सात्विक-चिराग़: ऐसे बनी भारतीय बैडमिंटन की गोल्डन जोड़ी

सात्विक-चिराग़ की जोड़ी

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इमेज कैप्शन, सात्विक साइराज रैंकी रेड्डी (बाएं) और चिराग़ शेट्टी (दाएं)
    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

सात्विक साइराज रैंकी रेड्डी और चिराग़ शेट्टी की जोड़ी ने भारतीय बैडमिंटन इतिहास में कुछ ऐसा कर दिखाया है, जिसे हमारी पीढ़ी ने पहली बार होते देखा है.

इस जोड़ी ने एशियाई बैडमिंटन चैंपियनशिप में पुरुष डबल्स का स्वर्ण पदक जीता है. इससे पहले 1965 में इस टूर्नामेंट के सिंगल्स मुकाबलों में दिनेश खन्ना ने गोल्ड जीता था.

पुरुष डबल्स में यह भारतीय बैडमिंटन इतिहास का पहला स्वर्ण पदक है. इससे पहले सिर्फ कांस्य पदक ही भारत आया था. यह पदक भी 51 साल पहले आया था और इसे दीपू घोष और रमन घोष ने 1971 में जीत था.

सात्विक और चिराग़ की जोड़ी ने दुबई में हुई एशियाई बैडमिंटन चैंपियनशिप के पुरुष डबल्स फ़ाइनल में मलयेशियाई जोड़ी ओंग यू सिन और तियो ई यी को 16-21, 21-17, 21-19 से हराया. ख़ास बात यह है कि भारतीय जोड़ी एक समय पहला गेम 16-21 से हारने के बाद दूसरे में 7-13 से पिछड़ी हुई थी. लेकिन संघर्ष क्षमता का प्रदर्शन करते हुए वह इतिहास रचने में सफल रही.

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इस जोड़ी को पंख लगाए हैं कोच मथायस बोए ने

भारतीय बैडमिंटन में डबल्स की बात करें तो यहां इसे बहुत अहमियत नहीं दी जाती थी. कई बार टॉप सिंगल्स खिलाड़ियों की जोड़ी बनाकर उतारी जाती रहीं हैं. लेकिन पिछले एक दशक में इस सोच में बदलाव आया है और डबल्स के लिए अलग कोच को रखने से हालात बदल गए हैं.

टोक्यो ओलंपिक से पहले डेनमार्क के कोच मथायस बोए को भारतीय डबल्स जोड़ियों को तैयार करने के लिए लाया गया. इसका परिणाम भी जल्द दिखने को मिलने लगा. टोक्यो ओलंपिक में भले ही चिराग़ और सात्विक को जोड़ी क्वार्टर फ़ाइनल में स्थान नहीं बना सकी पर अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित करने में सफल रही थी.

असल में मथायस के आने से पहले ही इस जोड़ी ने अपना प्रभाव छोड़ना शुरू कर दिया था. पर डेनिश कोच ने इस जोड़ी को महत्वपूर्ण मौकों पर मानसिक तौर पर किस तरह मजबूत रहा जाए, यह सिखाया. इसका ही परिणाम है कि हमें आज यह चैंपियन जोड़ी मिल गई है.

एशियाई चैंपियनशिप के फाइनल में भारतीय जोड़ी जब पिछड़ गई थी, तो उनका भरोसा बढ़ाने के लिए कोर्ट के बाहर मथायस बोए मौजूद थे. शायद यह उनकी मौजूदगी का ही कमाल था कि वे वापसी करने में सफल हो गए.

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टोक्यो ओलंपिक के बाद दिखा है जलवा

सात्विक और चिराग़ की जोड़ी ने टोक्यो ओलंपिक में जलवा बिखेरने बाद से पीछे मुड़कर नहीं देखा है.

इस जोड़ी ने पिछले साल इंडियन ओपन और फ्रेंच ओपन के खिताब जीते. इसके बाद कॉमनवेल्थ गेम्स में रजत पदक जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन जोड़ी बनी. इस जोड़ी का सफर यहीं नहीं थमा बल्कि विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर अपने झंडे गाड़ दिए.

इस भारतीय जोड़ी का एशियाई चैंपियनशिप में जीता स्वर्ण साल 2023 का दूसरा खिताब है. इससे पहले वह इस साल मार्च में बासेल में स्विस ओपन का खिताब जीत चुके हैं. इस सफलता को पाने के बाद चिराग़ ने कहा, "पहली बार इस टूर्नामेंट को जीतकर अच्छा लग रहा है. मुझे भविष्य में इस तरह के और खिताब जीतने का यकीन है." वहीं उनके जोड़ीदार सात्विक ने कहा, "मैं सातवें आसमान पर हूं. इस पदक के लिए हमने काफी मेहनत की थी."

