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मैच से पहले नाना से क्या ख़ास शगुन लेते हैं अनुकूल?
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, समस्तीपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
अंडर-19 विश्व कप में भारतीय टीम को चैंपियन बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले अनुकूल राय के गांव भिरहा में भारतीय टीम की जीत का जश्न बैंड-बाजे के साथ मनाया गया.
बिहार के समस्तीपुर ज़िले के इस गांव में होली से क़रीब एक महीने पहले ही लोगों ने एक-दूसरे को अबीर लगाकर खुशी जताई. अब अनुकूल के घर और गांव वालों को उनके लौटने का इंतज़ार है.
गांव में मौजूद इस हरफनमौला खिलाड़ी की मां रंजू राय अपने बेटे का मुंह मीठा कराने के लिए दिन गिन रही हैं. वे बताती हैं, ''फ़िटनेस को ध्यान में रखते हुए छन्नू (अनुकूल के घर का नाम) अब मिठाई खाने से मना करता है, लेकिन फिर भी उसे अपने हाथों से एक मिटाई तो खिलाऊंगी ही.''
मां ने नहीं देखा मैच
इसके साथ ही रंजू उन्हें अपने हाथ का बना चिकेन-करी भी खिलाने के इंतज़ार में हैं जोकि चर्चा में बने हुए इस भारतीय खिलाड़ी की पसंदीदा डिश में से एक है.
रंजू अनुकूल के बचपन को याद करते हुए कहती हैं, ''वह घर में बैंटिंग-बॉलिंग करना शुरु कर देता था. ऐसे में मैं उसे डांटती थी, लेकिन वह नहीं मानता था. आज घर का सामान तोड़ना सार्थक हो गया.''
रंजू पहले न तो क्रिकेट समझती थीं और न ही यह खेल देखती थीं, लेकिन अपने बेटे के कारण उन्होंने क्रिकेट देखना-समझना शुरू किया है.
हालांकि जब अनुकूल मैदान पर होते हैं तो वह पूरा मैच नहीं देखतीं. विश्व कप फ़ाइनल वाले दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया. हां, वह बीच-बीच में मैच का अपडेट जरूर लेती रहीं.
पढ़ाई न करने पर पड़ती थी डांट
अनुकूल की चचेरी बहन सुमति की शादी के बहाने उनका पूरा परिवार अभी गांव में जुटा है. सुमति ने बीबीसी से कहा, ''हमारे और पूरे इंडिया के लिए कल का दिन बहुत बड़ा था. हमारा भाई विश्व कप लाया इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है. मैं अपनी शादी और इस जीत दोनों का आनंद ले रही हूं.''
अनुकूल के दादा रामविलास राय अस्सी साल की उम्र में भी सक्रिय हैं और अपने परिवार की धुरी हैं. एक ज़माने में भाजपा के सक्रिय नेता और गिल्ली डंडा खेलने के शौक़ीन रहे रामविलास राय को इस बात का फ़क्र है कि उनका पोता आज क्रिकेट में धूम मचा रहा है.
अनुकूल के बचपन को याद करते हुए वे कहते हैं, ''बचपन में मैंने उसे जब पढ़ाई में कम ध्यान देने के लिए टोका तो उसने साफ़ कहा था कि मैं खेल में कुछ करूंगा दादाजी. तब उसकी लगन देख कर मैं चुप हो गया. वह छह-सात साल की उम्र से बैट पकड़कर घर से निकल जाता था.''
नाना का शगुन
क्रिकेट करियर के लिए घर से बाहर कदम बढ़ाने में उनकी बहन स्मृति शांडिल्य ने भी अनुकूल की मदद की. उन्होंने बताया, ''क़रीब दस साल की उम्र से उसने बाहर के शहरों में जाकर खेलना शुरू कर दिया था. इन सब चीज़ों के लिए हमने मम्मी-पापा को यह कहते हुए मनाया कि अनुकूल में कॉन्फ़िडेंस है, वो अकेले भी जाकर अच्छे से सब कर लेगा.''
स्मृति ने अनुकूल के बारे में ये खास बात भी बताई, ''वो जब भी बाहर खेलने जाता है तो अपने नाना से शगुन लेकर जाता है. वह नाना से यह कहते हुए शगुन में ग्यारह या इक्कीस रुपये लेता है कि आप मुझे ये देते हैं तो मैं जीत कर आता हूं. अंडर-19 में चुने जाने के बाद जब वह कुछ दिनों के लिए घर आया था तब भी उसने नाना से शगुन लिया था.''
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