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18 साल से जीतने वालों को तमिलनाडु की लड़कियों ने हरा दिया
- Author, प्रमिला कृष्णन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तमिल सेवा
भारत में खेल की दुनिया में सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है चेन्नई की रहने वाली 22 साल की फुटबॉल खिलाड़ी नंदिनी मुनुसामी ने.
वो उस महिला फुटबॉल टीम का नेतृत्व करती हैं जिसने हाल में आयोजित राष्ट्रीय सीनियर चैंपियनशिप में ताकतवर मानी जाने वाली मणिपुर की महिला फुटबॉल टीम को हराकर ट्रॉफ़ी पर कब्ज़ा कर लिया है.
हारने वाली मणिपुर की टीम में कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं. भारत के उत्तरपूर्वी राज्य की ये टीम बीते 18 सालों से लगातार राष्ट्रीय चैंपियनशिप की ट्रॉफ़ी पर कब्ज़ा करती आई है.
लेकिन इस साल इस टीम को तमिलनाडु के कारण हार का सामना करना पड़ा. और तमिलनाडु की टीम की कप्तान थीं नंदिनी जिन्होंने मणिपुर के रिकॉर्ड को आख़िर तोड़ ही दिया.
'टीचर्स ने कहा था फुटबॉल खेलो'
बीते 23 साल से जीत के लिए जी-जान से मेहनत करते इस प्रदेश के लिए महिला फुटबॉल टीम की ये जीत एक बड़ी उपलब्धि है. बीते पचास साल से प्रदेश की अपनी पुरुष फुटबॉल टीम भी है लेकिन ये टीम अब तक संतोष ट्रॉफ़ी तक नहीं जीत पाई है.
नंदिनी ने अपने खेल की शुरुआत तब की थी जब वो आठवीं कक्षा में थीं. उस वक्त वो एक एथलीट के तौर पर खेलती थीं. नंदिनी को खेल की शिक्षा देने वाले टीचर रजनी और जयकुमार ने उन्हें कहा कि वो एथलेटिक्स की बजाय फुटबॉल खेलें तो आसानी से जीत सकती हैं. इसके बाद नंदिनी ने फुटबॉल की तरफ ध्यान देना शुरु किया.
अपने स्कूली दिनों के बारे में नंदिनी कहती हैं, "मैं बहुत सारे ईनाम और सर्टिफिकेट जीतना चाहती थी और इसीलिए मैं स्पोर्ट्स टीम का हिस्सा बन गई. लेकिन मेरे टीचर्स ने मुझे कहा कि मैं बेहतर फुटबॉलर बन सकती हूं. मैंने काफी प्रैक्टिस की और जैसा मेरे टीचर्स ने चाहा था मैंने इंटरस्कूल मैचों में जीत हासिल की."
जब नंदिनी दसवीं कक्षा में थी, तब उन्हें राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए चुना गया था. उन्हें साल होने वाले जूनीयर फुटबॉल चैंपियनशिप में भारत का प्रतनिधित्व करने का मौक़ा मिला.
परिवार से मिला पूरा सपोर्ट
नंदिनी कहती हैं कि उनका मां की इच्छा है कि वो अपने स्पोर्ट्स कैरियर पर ध्यान दें.
वो कहती हैं, "मैं एक छोटे मध्यवर्ग के परिवार से हूं. मेरे पिता कार ड्राइवर के तौर पर काम करते थे. बीते साल उनकी मौत हो गई. पहले मेरी मां चित्रा घर संभालती थीं लेकिन अब तो को घर चलाने के लिए दर्जी का काम करती हैं. मेरी बहन की शादी हो चुकी है और मेरी मां केवल मेरे लिए ही काम कर रही हैं."
हालांकि नंदिनी के परिवार के लिए गुज़ारा करना इतना आसान नहीं लेकिन इसका दवाब कभी भी नंदिनी पर नहीं पड़ा. परिवार देख रहा था कि नंदिनी खेलों में बेहतर है और स्कूल स्तर पर खेलने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही हैं. परिवार से किसी ने नंदिनी को नौकरी करने के लिए नहीं कहा.
