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देशवासियों को निराश नहीं करेंगी अंजलि | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एथेंस ओलंपिक में भारतीय दल की ओर से पदक जीतने के दावेदार खिलाड़ियों में शामिल हैं निशानेबाज़ अंजलि वेद पाठक भागवत. हमने अंजलि से उनकी तैयारियों और अपेक्षाओं के बारें में विस्तृत बातचीत की. अंजलि सबसे पहले तो यह बताइए कि कैसी है तैयारी एथेंस ओलम्पिक की? तैयारी तो अच्छी है. इसीलिए हम हंगरी गए थे, प्रशिक्षण के लिए. वहाँ एलेक्ट्रोनिक टार्गेट्स की रेन्जें बिल्कुल वैसी ही थी जैसी एथेन्स में होंगी और मौसम भी एथेंस जैसा ही था. थोड़ी हवा बह रही थी, इसलिए 50 मीटर की हमारी अच्छी प्रैक्टिस हुई और हंगरी की टीम के साथ भी हमने कई मैच खेले. जिससे हमारा अच्छा अभ्यास हुआ. इससे पहले, सरकार की ओर से भारत के बाहर हुए मुकाबलों में जिस तरह की मदद मिली, उससे भी काफी अच्छा अनुभव प्राप्त हुआ. आपके खेल जीवन में ऐसे कौन-कौन से महत्वपूर्ण पड़ाव आए जिनसे आपको एथेन्स के द्वार तक पहुंचने में मदद मिली? पहले तो मैं एमेच्योर शूटर थी, लेकिन सबसे बड़ा मोड़ हमारे करियर में आया जब स्पोर्ट्स ऑथोरिटी आँफ इंडिया ने हंगरी के कोच लाजलो सूचाक को हमारे लिए नियुक्त किया. उन्होंने जो हमें प्रोफेशनल ट्रेनिंग दी, उसकी वजह से हम खुद को, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर पाए. एक साल की उनसे प्रशिक्षण लेने के बाद ही हम अंतरराष्ट्रीय पदक जीत पाए जैसे राष्ट्रमंडल खेल हैं, एशियन गेम हैं, वर्ल्ड कप हैं और उनकी वजह से ही मैं सिडनी ओलंपिक में क्वालीफ़ाई कर पायी थी. लेकिन तब मैं इतनी अनुभवी निशानेबाज़ नहीं थी. सिर्फ एक साल की मेरी प्रोफेशनल ट्रेनिंग थी फिर भी मैं फ़ाइनल के लिए क्वालीफ़ाई हो गई थी. लेकिन दुर्भाग्य से, सिडनी ओलंपिक के बाद उनका अनुबंध बढ़ाया नहीं गया और उसके बाद मैंने अपने आप की ट्रेनिंग की है. मेरे साथ कोई प्रोफेशनल कोच नहीं था. उसकी कमी तो महसूस होती ही रही है और ये जो चार साल हमारे साथ थे, उसका फ़ायदा मैंने नहीं उठाया, ऐसा मुझे लग रहा है. क्योंकि 2002 में ही मुझे ओलंपिक कोटा मिला था. अगर उसके बाद ही मुझे इलेक्ट्रॉनिक टार्गेट और अच्छा कोच मिल जाता तो और फ़ायदा होता. लेकिन सरकार ने अभी एक महीने पहले मुझे कारतूस विदेश से मंगा कर दिया है और कज़ाख़स्तान के कोच लैपिडस दो महीने से हमारे साथ प्रशिक्षण के लिए हैं. और उनसे हमने अंतिम समय में कुछ सीख ली है. तकनीकी पक्ष में इतनी जल्दी सुधार की तो गुंजाइश नहीं है लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर उनके साथ अच्छी तैयारी कर रही हूं. विश्वस्तर पर चोटी के निशानेबाज़ों के साथ आप प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही हैं, उनकी तुलना में आपकी क्या क्या कमज़ोरियाँ हैं और मज़बूतियां क्या हैं?
ऐसे निशानेबाज़ों के साथ वर्ल्ड कप और वर्ल्ड चैंपियनशिप में मैं हिस्सा लेती रही हैं. उतार-चढ़ाव तो होते रहते हैं-कभी रूसी निशानेबाज़ जीतते हैं, कभी जर्मन और कभी मैं. वर्ल्ड रैंकिंग ऊपर-नीचे होती रहती है. चूंकि निशानेबाज़ी एक व्यक्तिगत खेल है, इसलिए आपका हरेक शॉट बहुत मायने रखता है और इसमें आपकी मानसिक शक्ति भी बहुत काम करती है. उसमें मैं काफी हद तक औरों से बेहतर हूं, ऐसा मुझे लगता है, क्योंकि योग और मानसिक शक्ति के विकास के लिए जो आसन हैं, उसके संबंध में भारत में ज्ञान का भंडार है. मेरा सौभाग्य है कि मैंने बहुत कुछ सीखा है और उसकी सहायता से मेरा मनोबल भी काफी बढ़ा है. लेकिन ओलंपिक खेलों के लिए तो वर्षों से सारे देश तैयारी कर रहे हैं और दूसरे देशों के निशानेबाजों के पास कहीं बेहतर आधारभूत सुविधाए हैं. उनके पास अनुभवी प्रशिक्षक हैं इसलिए फर्क तो जरूर पड़ेगा जब हम ओलंपिक में जाएंगे लेकिन मानसिक रूप से मैं पूरी तरह तैयार हूं. इसलिए मुझे काफी आत्मविश्वास है कि ओलंपिक में अच्छा प्रदर्शन करूंगी. मैं विश्व की नंबर एक निशानेबाज़ भी रह चुकी हूं, इसलिए मुझे विश्वास है कि मैं अपने देशवासियों को निराश नहीं होने दूंगी. |
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