे पर त्रिनिडाड में एक मैच था इसमें बड़ा लक्ष्य था गावस्कर और विश्वनाथ ने शतक मारा था मैंने भी 85 रन बनाए थे. ये मैच भारत ने जीता था. वो मेरे लिए बड़े राहत की बात थी क्योंकि वो माइकल होल्डिंग, क्लाइव लॉयड, काली चरन और विव रिचर्ड्स जैसे दिग्गजों की टीम थी. उसी श्रँखला के अंतिम मैच में जिसमें हमारे कई खिलाड़ी घायल हो गए थे उसमें मैंने दूसरी पारी में 67 रन बनाए थे. तो कहा जा सकता है कि वो दौरा मेरे लिए ठीक-ठाक था. इस दौरे के बाद मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और लगा कि मैंने तेज़ गेंदबाज़ी का भी सामना कर सकता हूँ. ये वही दौरा था जिसमें सुरेंदर ने न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ शतक मारा था. आपकी पत्नी का क्या नाम है? मेरी पत्नी का नाम इंद्रजीत है. वो सरदारनी हैं. तो क्या वो आपकी पहले से प्रशंसक थीं? नहीं जी, उनको तो पता भी नहीं था क्रिकेट के बारे में. मैं उनके परिवार को जानता था. वो इंग्लैंड में डॉक्टर थीं. वहीं उनसे मुलाकात हुई और प्यार हो गया. बाद में हमने इंग्लैंड में ही शादी कर ली. क्या वो अभी भी लंदन में ही हैं. नहीं अभी वो हिंदुस्तान में ही हैं. उन्होंने वहाँ लंबे समय तक काम किया. और बच्चे वगैरह... लड़की है. उसका नाम निकी है. 1980 में पैदा हुई थी वो. उसका बचपन इंग्लैंड में ही बीता. मैं गर्मियों में इंग्लैंड में रहता था और ठंड में भारत रहता है.
ये तो बहुत आइडियल लाइफ़ थी. हम वापस क्रिकेट की तरफ़ लौटते हैं. आधुनिक क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी विव रिचर्ड्स ने आपकी जबर्दस्त तारीफ़ करते हुए कहा था कि एक बहुत ही बेहतरीन आदमी जिसने क्रिकेट खेला. विव रिचर्ड्स ऐसे खिलाड़ी थे जिनसे गेंदबाज़ फ़ील्ड में बहुत ख़ौफ़ खाते थे. उनकी आक्रामक बल्लेबाज़ी का अंदाज़ निराला था. फ़ील्ड के बाहर वो बहुत ही सरल व्यक्ति थे. फ़ील्ड में तो बात कम ही होती थी लेकिन मैदान के बाहर बातचीत होती रहती थी. मैं बहुत ख़ुश हूँ कि विवि सिचर्ड्स ने मेरे बारे में ऐसी टिप्पणी की थी. मैंने उनसे बहुत सीखा है. अगर खेल में कुछ हासिल करना चाहते हैं तो आपको आक्रामक होना पड़ेगा. क्या आप उनको धीरे गेंद फ़ेक देते थे जो आपको उन्होंने बेहतरीन इंसान क़रार दिया. नहीं, मुझे तो उनको गेंदें डालने का मौका ही नहीं मिलता था. नियमित गेंदबाज़ ही उनको गेंद फ़ेंकते थे जिनकी वो ख़ूब धुनाई किया करते थे. उनका प्रदर्शन भारत के ख़िलाफ़ बहुत बेहतरीन था. मुझे याद है 1974-75 में वेस्टइंडीज़ की टीम के साथ वो आए हुए थ. दिल्ली टेस्ट में वेंकटराघवन की गेंदों की ऐसी धुनाई की थी रिचर्ड्स ने कि उस समय हिंदी में कमेंटरी करने वाले जसदेव सिंह ने कहा था मुझे आज भी याद हैं वो चार शब्द....