रियो में 'भारतीय' थामेगा ऑस्ट्रेलियाई झंडा

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    • Author, राखी शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

31 साल के विनोद कुमार दहिया इस बार अपना पहला ओलंपिक खेलेंगे. लेकिन भारत के लिए नहीं, ऑस्ट्रेलिया के लिए.

विनोद ने एक साल पहले ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता हासिल की और पिछले महीने ही उन्होंने एफ्रिकन/ओशनिया ओलंपिक क्वॉलिफकेशन में रजत पदक जीतकर रियो ओलंपिक का कोटा हासिल किया है. वो ग्रेको रोमन के 66 किलो वर्ग में ऑस्ट्रेलिया का प्रतिनिधित्व करेंगे.

छह साल पहले विनोद कुश्ती में नई पहचान बनाने के इरादे से ऑस्ट्रेलिया गए थे. भारत में हुए एक गंभीर ट्रेन हादसे के बाद उनकी कुश्ती साथी पहलवानों से काफी पीछे छूट गई थी. ठीक होने के बाद वो दंगल में हिस्सा तो लेते रहे, लेकिन पहचान नहीं बना पा रहे थे.

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विनोद ने ऑस्ट्रेलिया से फ़ोन पर बीबीसी को बताया, "कुछ साल मैं पंजाब रहा और वहां दंगल में हिस्सा लेता रहा. वहां विदेश जाने का चलन ज़्यादा है. वहीं से प्रभावित होकर मैंने देश छोड़ने का फैसला किया और यहां आ गया."

विनोद 2010 में ऑस्ट्रेलिया में गए जहां उन्हें शुरुआत में बाउंसर और डिलिवरी बॉय की नौकरी करनी पड़ी. फिर उनका संपर्क ऑस्ट्रेलिया कुश्ती संघ के पूर्व अध्यक्ष कुलदीप बस्सी से हुआ जिनके अंडर उन्होंने यूनाइटेड रेस्लिंग क्लब में अपनी ट्रेनिंग शुरू की.

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पहले ऑस्ट्रेलिया में ही वो कई प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे. पिछले साल ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता प्राप्त करने के बाद उन्होंने इस देश के लिए ओशनिया चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीता. आज वो ऑस्ट्रेलियाई कुश्ती में एक जाना माना नाम हैं.

वो कहते हैं, ''पहले मैं सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया के अंदर ही मेडल जीतता था, तब मुझे ऑस्ट्रेलियाई संघ गंभीरता से नहीं लेता था. जब से मैंने बाहर जाकर भी पदक जीतने शुरू किए तो संघ का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित हुआ है. अब उन्हें मुझसे काफी उम्मीदें हैं.''

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भारत में कुश्ती के शुरुआती दिनों में विनोद सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त जैसे दिग्गज पहलवानों के साथ अखाड़े में रहे.

1998 में विनोद को पद्मश्री सतपाल सिंह के अंडर ट्रेनिंग के लिए भेजा गया, जहां वो ट्रेन हादसा होने से पहले तक चार साल रहे.

विनोद के बारे में सतपाल कहते हैं, "विनोद के बारे में सबसे अच्छी बात ये है कि वो मेहनती है. उसे जो भी तकनीक बताई जाती, वो उसे दिल से करता था. उसे प्रतियोगिता में उतरते वक्त डर या घबराहट भी नहीं होती."

ऑस्ट्रेलिया ने कुश्ती में 60 वर्ष से कोई पदक नहीं जीता है. ऐसे में, ऑस्ट्रेलियाई कुश्ती संघ की नज़रें अब इस भारतीय मूल के पहलवान पर टिकी हैं.

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