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हमेशा विवादों में रहे हैं ग्रेग चैपल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ऑस्ट्रेलिया के तीनों चैपल बंधुओं में सबसे ज़्यादा चर्चित ग्रेग चैपल अब भारतीय क्रिकेट टीम के नए कोच हैं. पाँच साल पहले भी भारतीय टीम के कोच पद की दौड़ में ग्रेग चैपल सबसे आगे थे लेकिन तब बाज़ी मारी थी जॉन राइट ने. इसका ग्रेग चैपल को भी मलाल था और शायद इसलिए ग्रेग चैपल इस बार मौक़ा हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे. अपने शानदार क्रिकेट करियर और क्रिकेट की अपनी समझ के कारण भारतीय बोर्ड ने चैपल को ये चुनौतीपूर्ण भूमिका दी है. ऑस्ट्रेलिया के आकर्षक बल्लेबाज़ों में से एक माने जाने वाले 57 वर्षीय ग्रेग चैपल अभी तक किसी अंतरराष्ट्रीय टीम के कोच नहीं रहे हैं लेकिन पाँच साल तक उन्होंने साउथ ऑस्ट्रेलिया के कोच के रूप में काम किया है. 1970 में अपना टेस्ट जीवन शुरू करने वाले ग्रेग चैपल को क्रिकेट विरासत में मिली थी. उनके दादा विक्टर रिचर्डसन क्रिकेट खेलते थे और इसका असर यूँ पड़ा कि तीनों भाई ग्रेग, इयन और ट्रेवर चैपल ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के चर्चित नाम बन गए. अपने पहले और आख़िरी टेस्ट में शतक लगाने का अनोखा रिकॉर्ड बनाने वाले ग्रेग चैपल ने अपने 14 साल के क्रिकेट करियर में कई यादगार पारियाँ खेलीं. अपने शानदार प्रदर्शन के कारण दो साल बाद ही ग्रेग चैपल विज़्डन क्रिकेटर ऑफ़ द ईयर चुने गए. अपने बड़े भाई इयन चैपल के बाद 1975 में टीम की कप्तानी ग्रेग चैपल को मिली. कप्तान के रूप में भी ग्रेग चैपल का प्रदर्शन सराहनीय रहा. 48 टेस्ट में कप्तानी करने वाले ग्रेग चैपल ने 21 में अपनी टीम को जीत दिलाई. ग्रेग चैपल ने अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जीवन में 87 टेस्ट खेले और 53.86 की औसत से 7110 रन बनाए. उन्होंने 24 शतक भी लगाए. ग्रेग चैपल ने 74 एक दिवसीय मैच भी खेले और 40.18 की औसत से 2331 रन बनाए. विवाद ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट में मशहूर नाम रहे ग्रेग चैपल का विवादों ने कभी भी पीछा नहीं छोड़ा. अपने करियर की ऊँचाई पर ग्रेग चैपल को कैरी पैकर की चमकीली दुनिया रास आ गई.
उस समय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के जिन सूरमाओं ने बाग़ी रुख़ अपनाते हुए 'पैकर सर्कस' में उछल-कूद मचाई थी, उनमें ग्रेग चैपल भी थे. 1977 से 1979 तक कैरी पैकर की वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट में शामिल होने के कारण ग्रेग चैपल का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर कुछ बाधित रहा लेकिन बाद में वे समझौते की राह पर चले और टीम में उनकी वापसी हुई. एक बार फिर टीम की कप्तानी उन्हें मिली. लेकिन 1981 में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ एक दिवसीय मैच में उनके एक फ़ैसले ने एक बार फिर विवादों को हवा दे दी. न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ यह मैच ऑस्ट्रेलिया हार न जाए- इसलिए ग्रेग चैपल ने आख़िरी ओवर कर रहे अपने भाई ट्रेवर चैपल को आख़िरी गेंद अंडर आर्म करने का निर्देश दिया. इस पर काफ़ी विवाद हुआ और बाद में दोनों भाइयों ने माफ़ी भी मांगी. 1984 में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद कोच के रूप में ग्रेग चैपल ज़्यादा समय घरेलू क्रिकेट से ही जुड़ा रहा है. साउथ ऑस्ट्रेलिया से पाँच साल तक जुड़े रहने के अलावा पिछले साल ग्रेग चैपल ने पाकिस्तान की नेशनल क्रिकट अकादमी के सलाहकार के रूप में भी काम किया. और अब उन्हें भारतीय टीम के कोच की चुनौतीपूर्ण भूमिका मिली है. देशी और विदेशी कोच की बहस में ग्रेग चैपल ने बाज़ी तो मार ली है लेकिन अपनी रणनीति को कार्यरूप देना उनके लिए आसान नहीं होगा. |
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