वेंकट राघवन दिल्ली गेट एंड से आए और दिल्ली गेट एंड से बाहर... हम 1983 विश्वकप क्रिकेट पर भी आएँगे जहाँ आप की हीरो जैसा प्रदर्शन था लेकिन पहले आप ये बताएँ कि आपको अपने अंदर बाहर होने पर ख़राब नहीं लगता था कि बहुत से ऐसे खिलाड़ी थे जो ख़राब प्रदर्शन करके टीम में बने रहते थे लेकिन आप अक्सर बाहर होते रहते थे. मुझे लगता है कि अमरनाथ मान ने अगर फ़ायदा दिया तो इससे अड़चने भी आती थी. मैं देखता था कि मैं अगर एक–दो मैच में ख़राब खेलूँ तो मुझे बाहर बैठा दिया जाता था लेकिन दूसरों को टीम में बनाए रखा जाता था. मुझे ये बहुत ख़राब लगता था. लेकिन इससे मैं और भी मज़बूत इंसान बना. मैं उन्हें प्रदर्शन से बताना चाहता था कि मैं देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की तरह खेल सकता हूँ. चुनौती ने मुझे सुधार करने का मौका दिया. कहते हैं कि इतिहास अपने को दोहराता है. जो मेरे पिता जी के साथ हुआ वही मेरे साथ भी हुआ. वो हमेशा कहते थे कि हौसला नहीं हारना चाहिए और सही वक़्त का इंतज़ार करना चाहिए. उनका कहना था कि अगर आपके पास योग्यता है तो आप वापसी ज़रूर होंगे. इसी प्रेरणा से मैं कमबैक करता रहा. बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ है आपकी. डॉक्टर साहिबा का दिल जीतने में क्रिकेट का स्थान चाहे न भी रहा हो लेकिन आपकी मधुर आवाज़ का ज़रूर योगदान रहा होगा. हम आपके के कमबैक की बात कर रहे थे. आज लारा लगभग 37 साल के और जयसूर्या 36 के हो रहे हैं लेकिन आप तो 34-35 साल की उम्र में वापसी करते थे. कैसे इतना फ़िट रखते अपने आपको. मैं फ़िटनेस पर बहुत मेहनत करता था. ये बचपन के अनुशासन का नतीज़ा था. 1982-83 में जब मैं कमबैक कर रहा था तो मैं ये जानता था कि भारत की टीम में इस उम्र में जगह बनाए रखना बहुत कठिन है क्योंकि 31-32 की उम्र में खिलाड़ियों को सीनियर माना लिया जाता था. उसके लिए मैं बहुत मेहनत करता था. मैं जानता था कि अगर मैं शारीरिक रूप से फ़िट रहूँ तो तो मैं बेहतरीन प्रदर्शन कर सकूँगा. क्योंकि मैं मानता था कि मेरे पास प्रतिभा है. प्रतिभा और फ़िटनेस के दम पर मैं अपने आपको साबित करना चाहता था. इंग्लैंड में जहाँ मैं अपनी पत्नी के साथ रहता था वहाँ मैं पागलों की तरह दौड़ था. मैं क़रीब आठ-दस किलोमीटर की दौड़ लगाता था. रोज़र बिन्नी और अंशुमान गायकवाड़ एक बार मेरे साथ दौड़न आए थे लेकिन वो दो चक्कर में थककर बैठ गए. वो मुझे मैडमैन कहते थे. मेरे में ज़ुनून था. मैं अपनी फ़िटनेस हमेशा बनाए रखता था. मुझे बताया गया कि सौरभ गाँगुली जो टीम से बाहर थे. वो अपनी फ़िटनेस पर बहुत ध्यान देते थे. क्योंकि जो टीम से बाहर होता है वो जानता है वो अपने प्रदर्शन के दम पर ही वापसी कर सकता है. हम सीधे 1983 के विश्वकप की बात करें. आपने 1982-83 में वापसी की. आप उस समय भी अच्छे खिलाड़ी थे लेकिन क्या वो पता था कि आप मैन ऑफ़ द सिरीज़ बन जाएँगे. जब हम फ़ाइनल मैच खेलने वाले थे तो मुझे एक बात याद आई कि 1975 के विश्वकप में हम लोग लार्ड्स मैदान की दर्शक दीर्घा से ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज़ का फ़ाइनल मुक़ाबला देख रहे थे. उस समय मैंने सोचा कि काश कभी ऐसा हो कि हम भी विश्वकप फ़ाइनल मैच खेलें और दुनिया हमें देखे. और वो कहते हैं न कि अगर सपने देखों तो वो सच होते हैं. मेरा भी सपना सच हुआ. और हम 1983 का विश्वकप खेले. उस दिन का मैच मैं रेडियो पर सुन रहा था. मैं सोच रहा था कि चार कदम का रनप लेकर ये आदमी कैसी गेंद फ़ेंक रहा है कि इसे विकेट मिल जा रही है. क्या ये आपका ख़ास तरीका था. मेरा ख़याल था कि