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उड़नपरी ऊषा को आज भी मलाल है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की उड़न परी पीटी ऊषा भी एथेंस में अंजु बॉबी जॉर्ज का उत्साह बढ़ा रही हैं. ऊषा का मानना है कि पदक जीतने के लिए अंजु को अपने जीवन की सबसे लंबी छलाँग लगानी होगी. 6.69 मीटर की छलाँग लगा कर अंजु बॉबी जॉर्ज जब ओलंपिक के लंबी कूद मुक़ाबले के सेमीफ़ाइनल में पहुँचीं तो पीटी ऊषा वहीं स्टेडियम में मौजूद थीं और ख़ुशी से झूम उठीं. हो भी क्यों न, आख़िर ऊषा के बाद ओलंपिक एथलेटिक्स की किसी भी स्पर्धा के फ़ाइनल में जगह बनाने वाली अंजु दूसरी भारतीय महिला एथलीट हैं. अंजु की उस छलाँग के बारे में ऊषा ने बीबीसी को बताया, "अंजु ने ये छलाँग 4 इंच पीछे से लगाई, शायद वो कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. मुझे भरोसा है फ़ाइनल में वो पूरी जान लगा देगी पर पदक जीतने के लिए उसे अपने जीवन की सबसे लंबी छलाँग लगानी होगी. ऊषा बताती हैं कि हर कोई अंजू से पदक जीतने के बारे में ही पूछ रहा है, इससे वो बेवजह दबाव में आ सकती हैं. ऊषा की सलाह है कि अंजु को इस बारे में सोचे बग़ैर बस अपनी सालों की मेहनत दिमाग़ में रखनी चाहिए और ये सोचना चाहिए कि उसे देश के लिए कुछ करना है. अनोखा रिश्ता उड़न परी पीटी ऊषा का ओलंपिक खेलों से एक अनोखा रिश्ता है. 80 के दशक में पूरे एशिया में केरल की इस धाविका के पैरों ने रफ़्तार पकड़ी, एशियाई खेलों समेत इस महाद्वीप की ऐसी कोई प्रतियोगिता नहीं जिसमें ऊषा ने धूम न मचाई हो. लेकिन एक प्रतियोगिता ऐसी है जिसे जीतने की ऊषा की तमन्ना अधूरी रह गई, और वो है- दुनिया की सबसे बड़ी प्रतियोगिता यानी ओलंपिक खेल. वैसे तो ऊषा ने 1980 के ओलंपिक खेलों में हिस्सा लिया था लेकिन 1984 के खेल सिर्फ़ उनके लिए ही नहीं बल्कि पूरे भारत के लिए ख़ास मायने रखते हैं. लॉस एंजिल्स में हुए इन खेलों में पीटी ऊषा 400 मीटर बाधा दौड़ के फ़ाइनल तक पहुँचीं पर बदक़िस्मती से कांस्य पदक सैकेंड के सौवें हिस्से से उनके हाथ से निकल गया था. ऊषा को आज भी उसका मलाल है, वो कहती हैं, "मैंने एथेंस में 400 मीटर बाधा दौड़ देखी और भावुक हो गई. मुझे 20 साल पहले की अपनी वो दौड़ याद आ गई जिसमें मैं मामूली से अंतर से चूक गई थी." "अगर मैंने पहली बाधा थोड़ा जल्दी पार कर ली होती या दौड़ ख़त्म करते वक़्त अपना सिर थोड़ा आगे झुका दिया होता तो वो लम्हा मेरे नाम लिखा जाता." 20 साल पहले की वो दौड़ ऊषा को अच्छी तरह याद है और उसकी यादें बाँटते हुए वो आज भी हर बार भावुक हो उठती हैं. ऊषा एथेंस तो पहुँच गई हैं लेकिन वहाँ भी भारतीय ओलंपिक संघ के रवैए से नाराज़ हैं. वो बताती हैं, "मैं खेल गाँव जा कर अंजु को शुभकामनाएँ देना चाहती थी लेकिन मुझे अंदर जाने का पास ही नहीं दिया गया. पहले भी जब ओलंपिक मशाल भारत आई थी तब मेरे साथ बुरा व्यवहार हुआ था." "उन लोगों ने तो मुझे बुलाने की योजना ही नहीं बनाई थी लेकिन जब अख़बारों ने इस बारे में लिखा तो उन्हें दो दिन पहले मेरी याद आई. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी इसलिए मैं नहीं गई." पीटी ऊषा अब केरल में एक एथलेटिक्स स्कूल चलाती हैं और उनकी योजना है 2012 के ओलंपिक के लिए एक ऐसी महिला चैंपियन तैयार करना जो ओलंपिक में पदक जीतने का उनका अधूरा सपना पूरा कर सके. |
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