एन श्रीनिवासन: बोर्ड के 'बादशाह'

- Author, आदेश कुमार गुप्त
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई अगर अपनी पूरी ताक़त और क्षमता के बावजूद किसी को कंट्रोल नही कर पा रहा है तो वो हैं ख़ुद उसके अध्यक्ष एन श्रीनिवासन.
रविवार को चेन्नई में हुई बीसीसीआई की सालाना आम बैठक में उन्होंने साबित कर दिया कि शतरंज की बिसात के वे अकेले राजा हैं और बाकी सदस्य महज़ मोहरे.
आईपीएल सिक्स में उनकी अपनी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के टीम प्रिंसिपल और उनके दामाद गुरूनाथ मयप्पन के ख़िलाफ सट्टेबाज़ी और स्पॉट फिक्सिंग के लिए आरोप पत्र दाखिल होने के कारण उनकी योग्यता को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे.
उन्होंने एक तीर से कई शिकार किए हैं. सबसे पहले तो उन्होंने आईपीएल विवाद में अपना और अपने दामाद का नाम सामने आने के बाद मीडिया से एक सोची समझी चुप्पी साधी.
यहां तक कि उनकी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने भी उन दिनों इस मुद्दे से जुडे सवालों के जवाब देने से इनकार कर दिया था.
'डालमिया जैसे हाल का डर'

श्रीनिवासन ने तीसरी बार बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद बीसीसीआई के उन सभी सदस्यों और पदाधिकारियों को पुरस्कार में बड़े-बड़े पद दिए हैं जिन्होंने पिछले दिनों उन पर छाई संकट की घड़ी में उनका साथ दिया था.
इस खेल में सबसे ज़्यादा फायदा हुआ है मुंबई क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रवि सावंत को. बीसीसीआई की बैठक में श्रीनिवासन को अध्यक्ष पद के विरोध में कोई चुनौती दे सकता था तो वह थे पूर्व अध्यक्ष शरद पवार.
रवि सावंत ने मुंबई क्रिकेट संघ के चुनावों को जानबूझकर अक्तूबर के तीसरे हफ्ते तक खिसकाया ताकि शरद पवार श्रीनिवासन के रास्ते का रोड़ा न बन सकें. फिलहाल रवि सावंत को श्रीनिवासन ने उपाध्यक्ष का पद सौंपा है.
अरूण जेटली ने भी श्रीनिवासन के मामले में चुप्पी साधे रखी. दरअसल बीसीसीआई का अध्यक्ष बनने के लिए इस बार दक्षिण क्षेत्र की बारी थी और अगला अध्यक्ष उत्तर क्षेत्र से होगा. अरूण जेटली ने यही सोचकर इस मसले से ख़ुद को दूर रखा कि अभी राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ज़रूरत ज़्यादा है और अगले साल जब उनका अध्यक्ष बनना लगभग तय ही है तो क्यों पचड़े में पड़ा जाए.

तो क्या अब जो बीसीसीआई में हो रहा है वह सही है? बिलकुल नहीं, ऐसा कहते हैं जाने माने क्रिकेट समीक्षक प्रदीप मैगज़ीन.
प्रदीप मैगज़ीन का मानना है कि श्रीनिवासन को लगता है कि अगर वह अभी हट जाते हैं तो कहीं उनका हाल भी जगमोहन डालमिया जैसा न हो. जगमोहन डालमिया भी जब बीसीसीआई के अध्यक्ष थे तब भी ऐसा लगता था कि उन्हें हटाना नामुमकिन है लेकिन जैसे ही वो हटे उनकी ताक़त भी समाप्त हो गई.
'समझौते पर चल रहा बीसीसीआई'
आज सभी जानते हैं कि पूर्व अध्यक्ष शरद पवार भी कितने पावरफुल रह गए हैं. अब श्रीनिवासन ने सोचा समझा जुआ खेला है. अगर उच्चतम न्यायालय उन्हें उनके पद से हटाने का आदेश दे देता है तो उन्हें जाना ही पड़ेगा अन्यथा अगर ऐसी ही स्थिति रहती है तो श्रीनिवासन को लगता है कि वह बच जाएंगे.
प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, "वैसे भी पूरा बोर्ड ही समझौते पर चल रहा है. शरद पवार के वक्त भी बोर्ड ऐसे ही काम करता था जैसे आज कर रहा है.
महत्वपूर्ण पदों की रेवड़ियां पहले भी अपनों को दी जाती थी और अब भी अपनों को बांटी गई है. अब तो यह भी कह सकते हैं कि पूरे मसले में सिर्फ श्रीनिवासन को दोष क्यों दें, हर वह सदस्य जिसने उनका साथ दिया है वह भी उतना ही ज़िम्मेदार है जितने श्रीनिवासन."
एन श्रीनिवासन ने एक तरफ जहां अपने शुभचिंतकों को उनकी और अपनी मनपसंद कुर्सी दी वहीं निरंजन शाह जैसे अनुभवी बोर्ड अधिकारी को किनारे लगा दिया.
प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं, "ऐसा तो होना ही था. जब किसी व्यक्ति की हां में हां हर समय मिलाई जाए और उसका बिलकुल भी विरोध ना किया जाए तो श्रीनिवासन को किसी भी बात से डर कहां लगेगा और वह ऐसा ही करेंगे."
अब रही बात बीसीसीआई की दुनिया में साख की. प्रदीप मैगज़ीन कहते है कि पैसे की ताक़त के कारण आईसीसी भी बीसीसीआई के सामने पानी भरती है.
दक्षिण अफ्रीकी दौरे को लेकर जो अटकलें है वहां आईसीसी को दूसरे देशों के साथ मिलकर बोलना चाहिए था कि बीसीसीआई अपनी जगह ग़लत है. भारत कैसे फ्यूचर टूर प्रोग्राम को मना कर सकता है लेकिन आईसीसी को लगता है कि सारा पैसा तो भारत से आता है तो वह क्यों बोले. पैसे का खेल है, जिसमें सब शामिल है.
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