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भारोत्तोलन प्रशिक्षकों को हटाया गया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने प्रतिबंधित दवा प्रकरण के बाद भारोत्तोलन के दो प्रशिक्षकों पाल सिंह संधू और लियोनिद तारानेन्को का अनुबंध समाप्त करने का फ़ैसला किया है. ओलंपिक खेलों में भारत की दो महिला भारोत्तोलकों के प्रतिबंधित दवाएँ लेने का राज़ खुलने के बाद खेल प्रबंधकों को काफ़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी है. दोनों महिला भारोत्तोलकों प्रतिमा कुमारी और सानामाचा चानू को अंतरराष्ट्रीय फ़ेडरेशन ने पहले ही खेलों में हिस्सा लेने से रोक दिया है. भारत के खेल मंत्री सुनील दत्त ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "इन दोनों प्रशिक्षकों से खेल अधिकारियों का विश्वास उठ गया था इसलिए यह निर्णय लिया गया." सुनील दत्त ने कहा, "उन प्रशिक्षकों की ज़िम्मेदारी थी कि वे यह भी देखें कि खिलाड़ी कौन सी दवा ले रहे हैं जो उन्होंने नहीं देखा." आरोप भारोत्तोलक प्रतिमा कुमारी ने आरोप लगाया है कि प्रशिक्षकों ने उन्हें "प्रतिबंधित दवा देने की साज़िश रची" थी. इसके बाद खेल मंत्री सुनील दत्त ने पूरे मामले की जाँच कराए जाने की घोषणा कर दी है. प्रतिमा कुमारी का कहना था कि बेलारूस में लियोनिद तारानेन्को से प्रशिक्षण लेने के दौरान उन्हें कई इंजेशक्न दिए गए जिनमें प्रतिबंधित दवा हो सकती है. संधू पिछले दस वर्षों से भारतीय भारोत्तोलकों के प्रशिक्षक रहे हैं जबकि तारानेन्को भूतपूर्व विश्व चैंपियन हैं और भारतीय भारोत्तोलन संघ ने एथेंस ओलंपिक के लिए प्रशिक्षण देने का अनुबंध उन्हें दिया था. यह पहला मौक़ा था जब ओलंपिक में किसी भारतीय खिलाड़ी को प्रतिबंधित दवाएँ लेने का दोषी पाया गया. इससे पहले 17वें कॉमनवेल्थ खेलों में भी एक भारतीय भारोत्तोलक कृष्णन मादास्वामी को प्रतिबंधित दवाओं के कारण खेलों से हटा दिया गया था. 1999 में एशियाई भारोत्तोलन चैंपियनशिप में भारत की कुंजूरानी देवी को प्रतिबंधित दवाएँ लेने का दोषी पाया गया था और उन पर छह महीने का प्रतिबंध लगा दिया गया था. |
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