एशियन गेम्स 2018: पंघाल की इस तकनीक के सामने चित्त हुआ ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"जकार्ता जाने से पहले अमित ने वादा किया था....'पापा जी, चिंता मत करना, अबकी बार देश के लिए गोल्ड लेकर आऊंगा. और उसने अपना वादा निभाया है. देश के लिए गोल्ड लेकर आया है."
ज़िंदगी में जीत हार लगी रहती है, लेकिन तूफ़ानों से जूझकर जब समंदर पार किया जाता है तो ख़ुशी आंखों और आवाज़ में दिखने लगती है.
22 साल के अमित पांघल के परिवार वालों, ख़ासकर उनके पिता विजेंदर पांघल की आवाज़ में कुछ ऐसी ही ख़ुशी नज़र आती है.
वो अपने बेटे के बारे में बोलते हुए भावुक हो जाते हैं.
विजेंदर पांघल कहते हैं, "मेरे घर में दो-दो खिलाड़ी हुए. मेरा बड़ा बेटा भी बॉक्सर है, लेकिन मैं आर्थिक तंगी के चलते अपने दोनों बेटों को एकसाथ स्पोर्ट्स में नहीं भेज सका. किसी तरह कुछ करके अमित को आगे बढ़ाया और आज उसने देश का नाम ऊंचा किया."
एशियन गेम्स में लिया 'बदला'
एशियाई खेलों में बॉक्सिंग की 49 किलोग्राम भार वर्ग की श्रेणी में अमित का मुक़ाबला उज्बेकिस्तान के ज़बर्दस्त बॉक्सर हसनबॉय दस्तमास्तोव से था, जिन्होंने साल 2016 के रियो ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता था.

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लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं था जब 22 साल के अमित 25 साल के ओलंपिक गोल्ड विनर हसनबॉय दस्तमास्तोव के आमने-सामने थे.
इससे पहले हसनबॉय और अमित के बीच 2017 के एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप, में ज़ोरदार मुक़ाबला हुआ था, जिसमें हसनबॉय ने क्वॉर्टर फ़ाइनल राउंड में ही अमित को हरा दिया था.
लेकिन इसके बाद अमित ने शानदार वापसी करते हुए स्ट्रेद्जा कप में गोल्ड मेडल और 2018 के कॉमनवेल्थ खेलों में सिल्वर मेडल जीता.

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इन सबका बदला अमित ने एशियाई खेल 2018 में लिया. अमित ने शानदार बॉक्सिंग दिखाते हुए हसनबॉय दस्तमास्तोव को पराजित कर दिया.
आख़िर कैसे मारा जीत का पंच?
अमित के बॉक्सिंग कोच सैंटियागो नीव बताते हैं, "मैच से पहले अमित ने मुझसे कहा कि वो अपनी तकनीक और ध्यान केंद्रित करके खेलेगा. उसे अपने तीन घातक हथियारों का इस्तेमाल करना था जो कि तेज फुट वर्क और तेजी से उछलते हुए सीधे पंच मारना था." रिंग में उतरने से पहले उसने मुझसे कहा था कि वह अपने पैरों का तेजी से इस्तेमाल करेगा. अपने दाएं और बाएं जंप करते हुए स्कोर करूंगा और इसके बाद अपने बाएं ओर से शॉट लूंगा. मैंने उससे कहा कि खुद को बचाने के लिए अपने तेज फुटवर्क का भी इस्तेमाल करना और मजबूती से पंच को ब्लॉक करना."
उज्बेक बॉक्सर को हराना आसान नहीं था क्योंकि पिछली बार हसनबॉय ने ही अमित को मात दी थी.

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सैंटियागो बताते हैं, "हमने काफ़ी समय उज्बेक बॉक्सर हसनबॉय के खेलने की तकनीक का अध्ययन किया कि वह किस तरह पंच मारते हैं और अपने विपक्षी को चौंकाते हैं. इसके बाद एक रणनीति तैयार की जिसे अमित ने रिंग में उतरकर बखूबी अंजाम दिया. रिंग में उतरने से पहले उसने मुझसे कहा था कि वह अपने पैरों का तेजी से इस्तेमाल करेगा. अपने दाएं और बाएं जंप करते हुए स्कोर करेगा और इसके बाद अपने बाएं ओर से शॉट लेगा. इसके साथ ही मैंने उसे बताया कि खुद को बचाने के लिए अपने तेज फुटवर्क का भी इस्तेमाल करना और मजबूती से पंच को ब्लॉक करना होगा."
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तिरंगा ऊपर उठता रहा, आंसू बहते रहे
जीत के बाद वो लम्हा भी आया, जब गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी के देश का झंडा ऊंचा किया जाता है. अमित ने जब ये देखा तो वो भावुक हो गए.
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में अमित का भावुक चेहरा नज़र आ रहा है. इसमें वो राष्ट्र ध्वज ऊपर उठता हुआ देखकर ख़ुद को संभाल नहीं पाए.
आंखों से गिरते आंसू को वो अपने हाथ से पोंछते हैं, लेकिन उनकी निगाह भारतीय झंडे से नहीं हटी. गोल्ड मेडल पहनते समय वो मुस्कुराकर शुक्रिया अदा करते हैं.

