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उड़न परी ने देखे सपने | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'उड़न परी' पी.टी.उषा ने केरल के छोटे से गाँव मेलाडी पयोली मे जन्म लिया और खेल-जगत में भारत को सम्मान दिलाया पद्मश्री सहित कई बड़े सम्मान और पदक पानेवाली उषा को लगता है कि अगर उन्हें पूरी सुविधाएं दी जातीं तो वह देश का नाम और भी ऊंचा कर सकती थीं. लेकिन आज वह अपनी स्पोर्ट्स अकादमी में व्यस्त हैं और भारत के लिए एक और 'उड़न परी' पैदा करने की कोशिश में लगी हैं. पेश है सूफ़िया शानी के साथ हुई उनकी बातचीत के अंश: उन्नीस सौ सत्तर में यानी महज़ तेरह साल की उम्र में मैं ने जब पहली बार दौड़ में भाग लिया तो मुझे मालूम नहीं था कि मेरी यह छोटी-सी दौड़ मुझे पूरी दुनिया की यात्रा करवा देगी. केरल के छोटे से गांव.. मेलाडी पयोल्ली..के एक साधारण परीवार में मेरा जन्म हुआ था. दौड़ने की शुरूआत स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम से हुई थी. मुझे याद है इस दौड़ के लिए मेरे मामा ने मुझे कितना प्रोत्साहन दिया था. हालाँकि उस दौड़ में शामिल होने वाली लड़कियों में मैं सबसे छोटी थी और शारीरिक रूप से उनसे कमज़ोर भी. मैंने अपनी पहली रेस में, यानी तेरह साल की उम्र में,सोलह साल की लड़कियों का मुकाबला करते हुए प्रथम स्थान पाया था और उसी सफलता ने मुझे स्पोर्ट्स स्कूल पहुंचा दिया. यहीं से मेरे दौड़ के सफ़र की शुरूआत हो गई थी. मैं अपने ज़िले की टीम में चुनी गई और मुझे दो सौ पच्चास रूपए माहवार की स्कॉलरशिप भी मिल गई. 1979 के राष्ट्रीय खेलों के अवसर पर ओपी नांबियार की नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने मेरी प्रतिभा को पहचाना. यह नांबियार सर का ही करिश्मा था कि उन्होंने एक छोटी सी तितली को "उड़न परी" में तब्दील कर दिया. मेरी सफलता के सही हक़दार नांबियार सर ही हैं. महिला होने की परेशानी भारत में एथलेटिक्स की दुनिया पर हमेशा से पुरूषों का दबदबा रहा है. मेरे समय में भी ऐसा ही था. इसलिए सारी प्रतिभा, तमाम मेहनत और लगन होने के बावजूद मुझे 'महिला' होने के सकंट झेलने पड़े. मुझे प्रोत्साहान देने के बजाए अक्सर लोग मुझे दुश्मन की निगह से देखते रहे. कभी मेरे कोच को बदल दिया गया. कभी उन्हें अंतिम समय में वीज़ा से वंचित कर दिया गया. खिलाड़ियों के जीवन में शारीरिक कष्ट होना और चोटें लगना आम बात होती है, लेकिन मेरी हर समस्या को 'नाटक' और 'बहाना' क़रार दिया गया. लेकिन मैं समझ गई थी कि आगे बढ़ने के लिए इन चीज़ों की अनदेखी करना ही बेहतर है.इस लिए मैं सब कुछ भूल कर आगे बढ़ती गई. पद्मश्री, अर्जुन पुरस्कार और उड़नपरी जैसे ख़िताब और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौ से ज्यादा पदक हासिल करने के बावजूद मन में कहीं कसक रह गई कुछ और बेहतर कर पाने की. ख़ासकर लॉस एंजेलेस ओलंपिक खेलों में एक सेकंड के सौवें हिस्से के फ़र्क़ से पिछड़ना यानी भारत के हाथों पहली बार ओलंपिक पदक आकर छूट जाना.....वह क्षण तो जीवन भर नहीं भुलाया जा सकेगा. मार्गदर्शन का अभाव लेकिन उससे भी ज्यादा अफ़सोस उचित सुविधाएँ और उचित मार्गदर्शन न मिल पाने का है.
मुझे ही क्या, मेरे साथ की लड़कियों को अगर विश्वस्तर की सुविधाएँ मिल पातीं, विश्व स्तर के कोच मिलते और विश्व स्तर का खान-पान मिलता तो हम किसी भी ऊँचाई को छू सकते थे. आज स्थितियाँ बहुत बेहतर हैं. वर्ज़िश करने के और ट्रेनिंग के आधुनिक साधन आ गए हैं. बेहतर क़िस्म के ट्रैक और जूते हैं. हमारे ज़माने में साथ प्रैक्टिस करने के लिए विश्व-स्तर के खिलाड़ी ही नहीं मिलते थे. हम राष्ट्रीय-स्तर पर अपने से कम क्षमताओं वाले खिलाड़ियों से भिड़ते थे और फिर अचानक विश्व के सर्वश्रेष्ठ मुक़ाबलों में कूद पड़ते थे. 1991 में मैंने खेल को अलविदा कह दिया था और शादी करली थी. लेकिन शादी के बाद पति के लगातार प्रोत्साहन और आत्मविश्वास के बल पर मैंने फिर पूरे जोश और दमख़म के साथ खेल की दुनिया में क़दम रखा और 1999 के एशियन ट्रैक ऐंड फ़ील्ड प्रतियोगिता में दो सौ मीटर और चार सौ मीटर दौड़ में देश के लिए कांस्य पदक जीते. इस सफलता से मुझे जो संतोष मिला, उसे शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है. हाँ...अब एक नई उषा पैदा करना ही सपना है यानी भारत के लिए ऐसे एथलीट पैदा किए जाएँ जो वहाँ तक पँहुचे जहाँ अब तक कोई देशवासी नहीं पँहुच पाया है. मेरी दिली तमन्ना है कि मेरी स्पोर्ट्स अकादमी में वर्ष 2012 तक देश के लिए ओलंपिक पदक जीतने वाली या जीतनेवाला एथलीट तैयार हो जाए. यही मेरा जीवन है और यही मेरा सपना है और मैंने अपने रात और दिन इसी सपने को पूरा करने में लगा दिए है. बेटे उज्जवल के भविष्य के सपने भी उज्जवल हैं लेकिन हम उस पर कुछ थोपना नहीं चाहते. मैं धावक हूँ तो ज़रूरी नहीं है कि वह भी मेरी तरह बने. आजकल क्रिकेट का ज़माना है अगर वह क्रिकेटर बनना चाहेगा तो भी हमारा प्रोत्साहन उसके साथ है. आराम के क्षणों में, मैं घर परिवार से गपशप करती हूँ और संगीत सुनती हूँ. हिंदी फ़िल्मों के गाने मुझे पसंद हैं. विशेष रूप से लता और रफ़ी की आवाज़. लताजी का गाया यह गाना ---कभी तो मिलेगी..कहीं तो मिलेगी.. बहारों की मंज़िल..राही--. इस गाने में जो मंज़िल पाने की ललक और रफ्तार है, वह मुझे अच्छी लगती है. धावक हूँ ना. |
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