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खेल जगत में भारत की 'विकास दर' कम क्यों? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आज़ाद भारत ने इतनी भीषण हिंसा के बीच जन्म लिया जैसी दुनिया ने शायद ही कभी देखी हो. धर्म के नाम पर लाखों को मौत के घाट उतार दिया गया. उस कत्ल और उत्पात से दोनो भारत और पाकिस्तान को क्षति पहुँची. आज़ादी के साठ साल बात भी हमारी अंतरात्मा उस बपौती का बोझ ढो रही है. वैसे तो अब हमारा देश ऐसा है जो विश्व में एक महाशक्ति बनने की कोशिश कर रहा है या ये मानता है कि वो दिन दूर नहीं जब परिश्रमी और बुद्धिमान भारतीय, शक्तिशाली अमरीकियों को भी पीछे छोड़ देंगे. ये एक काल्पनिक कहानी लगती है जिसपर सभी भारतीय गर्व करेंगे और शायद दुनिया की अर्थव्यवस्था में उन्हें उनका सही स्थान भी मिलेगा. ऐसा ही हो! खेलों में पिछड़ा भारत लेकिन खेल जगत में हम कहाँ हैं? क्या अन्य क्षेत्रों की तरह खेल जगत में भी प्रगति हुई है? क्या हमारे एथलीट दुनिया के श्रेष्ठ एथलीट्स को टक्कर दे रहे हैं और क्या हम खेल की दुनिया में भी, तेज़ रफ़्तार से दौड़ती अर्थव्यवस्था की तरह, महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर हैं? दुख से कहना पड़ता है - नहीं. जब तक कर्नम मलेश्वरी और आरएस राठोड़ नहीं आए तब तक हमारे एथलीट्स को आँकने का मानक धावक मिल्खा सिंह ही थे जो 1960 के ओलंपिक में, आज से लगभग 46 साल पहले, 400 मीटर की दौड़ में चौथे नंबर पर आए थे. मिल्खा सिंह की कहानी में भारत के समाज और खेल व्यवस्था की एक झलक मिलती है. देश के विभाजन की पीड़ा सहने वाले मिल्खा सिंह, 1947 में अनाथ हो गए थे. लेकिन इस असंवेदनशील समाज में जूझते हुए वे किसी तरह से सेना में बावर्ची बन गए. सभी मुश्किलों को झेलते हुए वे विश्व स्तर के एथलीट बने, चाहे वे ओलंपिक में कभी भी कोई पदक नहीं पा सके. समृद्धि और ग़रीबी का फ़र्क उनकी उपलब्धियों को पंजाब सरकार ने माना और राज्य के खेल विभाग का निदेशक बनाया. उन्हें शोहरत के साथ-साथ पैसे भी मिला और उन्होंने अपने पुत्र जीव मिल्खा सिंह को अमीरों के खेल गोल्फ़ के लिए तैयार किया. मिल्खा सिंह के पुत्र अपने खेल में काफ़ी अच्छा कर रहे हैं लेकिन इसका उनकी काबिलियत के साथ-साथ इस बात से भी संबंध है कि उनके पिता उन पर कितना पैसा खर्च कर सकते थे. अधिकतर भारतीय ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि शहरी इलाक़ो में तो शिक्षा को केवल शोहरत और पैसा कमाने का ज़रिया माना जाता है. एक तरह से तो, भारत का खेल जगत भारत की असलीयत को ज़्यादा अच्छी तरह दर्शाता है. समाज का 'उच्च' वर्ग दिन प्रतिदिन और अमीर हो रहा है और खेल में उसे ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है. दूसरी ओर 'निम्न' वर्ग अपनी मुश्किलों को पीछे छोड़ 'उच्च' वर्ग में पहुँचने की कोशिश कर रहा है. लेकिन जीवित रहने का संघर्ष इतना मुश्किल है कि खेल के बारे में सोचना आत्महत्या करने के समान होगा. 'क्रिकेट ही मात्र अफीम' सरकार खेल पर जितना पैसा खर्च करती है वह इतना कम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत ढ़ाँचा बनाना मुश्किल है. और यदि सरकार ऐसा करे भी तो देश में खेल संगठन चलाने वाले अफ़सर और प्रबंधक इसमें से काफ़ी हिस्सा अपनी जेब में डाल लेते हैं. क्रिकेट ही जनता की अफीम है और भारतीयों के लिए ब्रितानी उपनिवेशवाद की भेंट है. ये पूरी तरह से भारतीय खेल बन गया है जिसमें हमने 1983 में विश्व कप जीता और इस उम्मीद में हैं कि किसी दिन ऑस्ट्रेलिया को पछाड़ दुनिया की नंबर वन टीम बन जाएँगे. फिर इस बात को छोड़िए कि दुनिया के कुछ एक देश ही क्रिकेट खेलते हैं. खेल जगत के ऐसे निराशाजनक समय आशा की किरण नज़र आती है शूटरों और भारोत्तोलकों से. लेकिन अपना प्रदर्शन बेहतर करने के लिए जब हमारे खिलाड़ियो पर प्रतिबंधित दवाओं के सेवन के आरोप लगते हैं तो हमारी साख को ज़्यादा फ़ायदा नहीं होता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना लोहा मनवाने और अपनी आर्थिक प्रगति और विकास दर के बराबर खेल में प्रदर्शन दिखाने के लिए भारत को बहुत कुछ करना पड़ेगा. तब तक बेहतर यही है कि हम खेल के 'ग्लोबर विल्लेज' में शामिल हों, और वहीं खुशियाँ मनाएँ, जैसे हमने हाल के विश्व कप के दौरान किया था. एक महीने तक भारतीय अख़बारों में फ़ुटब़ॉल की ख़बरें पहले पन्ने पर छाई रहीं. भारत के मध्यवर्ग को काफ़ी शर्मिंदगी हुई ये जानकर कि फ़ुटबॉल में भारत का नंबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौ से भी पीछे है. उन्होंने अपने भ्रष्ट खेल अधिकारियों को गालियाँ तो दीं, लेकिन दूसरे देशों की जीत पर ही जश्न मनाते रहे! हमारा देश का प्रदर्शन खेल जगत में अच्छा नहीं है तो क्या? हमारी मानसिकता और स्वभाव तो 'ग्लोबल' है. इसीलिए हमें उम्मीद है कि किसी न किसी दिन हम खेल जगत में भी सर्वश्रेष्ठ बनेंगे. |
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