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धर्म के लिए फ़ुटबॉल का सहारा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूरा जर्मनी वर्ल्ड कप के रंग में ऐसा रंगा हुआ है कि वहीं लोगों के मन में धर्म के प्रति आस्था जगाने के लिए देश भर के गिरिजाघरों ने भी फ़ुटबॉल का सहारा लिया है. एक अंदाज़े के मुताबिक़ जर्मनी में कैथलिक और प्रोटेस्टेन्ट ईसाइयों की संख्या बराबर बराबर है, 33–33 प्रतिशत. और उसके बाद धर्म के आधार पर तीसरी सबसे बड़ी पहचान है उन लोगों की जो ईश्वर को मानते ही नहीं. जर्मनी की 24 करोड़ आबादी में से 28 प्रतिशत लोगों को ईश्वर पर भरोसा ही नहीं. शायद यही वजह है कि यहाँ के गिरिजाघरों ने फ़ुटबॉल का सहारा लिया है और वो भी ऐसे समय जब वर्ल्ड कप का नशा यहाँ सबके सिर चढ़ कर बोल रहा है. टेलीविज़न और प्रार्थनाएँ जर्मनी के एक हज़ार से ज़्यादा चर्चों ने वर्ल्ड कप के मैच लाइव दिखाने के लिए अपने यहाँ बड़ी बड़ी टेलीविज़न स्क्रीन लगाए हैं. ख़ास सेमिनार और प्रार्थनाएँ आयोजित की हैं और लोगों को बुलावा भेज रहे हैं कि वो आएँ और फ़ुटबॉल के बहाने ही सही, चर्च के दर्शन कर लें और अपने धर्म को क़रीब से जानें. जिन 12 शहरों में वर्ल्ड कप के मैच होने हैं वहाँ के गिरिजाघरों ने तो और भी ख़ास तैयारी की हैं. जो भी टीमें वहाँ खेलेंगी, मैच वाले दिन उन्हीं देशों की भाषा में प्रार्थना सभा आयोजित की जाएगी ताकि उनके समर्थक मैच से पहले उनमें भाग ले सकें. इस अनोखी पहल के बारे में हैनोवर के एक चर्च से जुड़ी कौरुला कनीसियोज़ियावोस का कहना है, "लोगों को धर्म की राह दिखाने के लिए इतना तो करना ही पड़ता है और यही तो चर्च का काम है." वो कहती हैं धर्म का प्रचार बस चर्च में बैठे रहने से नहीं होता. हमें लोगों तक पहुँचना पड़ता है, उन्हें बुलाना पड़ता है. पर एक दूसरे चर्च की सिस्टर मैरियन धर्म को फ़ुटबॉल से जोड़ने की इस कोशिश को ग़लत मानती हैं, वो कहती हैं कि खेल की जगह चर्च के अन्दर नहीं, बाहर है और उसे वहीं रहनी चाहिए. उनक कहना था, "फ़ुटबॉल तो धर्म के लिए अच्छा नहीं है, क्योंकि शायद ईश्वर से ज़्यादा लोग इस खेल में दिलचस्पी लेते हैं. कई बार मुझे लगता है एक दूसरा भगवान उतर आया है जो आकार में गोल है और उसका रंग सफ़ेद और काला है." समानता? चर्च के बाहर कुछ नौजवानों से बात की तो मिली जुली प्रतिक्रिया थी. कुछ तो गिरिजाघरों की इस पहल से बिल्कुल सहमत नहीं थे. एक छात्र डैनियल वॉफ़ का कहना था फ़ुटबॉल और धर्म बिल्कुल अलग अलग हैं, उनमें कोई समानता नहीं. वो कहते हैं कि फ़ुटबॉल मैचों में कितनी गाली गलौज और हिंसा होती है, लोग शराब पीते हैं और मार-पीट, तोड़-फोड़ करते हैं. इस सब के लिए धर्म में कोई जगह नहीं है इसलिए इनका कोई मेल नहीं. पर वर्ल्ड कप का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे एक दूसरे फ़ुटबॉल प्रशंसक बियॉन मानते हैं कि धर्म और फ़ुटबॉल में समानता है, दोनों ही ने लोगों पर ज़बर्दस्त असर डाला है. सभी जानते हैं कि खेल में अपनी टीम को जिताने के लिए अक्सर ज़ुबान पर भगवान का नाम आ जाता है, और अगर मैच वर्ल्ड कप का हो और दाँव पर लगा हो तो ऐसा हो ही सकता है. हो सकता है कि थोड़े समय के लिए ही सही... जर्मनी के गिरिजाघरों की ये कोशिश काम कर जाए. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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