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मुझे पता ही नहीं था मैं कैप्टन हूं
- Author, राखी शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत की सीनियर हॉकी खिलाड़ी वंदना कटारिया कहती हैं कि देश में महिला हॉकी के खिलाड़ियों को अब पहचान मिल रही है. वंदना को पहली बार एशियन चैंपियनशिप में भारतीय टीम की कमान सौंपी गई और उन्होंने सिंगापुर में खेले गए इस टूर्नामेंट में भारत को ख़िताबी जीत दिलाई.
वो कहती हैं, "भारतीय महिला हॉकी टीम के लिए ये जीत बेहद मायने रखती है. इस जीत और मेडल से हमें प्रेरणा मिली है. क्योंकि आगे हमारे अभी और टूर्नामेंट हैं. हम टेस्ट सिरीज़ के लिए आस्ट्रेलिया जाएंगे."
क़रीब डेढ़ सौ अंतरराष्ट्रीय मैच खेल चुकी वंदना को इस टूनामेंट में जाने से पहले भारतीय महिला टीम की कप्तानी सौंपे जाने के बारे में काफी देर बाद पता चला था. कुछ ऐसे ही लम्हों को बीबीसी के साथ वंदना ने साझा किया है.
वो बताती है, " दोपहर में टीम की घोषणा हुई थी, मुझे पता नहीं था कि मैं कैप्टन हूं. मुझे शाम को पता चला कि मैं कैप्टन हूं. कैप्टन के तौर पर मेरे साथ में जो सीनियर प्लेयर थे. वो लोग सब बहुत सपोर्ट करते थे. मतलब जो मैं बोलती थी वो सब करते थे. मुझे कोई भी समस्या हो बगैर मेरे बोले ही वो लोग मेरा साथ देते थे. उन्हें खुद की ज़िम्मेदारी पता थी. मुझे उन्हे बताने की जरूरत नहीं होती थी कि उन्हें क्या करना है."
वंदना कहती हैं, "पहले हमारे सीनियर प्लेयर थे. मेडल जीतने पर कुछ नहीं होता था लेकिन भारत सरकार भी अभी खिलाड़ियों के लिए काफी कुछ कर रही है. अब स्टेट सरकार की पॉलिसी होती है. हम जीत कर आते हैं वो इनाम की घोषणा कर देते हैं. यही नही अन्य स्टेट भी जब कोई खेल पसंद करते हैं तो वह भी खिलाड़ियों के लिए घोषणाएं करते हैं. हॉकी इंडिया भी खिलाड़ियों की काफ़ी मदद करती हैं. उऩ्होने बेस्ट गोलकीपर, बेस्ट हॉकी खिलाड़ी जैसे कई अवार्ड निकाले हैं. ये हर साल दिए जाते हैं. इनसे खिलाड़ी को प्रेरणा मिलती है. पब्लिक भी अब हॉकी खिलाड़ियों को जानने लगी है."
जब भारतीय महिला टीम एशियन हॉकी चैंपियनशिप खेलने गई थी. रियो ओलंपिक की हार के कुछ ज़ख्म भी ताजा थे.
वंदना बताती हैं, "इससे पहले जापान में यह टूर्नामेंट हुआ था. इसमें हमने रजत पदक जीता था. हमने 36 साल बाद ओलपिंक के लिए क्वालीफाई किया था. हमने सोचा था कि हम लोग वहां पर अपना बेस्ट करेंगे. लेकिन उतना नहीं हो पाया. लेकिन ओलंपिक से हमें अच्छा अनुभव मिल गया. जब हम वहां गए तो बहुत अच्छी-अच्छी टीमों के साथ खेलने को मिला. उनका अनुभव मिला. उस अनुभव पर हमने कठिन मेहनत की. पूरी टीम ने कठोर मेहनत करने में कसर नहीं छोड़ी. ओलंपिक में जाने का फायदा भी हमें अभी मिला. उसका परिणाम है कि हमने खिताब अपने नाम किया."
वंदना कहती हैं, "दीपिका ठाकुर टूर्नामेंट की बेस्ट खिलाड़ी चुनी गई. मैं जब 2008 में जूनियर टीम में आई थी. वह मेरी पसंदीदा थी अब भी है. उन्होंने अभी चार गोल किए है. थोड़ा सीनियर भी है वो इसलिए उनको दीपू दीदी ही बोलती हूं. उनके साथ बेहद अच्छा तालमेल है"
वह बताती हैं "इस चैंपियंस ट्रॉफी में मेरी परफॉमेंस ठीक थी. टीम को भी लेकर चलना था और मुझे भी खेलना है. मेरा ठीक ही था .बस इसका मलाल रह गया कि अवसर मिलने पर भी मैंने बहुत गोल मिस किए. मैंने पास दिए हैं. लेकिन मुझे गोल भी करने थे."
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