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कॉमनवेल्थ खेल: 'दादाजी ने कहा, शॉर्ट्स पहन और हॉकी उठा'
- Author, सूर्यांशी पाण्डेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बचपन में दादाजी ने जो हौसला दिया उसके साथ हरियाणा की इस खिलाड़ी ने अपने गाँव जोधकन से ऐसी उड़ान भरी कि आज वो भारतीय महिला हॉकी टीम में बतौर गोलकीपर उसकी मज़बूत कड़ी बन गई हैं.
सविता पुनिया 4 अप्रैल से ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में शुरू हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिला हॉकी टीम में बेहद अहम भूमिका में रहेंगी.
और रहे भी क्यों ना, आख़िर 2017 में हुए एशिया कप के फ़ाइनल मुक़ाबले में चीन की दीवार को गिराने में सबसे अहम योगदान सविता पूनिया का ही रहा था.
उनके बेहतरीन प्रदर्शन के बदौलत पेनल्टी शूटऑउट में भारत चीन को 5-4 से हरा पाया था. इसके साथ न सिर्फ़ भारतीय महिला हॉकी टीम ने 2017 में 13 साल बाद एशिया कप जीता बल्कि 2018 के विश्व कप के लिए भी क्वालिफ़ाई किया.
इस जीत ने सविता पूनिया को एक अलग पहचान दी. लेकिन पूनिया की शख़्सियत को समझने के लिए हरियाणा में उनके गांव का रुख़ करना पड़ेगा.
'ऐसे दादाजी भगवान सबको दें'
सविता पुनिया हरियाणा के सिरसा ज़िले के गाँव जोधकन से हैं. सविता बचपन में किसी आम लड़की की ही तरह थीं. लेकिन उनके दादा, महेंद्र सिंह अपने दौर से आगे की सोच रखने वाले व्यक्ति थे.
सविता पूनिया ने बीबीसी को बताया कि खेलों में उनकी कोई रुचि नहीं थी. "ये पिता और दादाजी की सोच और नज़रिये का नतीजा है कि मैं आज अपने गाँव से बाहर निकलकर हॉकी स्टिक हाथ में पकड़ पाई".
इसका सबसे ज़्यादा श्रेय वो अपने दादाजी महेंद्र सिंह को देती हैं. बचपन से ही सविता के दादाजी ने उन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं लगाई. पोती का खेल की तरफ रुझान बढ़े वो इसी कोशिश में लगे रहते.
सविता बताती हैं कि उनके दादाजी को क्रिकेट बिल्कुल पसंद नहीं था. उन्होंने दिल्ली में एक बार कुछ पुरुष खिलाड़ियों को हॉकी खेलते देखा और तबसे उनके भीतर अपनी पोती को हॉकी खिलाड़ी बनाने का जुनून सवार हो गया.
उस दौर में जब हरियाणा के समाज में बेटियों को पढ़ाना ही एक बड़ी चुनौती की तरह था, वहां महेंद्र सिंह बड़ा सपना देखने लगे थे. वो खुद कभी स्कूल नहीं गए और उम्र के एक ऐसे पड़ाव पर थे जहां लोगों को पिछड़ी सोच का माना जाता है.
समाज में आने वाली पीढ़ी के सपनों को बड़ों की उपेक्षा का प्रारूप माना जाता है. लेकिन ये जानकर कोई भी हैरान रह जाएगा कि महेंद्र सिंह एक बार सविता पूनिया की मां से सिर्फ़ इस वजह से लड़ पड़े थे क्योंकि सविता की मां ने हॉकी खेलते वक़्त चुन्नी लेने को कहा.
2013 में सविता पूनिया के दादाजी का देहांत हो गया था.
कब पकड़ी हाथ में हॉकी
2004 में सविता पूनिया ने अपने दादाजी के लक्ष्य को अपना लक्ष्य बना लिया और हॉकी स्टिक हमेशा के लिए अपने हाथ में थाम ली.
मां की तबीयत ठीक नहीं रहती थी लेकिन किसी भी तरह की बाधा को सविता के दादाजी ने उनके कैरियर के आगे आने नहीं दिया. उन्होंने अपनी पोती का दाखिला हिसार स्थित साई (स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की एकेडमी में करवाया.
फिर सविता के कोच सुंदर सिंह ने उनके कद को देखते हुए उन्हें गोलकीपर बनाने का सुझाव दिया. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
सविता को है नौकरी का इंतज़ार
सविता पूनिया और उनके परिवार को अब आस है तो भारतीय हॉकी फेडरेशन से क्योंकि 10 साल तक भारत के लिए खेलने के बावजूद अब तक सविता को नौकरी नहीं मिली है.
सविता के मुताबिक़ 2017 के एशिया कप के प्रदर्शन के बाद उन्हें उम्मीद है कि उनकी नौकरी की गुहार सरकार सुनेगी और फेडरेशन इस दिशा में कुछ क़दम उठाएगी.