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रविवार, 09 जुलाई, 2006 को 13:47 GMT तक के समाचार
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पीड़ा एक होनहार फ़ुटबॉल खिलाड़ी की

विनोद शर्मा
विनोद राजस्थान की टीम का प्रतिनिधित्व करते थे
कभी फुटबॉल के होनहार खिलाड़ी रहे जयपुर के 40 वर्षीय विनोद शर्मा अब एक अभिशप्त जीवन जीने को विवश हैं.

विश्वकप फुटबॉल का मुक़ाबला देखने लगी करोड़ों आँखों में दो आँखें विनोद की भी हैं. लेकिन उनकी अपनी दुनिया में अंधेरा बहुत घना है.

16 साल पहले एक हादसे ने इस प्रतिभावान ख़िलाड़ी को हमेशा के लिए लाचार बना दिया. 29 अक्तूबर 1989 का वो मनहूस दिन याद याद कर विनोद आज भी सिहर जाते हैं.

उस दिन जयपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ और खेल मैदान से लौटते विनोद पर एक उन्मादी भीड़ ने हमला कर दिया.

उन्हें दो दिन बाद होश आया और फिर वे डेढ़ साल के लिए कोमा में चले गए. चेतना लौटी तो विनोद की ज़िंदगी बदल चुकी थी.

फुटबॉल के मुकाबलों में आठ बार राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर चुके विनोद के पैरों में कभी बिजली दौड़ती थी.

लेकिन अब जैसे ज़िंदगी थम सी गई है. जीवन व्हील चेयर से बँध गया है और एकमात्र सहारा बूढ़ी माँ कांता देवी उसे धकेल रही हैं.

प्रतिनिधित्व

रिज़र्व बैंक के अधिकारी और फुटबॉल के नामी खिलाड़ी रहे जसवंत सिन्हा बताते हैं कि विनोद ने सब जूनियर और सीनियर स्तर पर संतोष ट्रॉफ़ी में राजस्थान का कई साल तक प्रतिनिधित्व किया.

उन्होंने बताया कि विनोद एक बेहतरीन गोलकीपर थे जो अभेद्य किले की तरह खड़े हो जाते थे. हादसे के वक़्त विनोद रिज़र्व बैंक में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी थे.

अब उन्हें कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही है. उनके साथी खिलाड़ी ही मदद कर रहे हैं या फिर पिता स्वर्गीय बाबूलाल की दो हजार रुपए मासिक पेंशन से गुजारा हो रहा है.

खिलाड़ियों की गुहार पर सरकार और खेल परिषद का दिल पसीजा. लेकिन यह दरियादिली 37 हज़ार रुपए से ज़्यादा नहीं बढ़ी. विनोद के पास जीत के तमग़े हैं जो अब सांत्वना का काम देते हैं.

ग़म

विनोद जब मैदान पर आक्रामक होकर उतरते तो प्रतिद्वंद्वी टीम का संतुलन बिगड़ जाता. लेकिन अब बोलते बोलते खुद विनोद की साँस उखड़ने लगती है. लेकिन अब भी उसमें जीने की ललक है. वे कहते हैं, ‘‘मैं एक बार फिर मैदान में ठीक होकर उतरना चाहता हूँ.’’

माँ कांता से अपने लाल की हालत देखी नहीं जाती. ‘‘अभी तो मैं देखभाल कर रही हूँ मेरे बाद विनोद का क्या होगा.’’ यह कहते हुए उनकी आँखे भर आती है.

माँ कांता और खिलाड़ियों ने हर उस दरवाजे पर दस्तक दी जहाँ मदद मिल सकती थी. लेकिन राज व्यवस्था ऐसी पुकार पर भला कहाँ ध्यान देती है.

बात-बात पर जाति की तलवार लहराने वाले जाट समाज के संगठन भी खामोश हैं. माँ कांता तो कल चली जाएगी पर क्या एक सौ करोड़ की भारत माता अपने इस लाल की हालत पर गौर करेगी?

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