कहीं खतरे में तो नहीं आनंद का खिताब?

- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
चेन्नई में शनिवार से शतरंज की बिसात पर दुनिया के दो धुरंधर आमने-सामने होंगे. एक तरफ होंगे पांच बार के विश्व चैंपियन भारत के विश्वनाथन आनंद तो दूसरी तरफ होंगे नॉर्वे के मैग्नस कार्लसन.
शतरंज के ये माहिर खिलाड़ी विश्व चैंपियनशिप में एक दूसरे को मात देने के लिए 12 बाजी क्लासिक प्रणाली के तहत खेलेंगे.
सबसे पहले जो खिलाड़ी 6.5 अंक हासिल कर लेगा वही चैंपियन बनेगा और अगर ऐसा 12 बाज़ियों से पहले हो जाता है तो फिर बाकी बाज़ियां नहीं होंगी.
अब शह और मात के इस खेल में कौन चैंपियन बनता है यह बाद में पता चलेगा लेकिन पूरी दुनिया में इस मुक़ाबले का बेसब्री से इंतज़ार किया जा रहा है.
आखिरकार क्या है इसकी ख़ास वजह.
जाने माने खेल विश्लेषक वी कृष्णास्वामी कहते हैं, “आज से 18 साल पहले जब 1995 में न्यूयॉर्क में पीसीए विश्व चैंपियनशिप के लिए गैरी कास्पारोव के साथ मुक़ाबला था तब कहा जा रहा था कि आनंद अभी उभरते सितारे हैं, लेकिन आने वाले समय में विश्व चैंपियन बनेंगे.”
उसके बाद आनंद साल 2000, 2007, 2008, 2010 और 2012 में यानी पांच बार विश्व चैंपियन बने.
अब जब चेन्नई में उनके सामने 22 साल के मैग्नस कार्लसन बैठेंगे तो शायद आनंद को वही वक्त फिर याद आएगा.
<link type="page"><caption> शतरंज के हैरी पॉटर हैं कार्लसन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/sport/2013/11/131108_chess_carlsen_profile_dp.shtml" platform="highweb"/></link>
उत्सुकता बढ़ी
44 साल के आनंद और 22 साल के कार्लसन को लेकर इसीलिए पूरे शतरंज जगत ही नहीं बल्कि समस्त खेल जगत में उत्सुक्ता बढ़ गई है.
इसके अलावा इस मुक़ाबले की तुलना साल 1972 में बॉबी फ़िशर और बोरिस स्पास्की के बीच हुए मुक़ाबले से भी की जा रही है.

कृष्णास्वामी इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, “उस समय रूस और अमरीका के बीच शीतयुद्ध जैसी स्थिति थी. उस समय राजनीतिक मतभेद भी बहुत थे."
आज खेलों के साथ राजनीति, पैसा और पब्लिसिटी के अलावा पूरे विश्व में इस तरह के मुक़ाबले को इसलिए भी विशेष रूप से देखा जा रहा है क्योंकि कास्पारोव के बाद यह दोनों पहली बार इस तरह के खिलाड़ी हैं जिनकी शतरंज की समझ सबसे अलग और विलक्षण है और सबको लुभाती भी है.
इस मुक़ाबले में आनंद अपने खेल की शुरूआत काले मोहरे से करेंगे जिसके फ़ायदे के बारे में कृष्णास्वामी कहते हैं, “अगर पहले गेम में किसी खिलाड़ी के पास काले मोहरे हों और अगर वह ड्रॉ कर ले तो उसे थोड़ा शुरूआती फायदा होता है."
कृष्णास्वामी आगे बताते हैं, "हर खिलाड़ी की यही चाहत होती है कि अगर उसे शुरूआत में फायदा हो तो बाद में उसका अधिक लाभ मिलने की संभावना अधिक रहती है. इसके अलावा जिस खिलाड़ी को पहले काले मोहरे मिलते हैं उसी खिलाड़ी को छठे और सातवें गेम में सफेद मोहरे मिलते हैं और वह खिलाड़ी होंगे आनंद.”
मोहरों का खेल
कृष्णास्वामी आगे कहते हैं, “लगातार दो सफेद मोहरे मिलने से आनंद को आक्रामक रुख अपनाने का मौक़ा मिल जाता है. दूसरी तरफ जिसे शुरूआत में सफेद मोहरों से खेलने का अवसर मिलता है उसे 12वें गेम में फिर सफेद मोहरे से खेलने का अवसर मिलता है और वह मौक़ा होगा कार्लसन के पास.”
अगले तीन हफ्ते में दोनों खिलाड़ी 12 बार एक-दूसरे से टक्कर लेंगे. हर जीत के बाद एक-एक अंक और हर ड्रॉ के लिए आधा-आधा अंक मिलेगा.
आनंद और कार्लसन के बीच जीत की संभावना को लेकर कृष्णास्वामी कहते हैं, “अनुभव के आधार पर आनंद का पलड़ा थोड़ा भारी है, लेकिन दोनो में अंतर केवल 51-49 का है. आनंद के पास 7 विश्व चैंपियशिप खेलने का अनुभव है जबकि कार्लसन के पास यह पहला अवसर आया है.”
कार्लसन की रेटिंग आनंद के मुक़ाबले 80 या 90 अंक ज़्यादा है, लेकिन इस तरह के मुक़ाबलों में अनुभव का भी विशेष महत्व है.
कृष्णास्वामी कहते हैं, “आनंद की शुरूआत बेहद ज़बरदस्त होती है और बाद में वह सोची समझी रणनीति से खेलते हैं. दूसरी तरफ कार्लसन अपनी सोच के अनुसार खेलते हैं, पूर्वानुमान के साथ खेलते हैं. कार्लसन के बारे में कहा जा सकता है कि शतरंज के बोर्ड पर उनकी समझ बेजोड़ है.”
तो 14 करोड़ रुपए की इनामी राशि वाली शतरंज की बिसात बिछ चुकी है, लेकिन कौन होगा चैंपियन यह जानने में अभी थोड़ा वक्त लगेगा.
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