अच्छे प्रदर्शन के पीछे पति का हाथ?

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- Author, नौरिस प्रीतम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
- पदनाम, इंचियोन से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
इंचियोन में सीमा अंतिल पुनिया के डिस्कस थ्रो में गोल्ड मेडल जीतने के बाद यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या एथलेटिक्स में भारतीय महिलाओं की सफलता के पीछे उनके पति का हाथ होता है?
सीमा अंतिल से पहले कृष्णा पुनिया और उनके पति वीरेंद्र की जोड़ी, अंजू बॉबी जॉर्ज और रॉबर्ट जॉर्ज की जोड़ी और 70 के दशक में जलाजा और नरेश की जोड़ी...
इचियोन से नौरिस प्रीतम की डायरी:
इन सभी जोड़ियों में पत्नी ने पति से कोचिंग लेकर पहले से ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन किया. कोरिया आए कई एशियाई पत्रकार भारत में चल रहे इस नए चलन से काफ़ी हैरान हैं.
सीमा ने गोल्ड मेडल जीतने का श्रेय अपने पति अंकुश को दिया जिनसे उनकी शादी 2011 में हुई थी.
सीमा का कहना है कि अगर पति ही कोच हो तो फ़ायदा होता है. उनका कहना है कि एक अच्छे खिलाड़ी के लिए सिर्फ अच्छी कोचिंग ही काम नहीं आती. कोचिंग के अलावा ये भी मायने रखता है कि एथलीट क्या खा रहा है, क्या पी रहा है और क्या उसकी मानसिक हालत है.
इसे पति से अच्छा कौन जानेगा और कौन उसका ख़्याल रखेगा.
मतभेद

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1970 के दशक में धाविका जलाजा शादी से पहले राष्ट्रीय चैम्पियन थीं. लेकिन शादी के बाद नरेश ने उन्हें प्रशिक्षण दिया जिससे उनके प्रदर्शन में लगातार सुधार आया.
बाद में उन्होंने राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी कायम किया. हालांकि नरेश खुद अच्छे ट्रिपल जम्पर थे लेकिन उन्होंने अपना कैरियर दांव पर लगाकर सारा ध्यान जलाजा पर लगाया.
जलाजा ही की तरह रॉबर्ट जॉर्ज ने अपना कैरियर छोड़ कर अंजू की कोचिंग का ज़िम्मा लिया. और देखते ही देखते अंजू विश्व स्तरीय एथलीट बन गईं.
सीमा अंतिल का कहना है की पत्नी होने के नाते वो अपने पति की इज्जत करती हैं और शायद इसलिए कई बार कोचिंग के मामले में मतभेद होने के बावजूद वो अंकुश की बात मान लेती हैं.
ख़तरा

अस्सी के दशक में लांग जम्पर रीथ अब्राहम ने साथी स्प्रिंटर सुनील अब्राहम से शादी की. पहले सुनील ने रीथ की ट्रेनिंग का ज़िम्मा लिया और उसके बाद दोनों ने मिल कर बंगलोर में एक क्लब खोला जहां दोनों बच्चों को कोचिंग देते हैं.
कुछ लोगों का कहना है कि यह चलन ठीक नहीं है. इन लोगों का मानना है कि शायद पति अपनी पत्नी को सख्त ट्रेनिंग नहीं करवा सकते.
जो भी हो, लेकिन भारतीय एथलेटिक्स जोड़िया तो कम से कम अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं. ख़तरा यह है कि अगर इस चलन को ज़्यादा भाव दिया गया तो हर महिला एथलीट का पति कोच बनने के लिए कतार में खड़ा होगा.
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