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बुधवार, 14 मार्च, 2007 को 14:47 GMT तक के समाचार
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क्या कमज़ोर टीमों को मिले अधिकार

बर्मूडा का एक पुलिस क्रिकेट खिलाड़ी
बर्मूडा जैसे देशों में क्रिकेट खिलाड़ियों को कम ही सुविधाएँ मिलती हैं
वेस्टइंडीज़ और पाकिस्तान के बीच हुए मैच का मज़ा लेने के बाद अब कुछ दिनों तक कम ही लोगों की नज़र क्रिकेट वर्ल्ड कप पर होंगी.

अब वहाँ नई और नौसीखिया टीमें मैदान में उतर रही हैं और इसके साथ ही ये बहस शुरू हो गई है कि क्या इन कमज़ोर समझी जाने वाली टीमों को वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में खेलने का अधिकार मिलना चाहिए.

हाल में वेस्टइंडीज़ के महान पूर्व तेज़ गेंदबाज़ माइकल होल्डिंग ने कहा था कि वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट में हल्की टीमों को शामिल नहीं किया जाना चाहिए.

उन्हीं के देश में हो रहे नौवें वर्ल्ड कप में इस बार सबसे ज़्यादा 16 टीमें हिस्सा ले रही हैं जो अगले 45 दिनों में कुल 51 मैच खेलेंगी.

इनमें दस तो वो देश हैं जो आईसीसी के पूर्ण सदस्य हैं – यानी आठ क्रिकेट शक्तियाँ, ज़िम्बाब्वे और बंग्लादेश जबकि इस बार 6 एसोसिएट सदस्यों को वर्ल्ड कप में खेलने का मौक़ा दिया गया है – स्कॉटलैंड, बर्मूडा, कीनिया कनाडा, आयरलैंड और नीदरलैंड्स.

आयरलैंड और बर्मूडा तो पहली बार इस टूर्नामेंट का स्वाद चख़ रहे हैं. लेकिन वर्ल्ड चैंपियन ऑस्ट्रेलिया के कप्तान रिकी पॉन्टिंग का कहना है कि इन टीमों को बड़ी टीमों के साथ खेलने का मौक़ा तो मिलना चाहिए लेकिन वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफ़ी में नहीं.

उनका कहना था कि इन टीमों की वजह से वर्ल्ड कप इतना लंबा हो गया है और इतने मैच एकतरफ़ा होने लगे हैं कि उसमें लोगों की दिलचस्पी कम होने लगी है.

आईसीसी के जनरल मेनेजर डेव रिचर्डसन इस बात से सहमत नहीं है. वो कहते हैं, इन टीमों के यहाँ खेलने से उन देशों में क्रिकेट के प्रति जो दिलचस्पी बढ़ेगी, उसके बारे में सोचिए और क्रिकेट प्रेमी कहीं भी हों, क्या वो उलटफेर नहीं देखना चाहते.

वर्ल्ड कप से पहले अभ्यास मैच में बंग्लादेश ने न्यूज़ीलैंड को हरा दिया था, क्या पता ग्रुप मैचों में और हैरान करने वाले नतीजे देखने को मिलें.

इतिहास गवाह है

आईसीसी की इस दलील में दम भी है – सबको याद है किस तरह 1983 के वर्ल्ड कप में ज़िम्बाब्वे ने ऑस्ट्रेलिया को धूल चटा दी थी, 1996 में कीनिया ने वेस्टइंडीज़ को पटख़नी दे दी थी और 1999 में पाकिस्तान पर बंग्लादेश की जीत को कैसे भुलाया जा सकता है.

बांग्लादेश की क्रिकेट टीम

पिछले वर्ल्ड कप की ही बात करें तो कीनिया ने श्रीलंका को हरा कर सेमिफ़ाइनल तक पहुँच कर जो कारनामा किया था, वो तो इतिहास में दर्ज है.

कीनिया के कप्तान स्टीव टिकोलो का कहना है कि 2003 के उस शानदार सफ़र से उन्हें जो हौसला मिला है उसके सहारे इस बार के वर्ल्ड कप में कमाल दिखाना चाहते हैं.

रिकी पॉन्टिंग का मानना है कि छोटी टीमें बड़ी टीमों के साथ खेल कर अनुभव और आत्मविश्वास बढ़ाना चाहती हैं लेकिन पता नहीं मज़बूत टीमों से बुरी तरह पिट कर उन्हें क्या हासिल होगा, पॉन्टिंग के हिसाब से तो इस तरह उन टीमों का हौसला और गिरेगा.