वो बल्लेबाज़ भी सो जाता था. पहले मेरा रनप लंबा हुआ करता था लेकिन मैंने मान लिया था कि हिंदुस्तान की परिस्थितियों में मैं बेहतरीन गेंदबाज़ी नहीं कर सकता इसलिए मैंने बल्लेबाज़ी पर ध्यान देना शुरू किया. मैं गेंदबाज़ी कम करने लगा. गेंदबाज़ी कम करना से मुझे बहुत फ़ायदा हुआ. मुझे विश्वकप में सही समय पर मौका मिला. वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ खेला हुआ था उनकी कमज़ोरी और ताक़त जानता था. इस तरह मैंने टीम के लिए योगदान दिया था और वो टीम की जीत थी. चाणक्य कहते हैं कि आप जानवरों से बहुत कुछ सीख सकते हैं. वफ़ादारी सीखनी हो तो कुत्ते से सीखें. लड़ाई हमेशा अपनी जमीन पर ही लड़नी चाहिए. मगरमच्छ पानी में सबको मार देगा लेकिन जमीन पर उसे कुत्ता भी हरा देगा. इसका मतलब ये है कि चाणक्य ने आपको विश्वकप में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए बहुत सहायता पहुँचाई. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ खेले गए सेमीफ़ाइनल के बारे में हमें कुछ बताएँ. हमें बहुत सुकून था कि हम सेमीफ़ाइनल खेल रहे थे. हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हम कभी सेमीफ़ाइनल खेलेंगे. हमने बेहतरीन टीमों को हराया था और इस मैदान को देखने के बाद हम समझ गए थे कि हम बराबरी का मैच खेलेंगे. इसी मैदान पर हम पहले भी खेल चुके थे वहाँ हमने वेस्टइंडीज़ को हराया था. सबने अपनी भूमिका बढ़िया से अदा की. लेकिन एक आदमी जिसके योगदान को हम हमेशा भूल जाते हैं वो था रोज़र बिन्नी जो हमें बिल्कुल सही समय पर विकेट दिलाता था. इस मैच में भी उसने ऐसा ही किया. और बाक़ी खिलाड़ियों ने भी बढ़िया खेल दिखाया. मुझे भी उसने कभी प्रभावित नही किया. लेकिन वो सही समय पर सही विकेट लाकर देता था. वो एक एंग्लो-इंडियन आदमी था जो अजीब-सी हिंदी बोलता था. बहुत ही शानदार इंसान था. हमेशा मुस्कुराता रहता था. शाम को बियर पीनी होती थी. छुट्टी में मछली मारने जाना होता था. उसका बड़ा योगदान था विश्वकप में. दूसरा जिस आदमी का योगदान था वो था मदनलाल. वो और बिन्नी सही समय पर विकेट लाकर देते थे. ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ जो मैच था उसमें जीत दिलाने में इन दोनों का बहुत योगदान था. और सेमीफ़ाइनल में भी बिन्नी ने शुरुआत में ख़तरनाक दिख रही इंग्लैंड की टीम को भी झटके दिए और टीम को सफ़लता दिलाई. मोहिंदर साहब अगर हम 1983 के विश्वकप के फ़ाइनल की बात करें तो आप क्या लगता है कि मैच का टर्निंग प्वाइंट क्या था. लोग अलग-अलग राय देते हैं लेकिन मैच के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी की राय क्या है. मेरा मानना है कि टीम का सामूहिक प्रयास ही इस मैच का टर्निंग प्वाइंट था ये किसी एक व्यक्ति के प्रयासों का नतीज़ नहीं था. बहुत लोग कहते है कि कपिल का बेहतरीन कैच टर्निंग प्वाइंट था. वो एक टर्निंग प्वाइंट था. क्लाइव लॉयड का आउट होना, बलविंदर सिंह का गॉर्डन ग्रीनिज़ को आउट करना भी एक टर्निंग प्वाइंट था. डेसमंस हेंस का आउट होना भी एक टर्निंग प्वाइंट था. मेरे ख़याल से दस के दसों विकेट गिरना मैच का टर्निंग प्वाइंट था. सबसे बड़ी बात ये थी