नंदिनी कहती हैं, "जब मैंने फ़ैसला किया कि मैं अपने खेल पर और ध्यान देने के लिए सरकारी स्पोर्ट्स हॉस्टल में रहने जाऊंगी तो मेरे माता-पिता इसके लिए तुरंत मान गए."
नंदिनी की 70 साल की दादी कृष्णवेणी स्थानीय अख़बारों में नंदिनी की तस्वीरें देख कर खुश होती हैं. वो पूरी टीम के लिए मिठाइयां लेकर आती हैं.
नंदनी गर्व से कहती हैं, "मेरी दादी को खेलों की दुनिया के बारे में कुछ भी नहीं पता. लेकिन वो हम बार मेरी जीत के लिए प्रार्थना करती हैं. वो मुझे कहा करती थीं कि मुझे गरीब परिवार की लड़कियों के लिए एक मिसाल बनना है. और हां अब मैं उस जगह पर हूं."
नंदिनी फिलहाल चिदंबरम अन्नामलाई विश्वविद्यालय में शारीरिक शिक्षा में डिप्लोमा की पढ़ाई कर रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि उनसे प्रेरणा लेकर कई और माता-पिता अपनी लड़कियों को फुटबॉल खेलने भेजेंगे.
टीम को एकजुट बनाए रखा
नंदिनी के प्रशिक्षकों का कहना है कि नंदिनी साहसी है और वो हमेशा यह सुनिश्चित करती हैं टीम के सभी सदस्य एकमत रहें और एक टीम बन कर खेलें.
तमिलनाडु की कप्तान नंदिनी को सेमी-फाइनल में टीम का उत्साह बनाए रखने और मैच जीतने के लिए बेस्ट प्लेयर ऑफ़ द मैच का पुरस्कर भी दिया गया.
नंदिनी कहती हैं, "हमारे ट्रेनर्स ने हमें उत्साहित किया था और बार-बार कहा था कि हमें ताकतवर मणिपुर की टीम से किसी भी सूरत में डरना नहीं है. हमने मणिपुर की टीम के खेल के तरीके को भी सीखा और हमने उन्हें गोल नहीं करने दिए. हमने उन्हें फाइनल में 2-1 से हराया."
अपनी जीत के बारे में नंदिनी कहती हैं, "हमारी टीम की अधिकतर लड़कियां गांव से हैं जिन्होंने स्कूलों और क्लबों में खेला है. इस साल हम सभी तमिलनाडु राज्य की पहचान बन कर सामने आई हैं. हमने फ़ैसला किया कि हम हर किसी की कुशलता का इस्तेमाल टीम की बेहतरी के लिए करेंगे. इसी कारण हमें जीत मिल सकी."
पुरुषों के साथ खेलकर सीखा जीतना
टीम की एक अन्य खिलाड़ी इंदुमती ने मणिपुर के ख़िलाफ़ खेले गए फाइनल मैच में गोल दाग़ कर टीम को निर्णायक जीत दिलाई. इंदुमति चेन्नई शहर में बतौर सब-इंस्पेक्टर काम करती हैं. उन्होंने अपने काम से छुट्टी लेकर मैच के लिए प्रैक्टिस की.
वो कहती हैं, "हमने पूरे आत्मविश्वास के साथ खेला. हमने मणिपुर को गोल करने का मौक़ा नहीं दिया और इस कारण टीम लड़खड़ाने लगी. हमें दोगुनी खुशी है- पहली चैंपियनशिप जीतने की और दूसरी मणिपुर के सालों के रिकॉर्ड को तोड़ने की."
टीम की जीत और उसके प्रदर्शन के बारे में प्रशिक्षक मुरुगवेन्दन कहते हैं, "मैं टीम के चुनाव की प्रक्रिया का भी हिस्सा रहा था. एक बार सिलेक्शन ख़त्म हो गया तो मुझे टीम की जीत की पूरी उम्मीद थी. मैं बीते दस सालों से टीम के हर सदस्य के प्रदर्शन पर नज़र रख रहा था. मैंने विश्वविद्यालय स्तर के मैचों के समय से उनके प्रशिक्षण और प्रदर्शन को देखा है."
वो कहते हैं, "ट्रेनिंग के दौरान हमने इस महिला की टीम के मैच पुरुष फुटबॉल टीम और वरिष्ठ खिलाड़ियों के साथ भी आयोजित करवाए."