लेकिन अपना पहला वर्ल्ड कप खेल रहे बर्मूडा के कप्तान इर्विन रोमेन पूछते हैं अगर कमज़ोर टीमों को बड़ी टीमों के साथ खेलने का कोई मौक़ा ही दिखाई नहीं देगा तो उनके यहाँ क्रिकेट को बढ़ावा कैसे मिलेगा.

क्रिकेट का प्रसार

क्रिकेट दुनिया से जुड़े ज़्यादातर लोग इस खेल को दुनिया भर में फैलाने के पक्ष में हैं और वो तभी हो सकता है जब ये उन देशों में भी पैर पसारे जहाँ फ़ुटबॉल और अन्य खेलों का बोलबाला है.

क्रिकेट के प्रसार की ज़िम्मेदारी है अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद के कंधों पर जिसने दुनिया के 96 देशों को अपना सदस्य तो बना लिया है लेकिन अब भी क्रिकेट दक्षिण एशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, अफ़्रीका के कुछ देशों, वेस्टइंडीज़ और इंग्लैंड के अलावा कहीं और उतना लोकप्रिय नहीं है.

वेस्टइंडीज़ के कप्तान ब्रायन लारा मानते हैं क्रिकेट को बढ़ावा देने की ज़रूरत है और इन नई टीमों के विरोधियों को ये नहीं भूलना चाहिए कि कभी उनकी टीम भी इसी तरह नौसिखिया थी चाहे वो 1920 के दशक में वेस्टइंडीज़ हो या फिर 80 से पहले श्रीलंका, हर कोई उस दौर से गुज़रा है.

मुश्किल हालात में क्रिकेट

दरअसल, इन एसोसिएट सदस्य देशों में जिन मुश्किल हालात में लोगों ने क्रिकेट को ज़िंदा रखा हुआ है, वो वाक़ई क़ाबिले तारीफ़ है.

क्रिकेट का हाल
 मैं ख़ुद स्कॉटलैंड के लिए खेल चुका हूँ इसलिए जानता हूँ वहाँ खिलाड़ियों को कैसी मुश्किलें पेश आती हैं. इन टीमों को न सिर्फ़ बड़े प्रतियोगिताओं में खिलाना चाहिए बल्कि आईसीसी को इन्हें ऊपर आने में हरसंभव मदद करनी चाहिए.
राहुल द्रविड़

जहाँ बड़ी टीमों के खिलाड़ी क्रिकेट से करोड़ों रुपए कमाते हैं, वहीं इन छोटी टीमों के सदस्यों को पेट भरने के लिए अन्य काम करने पड़ते हैं. इन टीमों में खेलने वाले या तो स्कूल टीचर हैं, पुलिस वाले हैं या फिर बिज़नेसमैन.

भारतीय कप्तान राहुल द्रविड कहते हैं इन लोगों के वर्ल्ड कप में खेलने से टूर्नामेंट बोरिंग नहीं और दिलचस्प बनता है.

द्रविड कहते हैं, "मैं ख़ुद स्कॉटलैंड के लिए खेल चुका हूँ इसलिए जानता हूँ वहाँ खिलाड़ियों को कैसी मुश्किलें पेश आती हैं. इन टीमों को न सिर्फ़ बड़े प्रतियोगिताओं में खिलाना चाहिए बल्कि आईसीसी को इन्हें ऊपर आने में हरसंभव मदद करनी चाहिए."

द्रविड ने जिस प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में ये बात की, वहीं बैठे थे नीदरलैंड्स के कप्तान लूक वान ट्रूस्ट जो बार बार ये सुन कर तंग आ चुके हैं कि उनकी टीम को वेस्टइंडीज़ में नहीं होना चाहिए. ट्रूस्ट ने कहा, "द्रविड की बातों से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और वो इस बार दिखा देंगे कि उन्हें वर्ल्ड कप में खेलने का पूरा हक़ है."

वैसे क्रिकेट में ज़्यादा और कमज़ोर टीमों का विरोध करने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि फ़ुटबॉल के वर्ल्ड कप में शामिल होने के लिए दुनिया भर के जो देश ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाते हैं और सभी को मौक़ा देने की बात करते हैं, उनमें उनका देश भी हो सकता है.

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