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वो पारी, जिसने सहवाग को 'सुल्तान' बना दिया...
ये 28 मार्च, 2004 का दिन था. भारत-पाकिस्तान के बीच तीन टेस्ट मैचों की सिरीज़ का पहला टेस्ट मुल्तान में शुरू हो रहा था.
वैसे तो भारत-पाकिस्तान के क्रिकेट मुक़ाबलों का अपना रोमांच होता है, लेकिन मुल्तान की उमस, धूल भरी गर्मी और सपाट विकेट के चलते मैदान में गिनती के दर्शक थे.
इस मैच को कवर कर चुके पाकिस्तानी पत्रकार उस्मान सैमुद्दीन ने लिखा था, "15 लाख की आबादी वाले इस शहर में भारत-पाकिस्तान का टेस्ट देखने के लिए पांच हज़ार लोग नहीं हैं तो टेस्ट को केवल इंजमाम का तिहरा शतक या पांचवें दिन तक चला रोमांचक मुक़ाबला ही बचा सकता है."
सैमुद्दीन के लिखे को भारतीय क्रिकेट के ओपनर वीरेंद्र सहवाग ने नहीं ही पढ़ा होगा. वे अपने ही अंदाज़ में भारतीय पारी की शुरुआत करने पहुंचे. सपाट विकेट पर उनके बल्ले से रन आने लगे थे, लेकिन लंच से ठीक मोहम्मद समी के हाथों उनका कैच छूट गया.
लंच के बाद सहवाग ने अपना शतक पूरा किया. 104 गेंदों पर चार छक्के और 14 चौकों की मदद से. शोएब अख़्तर की गेंद पर ज़ोरदार छक्के की बदौलत सहवाग ने अपना सैकड़ा पूरा किया था.
उसके बाद उन्होंने बाउंड्री की मानो बरसात कर दी. सहवाग तेजी से 190 के पार पहुंच गए थे. महज एक टेस्ट पहले सहवाग मेलबर्न में 195 रन बनाकर आउट हो गए थे, वो भी छक्का लगाने की कोशिश में.
इस बार उनके साथ जोड़ीदार थे सचिन तेंदुलकर. उनके साथ इस पारी के अनुभव पर सहवाग कई इंटरव्यू में ये कह चुके हैं, "मेलबर्न में 195 रन बनाकर मैं आउट हो गया था. दोहरा शतक नहीं बना था. लिहाजा तेंडुलकर ने मुझसे कहा कि आराम से खेलो, छक्का लगाने की कोशिश की तो तुम्हें बल्ले से पीटूंगा."
ऐसे रचा था इतिहास
1992 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में जिस बल्लेबाज़ को टीवी पर खेलते देख सहवाग क्रिकेट खेलने लगे थे, उसकी ऐसी डांट बड़ी कामयाबी से कम नहीं थी, लिहाजा सहवाग एकदम लिहाज करके खेलने लगे और अपना दूसरा शतक दो रन के साथ पूरा किया.
टेस्ट क्रिकेट में ये सहवाग का पहला दोहरा शतक था. 20 टेस्ट पुराने और पांच शतक जमा चुके सहवाग का पहला दोहरा शतक.
अगले दिन 29 मार्च को सहवाग की रफ्तार थमी नहीं. सहवाग के सामने दूसरे छोर पर सचिन तेंदुलकर सहयोगी बल्लेबाज़ की तरह नजर आने लगे. सचिन तेंदुलकर ने अपना शतक पूरा किया तब तक सहवाग 274 रन तक पहुंच गए.
इसके बाद लगातार तीन चौकों की मदद से सहवाग, वीवीएस लक्ष्मण के 281 रनों के पार पहुंच गए. सहवाग के क़दम अब वहां थे जहां से वे क्रिकेट की इतिहास में तिहरा शतक बनाने वाले पहले भारतीय बनने वाले थे.
