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समोसा साथ खाने की बात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया क्या जवाब? - सोशल
कोरोना वायरस संक्रमण के कारण दुनिया के ज़ायादातर देशों में लॉकडाउन है. घर पर रहते हुए किसी ने योगासन करना शुरू कर दिया है तो किसी बागवानी तो किसी ने अपने अंदर छिपकर बैठे शेफ़ को पहचान लिया है.
सोशल मीडिया इस तरह की तस्वीरों से भरा पड़ा है.
लेकिन सिर्फ़ आम लोग ही ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं. अभी तक आपने कटरीना कैफ़ को बर्तन धोते देख लिया, किसी को पौधे लगाते तो किसी को झाड़ू लगाते.
इसी क्रम में आज ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने भी एक तस्वीर शेयर की है.
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने ट्वीटर पर एक तस्वीर पोस्ट की है. उन्होंने समोसे बनाते हुए अपनी फोटो पोस्ट की है. आम की चटनी के साथ समोसे की ये तस्वीर शेयर करते हुए लिखा है कि काश! वो इसे अपने दोस्त नरेंद्र मोदी के साथ बैठकर खा पाते.
अब एक दोस्त समोसे का ऑफ़र दे रहा हो तो दूसरे दोस्त कम से कम जवाब देना तो बनता ही है.
अपने दोस्त स्कॉट मॉरिसन के ट्वीट का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने उनके ट्वीट को री-ट्वीट करते हुए लिखा, "भारतीय महाद्वीप से जुड़े हैं और समोसे से क़रीब आए हैं."
"देखने में तो काफी लज़ीज़ लग रहा है"
"एकबार जब हम कोरोना पर विजय पा लेंगे तो साथ बैठकर समोसा खाएंगे."
बस इसके बाद से ट्वीटर पर समोसा टॉप ट्रेंड में है. लोग तरह-तरह की प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
विशु नाम के ट्विटर हैंडल से लिखा गया है..
एक अन्य यूज़र लिखते हैं..
हर्षिल लिखते हैं, समोसा भारत के लिए अगला सॉफ़्ट पावर है.
हालांकि कुछ लोगों ने इसे गांव और छाछ से जोड़कर भी कमेंट किया है.
एक कमेंट कुछ ऐसा भी है...
भारत कैसे पहुंचा समोसा
आप समोसे को भले ही 'स्ट्रीट फूड' मानें लेकिन ये सिर्फ स्ट्रीट फूड नहीं है, उससे बहुत बढ़कर है.
समोसा इस बात का सबूत है कि ग्लोबलाइजेशन कोई नई चीज़ नहीं है, समोसा खाने के बाद आपको समझ जाना चाहिए कि किसी चीज़ की पहचान देश की सीमा से तय नहीं होती है.
ज्यादातर लोग मानते हैं कि समोसा एक भारतीय नमकीन पकवान है लेकिन इससे जुड़ा इतिहास कुछ और ही कहता है.
दरअसल, समोसा मीलों दूर ईरान के प्राचीन साम्राज्य से आया है.
कोई नहीं जानता कि इसे पहली बार तिकोना कब बनाया गया लेकिन इतना जरूर पता है कि इसका नाम समोसा फारसी भाषा के 'संबुश्क:' से निकला है.
समोसे का पहली बार ज़िक्र 11वीं सदी में फारसी इतिहासकार अबुल-फज़ल बेहाक़ी की लेखनी में मिलता है.
उन्होंने ग़ज़नवी साम्राज्य के शाही दरबार में पेश की जाने वाली 'नमकीन' चीज़ का ज़िक्र किया है जिसमें कीमा और सूखे मेवे भरे होते थे.
इसे तब तक पकाया जाता था जब तक कि ये खस्ता न हो जाए लेकिन लगातार भारत आने वाले प्रवासियों की खेप ने समोसे का रूप-रंग बदल दिया.
समोसा भारत में मध्य एशिया की पहाड़ियों से गुज़रते हुए पहुंचा जिस क्षेत्र को आज अफ़ग़ानिस्तान कहते हैं.
बाहर से आने वाले इन प्रवासियों ने भारत में काफ़ी कुछ बदला और साथ ही साथ समोसे के स्वरूप में भी काफ़ी बदलाव आया.
लेकिन समय के साथ जैसे ही समोसा ताज़िकिस्तान और उज़्बेकिस्तान पहुंचा इसमें बहुत बदलाव आया. और जैसा कि भारतीय खानों के विशेषज्ञ पुष्पेश पंत बताते हैं यह 'किसानों का पकवान' बन गया.
अब यह एक ज़्यादा कैलोरी वाला पकवान बन गया है.
ख़ास तरह का इसका रूप तब भी कायम था और इसे तल कर ही बनाया जाता था लेकिन इसके अंदर इस्तेमाल होने वाले सूखे मेवे और फल की जगह बकरे या भेड़ के मीट ने ले ली थी जिसे कटे हुए प्याज और नमक के साथ मिला कर बनाया जाता था.
सदियों के बाद समोसे ने हिंदूकुश के बर्फ़ीले दर्रों से होते हुए भारतीय उपमहाद्वीप तक का सफ़र तय किया.
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