कि जब भी हमें विकेट चाहिए थी हमें विकेट मिलती रही. कपिल, रोज़र बिन्नी, मदन लाल और मुझे ख़ुद भी सही समय पर विकेट मिलती रहीं. हमें एक बात मालूम थी कि वेस्टइंडीज़ दबाव में तेज़ खेलने लगती है और मैदान की जो परिस्थितियाँ थीं वो ऐसा करने में सहयोगी नहीं थीं. एट टीम की तरह सभी खिलाड़ियों का योगदान था. हमने अधिक रन नहीं बनाए थे लेकिन हमारे अंदर आत्मविश्वास था कि हम फ़ाइनल खेल रहे थे. हमने वेस्टइंडीज़ को पहले हराया था. हम सिर्फ़ ये सोचकर खेलने उतरे थे कि हम क्रिकेट खेलने जा रहे हैं. हमें बेहतर प्रदर्शन करना था क्योंकि लोग हमेशा आपके प्रदर्शन को याद करते हैं. अच्छा ये बताइए कि ड्रेसिंग रूम में क्या माहौल हुआ करता था. क्या वो एक संगठित टीम थी या हर बार की भारतीय टीम की तरह उसमें भी दिक्कतें थीं. क्योंकि बालकनी का जो फ़ोटो हम देखते हैं उसमें गावस्कर मुझे ख़ुश नहीं दिखते. मैं गलत भी हो सकता हूँ. ड्रेसिंग रूम का वातावरण बहुत ही आरामदायक हुआ करता था. कोई रणनीति नहीं बनती रहती थी. उन दिनों हमारे मैनेजर हैदराबाद के मानसिंह थे जो क्रिकेट की सारी बाते टीम पर ही छोड दिया करते थे. ये मैं अच्छा भी मानता हूँ. मेरा मानना है कि हर खिलाड़ी को अपना काम मालूम है. बल्लेबाज़ को पता हैकि उसे रन बनाने हैं. गेंदबाज़ को विकेट लेनी हैं. कोई किसी को बताता नहीं था कि दूसरे को क्या करना है. एक पेशेवर खिलाड़ी की तरह सबको अपना काम मालूम होता था. सब अपने में मस्त रहते थे. सब अलग-अलग तरह के लोग थे. कपिल, बिन्नी अपनी धुन में रहते थे. संदीप पाटिल, कीर्ति आज़ाद मज़ाकिया किस्म के थे. गावस्कर अपने स्वभाव के अनुसार थोड़ा अकेले रहा करते थे. श्रीकांत के बारे में आपका क्या कहना है. वो कुछ-कुछ करता रहता था. जैसी वो क्रिकेट खेलता था वैसे ही वो ड्रेसिंग रूप में भी रहा करता था. और ये रिलैक्स माहौल पूरी श्रँखला में बना रहा. जिसकी वज़ह से हमें बहुत फ़ायदा हुआ. आपकी पीढ़ी में आपके सबसे प्रिय खिलाड़ी कौन थे. सबसे प्रिय खिलाड़ी तो कोई नहीं है. हाँ, लेकिन अच्छे खिलाड़ी तो ज़रूर थे. गावस्कर एक महान बल्लेबाज़ थे और एक बेहतरीन हरफ़नमौला खिलाड़ी के रूप में कपिल थे. क्योंकि गेंदबाज़ी के साथ-साथ बल्लेबाज़ी करना बहुत ही कठिन काम है. लेकिन एक खिलाड़ी जिसने सबसे अधिक प्रभावित किया वो थे बल्लेबाज़ विश्वनाथ. इनका जैसा प्रदर्शन था वैसा क्रेडिट उनको नहीं मिला. शायद इसका कारण ये भी हो सकता है कि गावस्कर और विश्वनाथ एक ही समय खेल रहे थे. और गावस्कर के सामने उनका नाम दब गया हो. लेकिन टेस्ट मैच में जहाँ भी भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया वहाँ विश्वनाथ का योगदान मौज़ूद था. बहुत ही आश्चर्य की बात है कि कपिल ने भी विश्वनाथ को अपना सबसे प्रिय खिलाड़ी बताया था. तेज़ गेंदबाज़ी को वो बेहतरीन तरीके से खेलते थे और कठिन विकेटों और परिस्थितियों में भी उन्होंने अच्छा खेल दिखाया. उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता था. वो शायद बहुत नम्र भी थे.. नहीं, नम्र तो सभी हिंदुस्तानी खिलाड़ी थे. खाँटी कर्नाटक के इंसान थे. अपने खेल से मतलब रखते थे. शाम को अपनी ड्रिंक्स लेते