लेकिन जोख़िम उठाने का उनका हौसला यहां भी बना रहा और 295 रनों पर उन्होंने पाकिस्तानी स्पिनर सकलैन मुश्ताक की गेंद को लाँग ऑफ़ पर छक्के के लिए बाहर भेजकर इतिहास रच दिया.
सचिन उस वक्त भी विकेट पर मौजूद थे क्या उन्होंने सहवाग को जोख़िम लेने से नहीं रोका. इस बारे में सहवाग कई बार ये बात ज़ाहिर कर चुके हैं, "वे मुझे कुछ कहते, उससे पहले ही मैंने उनसे कह दिया कि अगर मुश्ताक गेंदबाज़ी करने आए तो मैं छक्का लगाकर तिहरा शतक पूरा करूंगा."
छक्के की मदद से तिहरा शतक पूरा करने का करिश्मा सहवाग ने ही सबसे पहले दिखाया था.
25 साल की उम्र में सहवाग ने वो कारनामा कर दिखाया था, जो उस वक्त तक 72 साल के भारतीय टेस्ट इतिहास में नहीं हो पाया था. सहवाग के करियर में ये वो मुकाम था जहां उन्होंने ये साबित कर दिया कि वे क्रिकेट की दुनिया में कुछ ऐसा करने आए हैं, जो केवल उनके ही बस में है.
वे भारत की ओर से टेस्ट मैचों में दो तिहरा शतक लगाने वाले इकलौते बल्लेबाज़ हैं. ये कारनामा केवल डॉन ब्रैडमैन, ब्रायन लारा और क्रिस गेल ही कर पाए हैं.
इतना ही नहीं सहवाग टेस्ट में 293 रनों की पारी भी खेल चुके हैं. भारत की ओर से सहवाग ने टेस्ट मैचों में छह दोहरे शतक जमाए हैं.
गेंद जो भी हो बाउंड्री के पार
104 टेस्ट मैचों में 8586 रन या 251 वनडे में 8273 रन सहवाग की पूरी कहानी नहीं कहते. सहवाग अपनी तरह के इकलौते बल्लेबाज़ रहे जो केवल अपने दम पर किसी भी मैच का नक्शा बिगाड़ सकते थे.
सहवाग जब अपनी लय में होते थे, तो किसी पारी पर उनका क्या इंपैक्ट होता था, इसका अंदाज़ा 2004 में श्रीलंका के ख़िलाफ़ गॉल टेस्ट में उनकी पारी से लगाया जा सकता था, इस टेस्ट की पहली पारी में भारत के आठ बल्लेबाज़ दहाई अंकों तक नहीं पहुंच पाए थे, लेकिन सहवाग ने नाबाद 201 रन ठोक दिए थे, उनकी इस पारी की बदौलत भारत ये टेस्ट जीतने में कामयाब रहा था.
वे किस तरह के बल्लेबाज़ रहे, इसकी झलक कपिल देव के उस जवाब में तलाशा जा सकता है, जिसमें 2011 में दिलीप सरदेसाई मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए कपिल ने कहा था, "सचिन और द्रविड़ तो शाट्स खेलने के लिए ख़राब गेंदों का इंतज़ार करते है, लेकिन ये सहवाग तो अच्छी गेंद हो या ख़राब गेंद हर पर शाट्स खेलता है, मुझे तो इसको गेंदबाज़ी करने में डर लगता."
तकनीकी तौर पर सहवाग के खेल की अपनी सीमा था, वे कभी परफैक्ट बल्लेबाज़ नहीं आंके गए. सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली जैसे दिग्गजों के बीच उनके खेल को उस तरह का सम्मान भी नहीं मिला जिसके वे हक़दार रहे.
लेकिन सहवाग ने इन सबकी कोई परवाह नहीं की, वे हमेशा कहते रहे, "गेंद का काम है बाउंड्री के पार जाना और मेरा काम है उसे पहुंचाना."
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