इंचियोन डायरी: खाने को तरसते पत्रकार

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    • Author, नौरिस प्रीतम, वरिष्ठ खेल पत्रकार
    • पदनाम, इंचियोन से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

एशियन गेम्स विलेज में एक भारतीय अधिकारी ने डायनिंग हॉल के बाहर एक बोर्ड पर लिखा देखा 'गेस्ट अलाउड' यानी आप किसी मेहमान को खाने पर बुला सकते हैं.

बस क्या था जेब से निकाला फ़ोन और विलेज से बाहर तीन-चार दोस्तों को फोन पर न्योता दे डाला.

अब भारतीय खेल अधिकारी के मेहमान भी कम तो नहीं हो सकते.

उन्होंने भी न्योता एक-दो और दोस्तों को बढ़ा दिया.

किस्मत अच्छी थी कि दोस्तों के आने से पहले अधिकारी को पता चला कि मेहमान खा तो सकते हैं, पर उन्हें प्रति मेहमान 25 अमरीकी डॉलर देने होंगे. फिर फ़ोन निकला और देने लगे हज़ार बहाने.

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किसी तरह जान बची, लेकिन ऐसे और कितने गुल इस महान खेल अधिकारी ने खिलाए होंगे, कौन जानता है.

श्वेता का मलाल

अब खाने की बात चल ही रही है, तो यह भी बता दूं कि इंचियोन में भारत के लिए पहला पदक जीतने वाली खिलाड़ी श्वेता चौधरी को मलाल है कि अगर खेल गांव में उन्हें भारतीय खाना मिलता, तो शायद उनके प्रदर्शन पर फ़र्क पड़ता.

श्वेता ने बताया कि कैसे पिछले 3-4 दिन से वह दिन-रात रोटी तलाश रही थीं, पर उन्हें कोरियाई खाने पर सब्र करना पड़ा.

श्वेता सिंह

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श्वेता की बात में दम है. मगर उन भारतीय पत्रकारों की क्या कहें, जो इंचियोन में गाजर, मूली, टमाटर वगैरह मिलाकर खा रहे हैं ताकि कहीं उन्हें कुत्ते या किसी और जानवर का गोश्त न खाने को मिल जाए.

हद यह है कि जब दो भारतीय पत्रकार मिलते हैं तो हाय-हैलो नहीं होती.

पहले काम फिर किचेन

बल्कि दोनों एक-दूसरे से यह पूछते हैं कि रात को ठीक खाना मिला.

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कुछ ऐसे भारतीय पत्रकार हैं जो अपने साथ कच्चे चावल, दाल और राजमा लाए हैं और काम के बाद किचेन में काम शुरू होता है.

अधिकतर भारतीय पत्रकारों ने इंचियोन में होटल ऑनलाइन बुक कराए थे. किसी को ठीक से पता नहीं था कि होटल है कहां और कैसा है.

इंचियोन पहुंचकर जब उन्होंने अपना कमरा देखा तो पता चला कि जिसे वह ठीक होटल समझ रहे थे, वह महज़ रात गुज़ारने के लिए मोटेल है.

ऐसे अधिकतर कमरों में बहुत कम रौशनी के बल्ब हैं और वह सब सामान है, जिसकी उन्हें कम से कम गेम्स कवर करने में कोई मदद नहीं मिल सकती.

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होटल वाले भी हैरान हैं कि ये लोग जल्दी सुबह निकलकर रात एक-दो बजे तक आते हैं. पत्रकार मेहमान उनकी समझ से बाहर हैं.

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