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भावुकता के पीछे छुपे दर्द की दास्तां
भारतीय सेना में नायब सूबेदार के पद पर तैनात अमित पांघल के लिए ये बेहद ख़ास लम्हा था.
खुद के भावुक होने के बारे में अमित बीबीसी को बताते हैं, "बचपन से देख रहा हूं कि खिलाड़ी गोल्ड मेडल जीतता है तो उसके देश का झंडा ऊपर किया जाता है. आज मेरे साथ हुआ तो अचानक आंखों में आंसू आ गए. पता नहीं क्या हुआ उस वक़्त. बस आंसू गिरते रहे."
अमित उस परिवार से आते हैं जहां उनके भाई अजय भी बॉक्सर थे, लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से उनके भाई ने अपने सपने त्यागकर भाई को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया.

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भारतीय सेना में नौकरी कर रहे अजय पंघाल ने बीबीसी को बताया, "अमित बचपन से बहुत शैतान था. हर रोज़ कहीं न कहीं से इसकी शिकायतें आती थीं. तो मैंने दस साल की उम्र से ही इसको अपने साथ बॉक्सिंग अकादमी में ले जाना शुरू किया. हम आर्थिक रूप से इतने सबल नहीं थे कि घर के दो-दो बच्चे बॉक्सिंग अकादमी में जाएं. मैंने अपने सपने त्याग भाई को आगे बढ़ाया, 2011 में आर्मी ज्वॉइन की और आज उसने मेरे फ़ैसले को सही साबित कर दिया."
अमित की ट्रेनिंग के दौरान सामने आई मुसीबतों को याद करते हुए अजय कहते हैं कि एक समय तो ऐसा आया जब नेशनल एकेडमी में भेजने के लिए हमारे पास टिकट के पैसे भी नहीं थे.
अजय बताते हैं, "जब कहीं से पैसों का जुगाड़ नहीं हो रहा था तो गांव वालों से, भाइयों से मदद ली कि किसी तरह अमित अपनी तैयारी जारी रख सके. आज वो सारी मेहनत सफल हो गई."
दस साल की उम्र से अमित को ट्रेनिंग देने वाले उनके कोच अनिल धनकड़ भी अमित की जीत से ख़ुश हैं और मानते हैं कि उन्होंने जो सपना देखा था वो अमित ने आज पूरा कर दिया.

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अनिल बीबीसी को बताते हैं, "एकेडमी का मक़सद यही था कि गांव की प्रतिभा उभरकर सामने आए और दुनिया में नाम कमाए. अब देखिए अमित ने ये कर दिखाया, इससे पूरे देश के बच्चों पर असर पड़ेगा और उनका मनोबल बढ़ेगा. ये जीत आने वाले खिलाड़ियों के लिए काफ़ी अहम होगी."
जीत पर मां से क्या बोले अमित
जकार्ता में गोल्ड मेडल जीतने के बाद अमित अब अपनी मां से मिलना चाहते हैं. वहीं, उनकी मां समेत पूरे गांव को उनके वापस लौटने का इंतज़ार है.
अमित की मां ऊषा रानी कहती हैं, "मेरे बेटे ने मेडल जीतकर मेरी तपस्या सफ़ल कर दी. जीत के बाद उसने मुझसे फ़ोन पर बात की और पूछा - 'मां, अब तो ख़ुश हो न'...तो मैंने जवाब दिया...'हां, बेटे तुमने देश, समाज और गाम (गांव) का नाम रोशन कर दिया', अब मुझे बस उसके आने का इंतज़ार है."

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अमित पंघाल ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मैं आपके मार्फ़त अपनी मां से ये कहना चाहूंगा कि हर बार वह खीर और चूरमा बनाती हैं. इस बार भी खीर और चूरमा तैयार करके रखें. मैं आ रहा हूं. मैंने उनसे कहा था कि कॉमनवेल्थ में जीते सिल्वर मेडल का रंग बदलकर लाऊंगा और अब गोल्ड मिल गया."
अमित के लिए ये जीत ख़ास थी, क्योंकि एशिया बॉक्सिंग के क्षेत्र में हब माना जाता है. ऐसे में उनके परिवार और कोच को ओलंपिक में गोल्ड मेडल आने की उम्मीद पैदा हो गई है.
अब ओलंपिक में अमित पंघाल किस मुकाम तक पहुंचेंगे ये तो वक़्त ही बताएगा.

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