थे. न किसी को कुछ कहना, न किसी के बारे में बातें करना. बहुत ही नेक इंसान थे. बहुत योगदान है उनका हिन्दुस्तान की क्रिकेट को. उनको भी उसी सिरीज़ में मौका मिला था जिसमें मुझे मिला था वो पहला टेस्ट खेले थे और मैं अंतिम टेस्ट. जहाँ भी भारत ने जीत दर्ज़ की वहाँ विश्वनाथ का योगदान ज़रूर देखने को मिलेगा. आपका ऑलटाइम फ़ेवरेट क्रिकेटर कौन है. फ़ेवरेट क्रिकेटर तो कई हैं जब मैं खेल रहा था तब इयान बॉथम, विव रिचर्ड्स, ग्रीनिज़ थे. भारतीय क्रिकेटरों में कपिल, विश्वनाथ और गावस्कर थे. लेकिन एक नाम लेना है तो मैं इमरान ख़ान का लूँगा. क्योंकि वो एक बेहतरीन कप्तान थे. उनका करिश्मा था. वो बहुत आक्रामक थे. उनको पता होता था विपक्षी के साथ कैसे बर्ताव करना चाहिए. एक कप्तान, एक क्रिकेटर, एक तेज़ गेंदबाज़ और मैदान से बाहर एक बेहतरीन शख़्सियत में जो कुछ होना चाहिए वो सब इमरान में था. क्योंकि कप्तान ऐसा होना चाहिए जिसकी खिलाड़ी मैदान के बाहर भी इज्ज़त करें. आपने इमरान का सही नाम लिया. मेरा मानना है कि मंसूर अली खाँ पटौदी भी ऐसे ही कप्तान थे वैसे मैदान की सफ़लता में वो इमरान के सामने कहीँ नहीं ठहरते थे. बिल्कुल, सिर्फ़ ये ज़रूरी नहीं कि आप कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं बल्कि एक कप्तान के लिए भी ये ज़रूरी है कि वो अपने खिलाड़ियों के प्रदर्शन को उभारे. वो चीज़ें मैंने इमरान ख़ान में देखी. कप्तान थे, तानाशाह थे, गुस्सा भी करते थे, अपने खिलाड़ियों को गालियाँ भी देते थे. अपने खिलाड़ियों को प्यार भी देते थे. लाहौर के पंजाबी पठान थे तो उनमें ये सब बातें होना लाज़िमी भी था. आपकी ज़िंदगी में सुकून का राज़ वो रुमाल तो नहीं जो आप अपनी ज़ेब में रखते थे. अभी भी रखते हैं कि नहीं. नहीं अब नहीं रखता. अब उसपर सभी खिलाड़ियों के हस्ताक्षर करा लिए हैं और उसे फ़्रेम कराने वाला हूँ. वो एक भाग्यचिह्न था. जैसे सभी क्रिकेटर अंधविश्वासी होते हैं हमारे समय होते थे, अभी भी होते होंगे. वो रुमाल मेरे लिए 1983 के विश्वकप में बहुत भाग्यशाली साबित हुआ. और वो हैट जो आप पहनते थे उसको भी फ़्रेम करवा लिया या अभी पहनते हैं. नहीं-नहीं, देखिए दो चीज़ें हैं- मैदान पर क्रिकेट और बाहर ज़िंदगी. तो बहुत खेल लिया आजकल ज़िंदगी के मज़े कर रहा हूँ. जितने दिन ख़ुशी से गुज़र जाएँ बढ़िया है. |
इससे जुड़ी ख़बरें एक मुलाक़ात: प्रियरंजन दासमुंशी के साथ11 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: गायत्री देवी के साथ04 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: लालू प्रसाद के साथ20 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस मुलाक़ात- ख़ुर्शीद महमूद कसूरी के साथ14 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात: बाबा रामदेव के साथ06 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात - शम्मी कपूर के साथ24 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस एक मुलाक़ात- इरफ़ान पठान के साथ16 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस मुलाक़ात- लालकृष्ण आडवाणी के साथ26 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||