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फ़िल्मों पर भी चढ़ा फ़ुटबॉल का रंग | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के संदर्भ में एक अंग्रेज़ी कहावत मशहूर है, 'डबल सी –क्रिकेट और सिनेमा रूल्स द पीपल्स हार्ट्स' यानि भारत में क्रिकेट और सिनेमा लोगों के दिलों पर राज करते हैं. लेकिन आजकल फ़ुटबॉल विश्व कप चल रहा है. मौसम फ़ुटबॉल का है और लोगों पर डबल सी के बजाय डबल एफ़ यानि फ़ुटबॉल और फ़िल्मों का जादू छाया हुआ है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो फ़ुटबॉल पर फ़िल्में बन ही रही हैं, हिंदी सिनेमा भी फ़ुटबॉल के ख़ुमार से अछूता नहीं बचा है. फ़िल्में और फ़ुटबॉल
फ़ुटबॉल पर आधारित हिंदी में इन दिनों कम से कम तीन फ़िल्में बन रही हैं. यश राज फ़िल्मस के प्रतिष्ठित बैनर तले बन रही है फ़िल्म चक दे. फ़िल्म के हीरो हैं ख़ुद शाहरुख़ खान. वैसे शाहरुख़ खान का फ़ुटबॉल प्रेम जगजाहिर है. इसी महीने लंदन में शाहरुख़ खान अपनी आगामी फ़िल्म कभी अलविदा न कहना के संगीत रिलीज़ कार्यक्रम में भाग लेने आए. संगीत की बात तो बाद में हुई लेकिन शाहरुख़ खान ने कार्यक्रम में आते ही सबसे पहले लोगों को मैच का ताज़ा स्कोर बताया- उस समय जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच मैच चल रहा था. शाहरुख़ की फ़िल्म चक दे का निर्देशन कर रहे हैं शिमित अमीन जो अब तक छप्पन का निर्देशन कर चुके हैं.चक दे के अलावा निर्देशक अहमद खान ले कर आ रहे हैं यहाँ के हम सिंकदर जिसमें नाना पाटकर फ़ुटबॉल कोच की भूमिका में होंगे. भारत के बंगाल और केरल राज्य में फ़ुटबॉल का कुछ ज़्यादा ही क्रेज़ है. ज़ाहिर है मलयालम फ़िल्में भी इन दिनों फ़ुटबॉल के रंग में रंगी है. मलयालम फ़िल्मों के सुपरस्टार मोहनलाल महासमुद्रम फ़िल्म में काम कर रहे हैं जो फ़ुटबॉल पर आधारित है. महाराष्ट्र के पुणे में तो बाकायदा फ़ुटबॉल फ़िल्म फ़ेस्टिवल चल रहा है. पुरानी फ़िल्में
वैसे अगर खेल आधारित फ़िल्मों की बात करें तो इनका चलन हिंदी सिनेमा में कम ही रहा है- क्रिकेट पर बनी कुछ फ़िल्मों को छोड़कर. यहाँ याद आती है प्रकाश झा की फ़िल्म हिप हिप हुर्रे की जो अस्सी के दशक में आई थी. इसमें राजकिरण एक फ़ुटबॉल कोच के रोल में थे. अस्सी के दशक में ही आई थी निर्देशक अनिल गांगुली की साहेब जिसमें अनिल कपूर का लक्ष्य है फ़ुटबॉल खिलाड़ी बनना लेकिन पारिवारिक परिस्थितियाँ इस सपने के आड़े आ जाती हैं. 'यार बिना चैन कहाँ रे' और 'क्या ख़बर क्या पता' जैसे हिट गाने इसी ल्म के हैं. अंतरराष्ट्रीय सिनेमा
वैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ़ुटबॉल आधारित कई हिट, दिलचस्प और बेहतरीन फ़िल्में बनी हैं. गुरिंदर चड्ढा की बेंड इट लाइक बेकम इसकी ताज़ा मिसाल है. जून 2006 में आई ईरानी फ़िल्म 'ऑफ़साइड' ईरान के पुरुष प्रधान समाज में रहनी वाली महिलाओं की कहानी बयान करती है जो फ़ुटबॉल फ़ैन हैं . 1981 में ऑस्कर विजेता निर्देशक जॉन हस्टन ने बनाई थी 'एस्केप टू विक्ट्री' इसमें एक नाज़ी अफ़सर कुछ क़ैदियों को जर्मन राष्ट्रीय टीम के ख़िलाफ़ खेलने के लिए कहता है. लेकिन क़ैदियों की योजना हाफ़ टाइम के दौरान भागने की है. इसमें सिल्वेस्टर स्टैलोन और माइकल केन के अलावा फ़ुटबॉल के जादूगर पेले और बॉबी मूर ने भी काम किया था. वर्ष 2000 में फ़ुटबॉल पर आधारित एक दिलचस्प भूटानी फ़िल्म बनी थी- 'द कप' जो संभवत पहली भूटानी फ़िल्म थी. इसमें बौद्ध बिहार में रहने वाले दो भिक्षु ब्राज़ील और फ़्रांस के बीच 1998 वर्ल्ड कप फा़इनल देखना चाहते हैं जिसके लिए उन्हें टीवी और सेटेलाइट डिश की ज़रूरत है. फ़ुटबॉल के प्रति भिक्षुओं की दीवानगी और बौद्ध विहार के जीवन के बीच अंतरद्वंद्ध को फ़िल्म में हल्के फ़ुल्के अंदाज़ में बखूबी दिखाया गया है. पिछले साल फ़िल्म 'गोल' भी आई थी जिसमें डेविड बेकम और ज़िनेदिन ज़िदान ने भी बतौर मेहमान कलाकार काम किया था. 1940 में बनी थ्रिलर द 'आर्सनल स्टेडीयम मिस्ट्री' में आर्सनल और ब्रेंटफ़ोर्ड टाउन के बीच मैच का असल फ़ुटेज इस्तेमाल किया गया था. फ़ुटबॉल और समाज
अंग्रेज़ी के अलावा स्पेनिश में 'दाइस दे फ़ुटबॉल' और चिली में जनरल पिनोशे द्वारा सत्ता पलटने के बाद बनी 'इस्तादियो नाकियोनल' जैसे कई अन्य फ़िल्में भी फ़ुटबॉल आधारित फ़िल्मों की सूची में शामिल है. इन तमाम फ़िल्मों की ख़ासियत ये है कि इनमें सामुदायिक, पारिवारिक, नस्लभेद और लिंगभेद समेत कई समस्याओं को फ़ुटबॉल के ताने बाने पर बुना गया है. ऐसी ही एक फ़िल्म- 'विलेज फ़ुटबॉल' भारत के साईनाथ चौधरी ने बनाई है जो एक लड़के की फ़ुटबॉल के प्रति जुनून को दर्शाती है और इसकी अवधि है मात्र एक मिनट. इसे बर्लिन में हो रहे फ़ीफ़ा के आधिकारिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल किया गया है. ज़ाहिर है कि विश्व कप के चलते फ़ीफ़ा को दुनिया भर में बनी फ़ुटबॉल आधारित फ़िल्में दिखाने का बेहतरीन मौका मिला है. और विश्व कप के बहाने ही सही, भारत में भी खेल और फ़ुटबॉल आधारित विषयों की सुध ली जा रही है. |
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