भारतीय जोड़ी को यह ऐसी सफलता मिली है, जिस पर आसानी से भरोसा होना संभव नहीं था. यही वजह है कि स्वर्ण पदक जीतने के बाद सात्विक की प्रतिक्रिया थी कि 'हम एशियाई चैंपियन बन गए हैं, हमें इसका भरोसा नहीं हो रहा है. मुझे तो थामस कप चैंपियन बनने तक का अभी तक भरोसा नहीं हुआ है. इस सफलता से हमें ओलंपिक के लिए क्वालिफाइंग करने में मदद मिलेगी.'

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जोड़ी बनने की दिलचस्प कहानी

भारत में डबल्स का भविष्य अच्छा नहीं देखकर सात्विक साइराज और चिराग़ शेट्टी ने भी सिंगल्स में अपना कॅरियर बनाने की शुरुआत की. यह भी अजब संयोग ही है कि दोनों के कोचों ने एक ही राय दी. असल में सात्विक से हैदराबाद में पुलेला गोपीचंद और चिराग़ से मुंबई में उदय पवार ने कहा कि वह दोनों यदि जोड़ी बनाकर डबल्स में खेलें तो कहीं बेहतर परिणाम मिल सकते हैं.

पुलेला गोपीचंद और उदय पवार ने जोड़ी बनाने की राय इसलिए दी, क्योंकि आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में पीटी टीचर के घर पैदा हुए सात्विक में कोर्ट में पीछे से जबर्दस्त स्मैश लगाने की क्षमता है. वह स्मैश की गति बदलकर सामने वाले खिलाड़ी को ग़लती करने के लिए मजबूर करने की क्षमता भी रखते हैं. वहीं चिराग़ लंबे क़द के हैं और उनका डिफेंस बेहद मजबूत है और ऊंचे क़द के कारण नेट पर अच्छा खेलते हैं. इससे लगता था कि दोनों मिलकर एक ताक़त बन सकते हैं.

सात्विक और चिराग़ दोनों ने अपने कोचों की अपने बारे में राय को मानकर जोड़ी बनाने का फ़ैसला कर लिया और इसका परिणाम आज सभी के सामने है. टेनिस में जिस तरह डबल्स की तुलना में सिंगल्स खेलने के लिए ज़्यादा दमखम की ज़रूरत होती है, उसके ठीक उलट बैडमिंटन में सिंगल्स की तुलना में डबल्स में खेलने में ज़्यादा दमखम की ज़रूरत पड़ती है. इस वजह से इस स्पर्धा में अब तक चीन, दक्षिण कोरिया और डेनमार्क की जोड़ियों का दबदबा रहा है. लेकिन अब इसमें भारत का भी नाम शुमार हो गया है.

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शुरुआत में जमी नहीं जोड़ी

सात्विक और चिराग़ दोनों ही बिल्कुल अलग पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हैं. इसलिए शुरू में दोनों को आपस में संबंध बनाने में मुश्किल हुई. इसकी वजह थी कि सात्विक ज़्यादातर तेलुगू बोलते थे और उन्हें हिंदी कम आती थी और चिराग़ तेलुगू जानते नहीं थे. इस कारण दोनों बेहतर तालमेल नहीं बना पाने पर पहले तीन टूर्नामेंटों में जल्दी बाहर हो गए. इस पर कोचों ने उन्हें अलग होने का विकल्प भी दिया. पर दोनों ने जोड़ी में खेलते रहने का फ़ैसला किया.

मुंबई में जन्मे चिराग़ के पिता चंद्रशेखर शुरू से ही चाहते थे कि उनका बेटा अपना करियर खेलों में बनाए. साथ ही वह चाहते थे कि बेटा व्यक्तिगत खेल को अपनाए, क्योंकि कई बार टीमों में पक्षपात हो जाता है. पर शुरुआत में सिंगल्स में खेलने के बाद वह पिता की राय के ख़िलाफ़ डबल्स में आ गए. वह रेयान इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ने के दिनों में स्कूल में चैंपियन थे.

स्कूली दिनों में ही वह उदय पवार अकादमी में शामिल हो गए और शुरुआती बारीकियां यहीं सीखीं. बाद में वह हैदराबाद गोपीचंद अकादमी में चले गए. वह पढ़ाई में भी बहुत तेज़ थे और उन्हें मिनी गूगल कहा जाता है, इसकी वजह याददाश्त का बहुत तेज़ होना है.

सात्विक के पिता विश्वनाथम शुरू से ही चाहते थे कि उनका बेटा इंडिया की जर्सी पहने. शुरुआत में में सात्विक क्रिकेट खेलते थे और तेज़ गेंदबाजी करते थे. बाद में वह बास्केटबाल और एथलेटिक्स भी खेले. पर करियर चुनने के समय उन्होंने बैडमिंटन को अपनाया. पिता उन्हें 2013 में हैदराबाद गोपीचंद अकादमी में ले गए और यहीं उनके खेल को सही शेप मिली.

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