अमरीका क्यों कर रहा फ़ीफ़ा की पुलिसिंग?

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- Author, पॉल ब्लेक
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन
अमरीका तो फ़ुटबॉल को पसंद भी नहीं करता, कम से कम कुछ लोग तो ऐसा मानते ही हैं. फिर क्यों यह फ़ीफ़ा में कथित भ्रष्टाचार के मामले में मुख्य भूमिका निभा रहा है?
बुधवार को सुबह-सुबह स्विस पुलिस ने अमरीकी अधिकारियों के कहने पर सात फ़ीफ़ा अधिकारियों को गिरफ़्तार कर फुटबॉल को नियंत्रित करने वाली संस्था के ख़िलाफ़ व्यापक जांच शुरू कर दी.
विरोधस्वरूप फ़ीफ़ा छोड़ने वाले पूर्व रिश्वत-विरोधी सलाहकार एलेक्ज़ेंड्रा रेज अमरीका की रुचि की वजह पर कहते हैं, "बहुत सारे देश फ़ीफ़ा से त्रस्त हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घूसखोरी देखकर अमरीकी न्याय विभाग ने कहा कि अगर कोई और नहीं करता है तो वो खुद भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करेगा."
अमरीकी जांच क्यों?

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लेकिन अमरीका एक वैश्विक खेल निकाय की जांच कैसे कर सकता है.
स्विट्ज़रलैंड में गिरफ़्तारियों के कुछ समय बाद एफ़बीआई निदेशक जेम्स कोमेय ने बताया कि अमरीका किन अधिकारों के तहत ये कार्रवाई कर सकता है.
वो कहते हैं, "अगर आप अपने भ्रष्ट काम हमारी सीमाओं में करते हैं, चाहे वह बैठकें हों या फिर हमारे विश्वस्तरीय वित्तीय तंत्र का इस्तेमाल, आपको भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है."
ऐसा प्रतीत होता है कि अमरीका ने फ़ुटबॉल अधिकारियों पर दोनों ही तरह का आरोप लगाया है.
विदेशी नागरिकों का मामला

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ऐसे मामले जिनमें विदेशी नागरिक शामिल हों, उनकी जांच के लिए अमरीकी अधिकारियों को उसका अमरीका से मामूली ही सही संबंध स्थापित करना होता है.
आरोप है कि फ़ीफ़ा और इसके अंतर्गत काम करने वाले संघ विश्वकप और इनके आयोजन में होने वाले अन्य टूर्नामेंट के मीडिया और मार्केटिंग के अधिकार बेचकर पैसा बनाते हैं.
इस मामले में लगाए गए आरोप मुख्यतः 'रिश्वत और उपहारों के व्यवस्थागत भुगतान' से संबंधित हैं, जो मीडिया और मार्केटिंग के अनुबंध हासिल करने के लिए मार्केटिंग एक्ज़ीक्यूटिव्स ने किए हैं.'
यह रिश्वत अमरीका में आयोजित बैठकों में दी गई थी और इसमें से कुछ पैसा अमरीकी बैंक खातों का इस्तेमाल कर स्थानांतरित किया गया था.
अंदेशा

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बुधवार को एक प्रेस कॉंफ्रेंस में न्यूयॉर्क के पूर्वी ज़िले के कार्यवाहक वकील, केली करी ने बताया, "अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल में इस तरह का भ्रष्टाचार सालों से जारी था. हमारी जांच को भी कई साल लग गए."
अभी तक यह साफ़ नहीं है कि किस कारण से अमरीका ने ये जांच शुरू की.
कुछ लोगों का कहना है कि अमरीका 2010 और 2022 के फ़ुटबॉल विश्वकप की मेजबानी पाने में विफल रहा था और इस बात का संदेह था कि क़तर को आयोजन देने के लिए रिश्वत दी गई थी.
किताब 'सर्कस मैक्सिमसः दी इकोनॉमिक गैंबल बिहाइंड होस्टिंग ओलंपिक्स एंड द वर्ल्ड कप' के लेखक एंड्र्यू ज़िंबालिस्ट भी ऐसा मानने वाले लोगों में हैं.

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वह कहते हैं, "मैं कुछ ऐसे लोगों को जानता हूं जो अमरीका की बोली लगाने वाली समिति में थे... उन सभी को बहुत तगड़ा अंदेशा था कि किसी को ख़रीद लिया गया है."
उन्होंने बीबीसी से कहा कि उन्हें संदेह है कि नीलामी में अमरीका के हार जाने के बाद ही शायद न्याय विभाग इस मामले में कूदा.
भारी रिश्वतखोरी
क़तर को आयोजन मिलने के बाद संदेह इसलिए भी उभरा, क्योंकि गर्मियों में वहां तापमान बहुत ज़्यादा हो जाता है. यह एक ऐसा तथ्य था जिसके बाद फ़ीफ़ा की एक टास्कफ़ोर्स ने आमौर पर जून-जुलाई में होने वाले टूर्नामेंट को नवंबर-दिसंबर में करवाने का प्रस्ताव रखा.

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सुबह-सुबह हुई गिरफ़्तारियों के बाद स्विस अधिकारियों ने कहा कि वह 2018 और 2022 के विश्वकप आयोजन की नीलामी को लेकर अलग से जांच शुरू कर रहे हैं.
अमरीकी अटॉर्नी जनरल लिंच ने न्यूज़ कॉंफ्रेंस के दौरान बताया, "हमारी जांच से पता चला है कि अंतरराष्ट्रीय खेल भावना के प्रदर्शन के बजाय यह अधिकारियों की जेबें रिश्वत से भरने की बड़ी योजना में बदल गया था."
लिंच के अनुसार, "यह पैसा कुल मिलाकर 11 करोड़ डॉलर (7.2 अरब रुपये से ज़्यादा) है, जो टूर्नामेंट के अधिकारों की वास्तविक कीमत का करीब एक तिहाई था."
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