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अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति की सलाह #SOCIAL
इन दिनों अख़बारों की सुर्खि़यों में अर्थव्यवस्था से जुड़ी ख़बरें छाई रहती हैं. भारत की अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ गई है, जिसे लेकर बड़े-बड़े अर्थशास्त्री चिंता जता चुके हैं.
हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार के कम्युनिकेशन एडवाइज़र रह चुके पराकाला प्रभाकर ने अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत पर द हिंदू अख़बार में एक लेख लिखा है.
इस लेख में प्रभाकर बीजेपी सरकार को सलाह दे रहे हैं कि उन्हें नेहरू के समाजवाद की आलोचना करने के बजाए, राव-सिंह के इकोनॉमिक आर्किटेक्चर को अपनाना चाहिए.
पराकाला प्रभाकर के इस लेख की सोशल मीडिया पर कई लोग चर्चा कर रहे हैं. इस चर्चा की एक वजह ये भी है कि प्रभाकर, देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति भी हैं.
पढ़िए इस लेख के कुछ हिस्से -
पराकाला प्रभाकर ने शुरुआत में लिखा है कि देश की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती को लेकर हर ओर घबराहट का माहौल है. सरकार इसे ख़ारिज कर रही है, लेकिन पब्लिक डोमेन में मौजूद जानकारी से पता चलता है कि हर सेक्टर में स्थिति बहुत ही चुनौतीपूर्ण हो चुकी है.
निजी क्षेत्र की खपत ढाई साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंचकर 3.1% हो गई है. ग्रामीण खपत में शहरी क्षेत्र से दोगुनी सुस्ती छाई है. नेट एक्सपोर्ट में बहुत कम या कुछ वृद्धि नहीं हुई है. जीडीपी छह साल में सबसे निचले स्तर पर है; वित्त वर्ष 20 के पहले क्वार्टर में सिर्फ़ 5% विकास दर दर्ज की गई है और बेरोज़गारी 45 साल में सबसे ज़्यादा है.
लेकिन अभी तक बीजेपी सरकार की तरफ़ से अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने की कोशिश के संकेत नहीं दिखे हैं.
'कोई आर्थिक रोडमैप नहीं'
पराकाला प्रभाकर ने लेख में ये भी लिखा है कि बीजेपी सरकार के पास कोई इकोनॉमिक रोडमैप नहीं है. लेख के मुताबिक़ ये पार्टी, भारतीय जनसंघ के दिनों से ही नेहरू के समाजवाद को ख़ारिज करती आई है. जबकि बीजेपी जिस पूंजीवाद, मुक्त बाज़ार फ्रेमवर्क की वकालत करती है, वो असल में कभी टेस्ट किया नहीं गया.
और पार्टी की आर्थिक विचारधारा और उसकी अभिव्यक्ति राजनीतिक वजहों से सिर्फ़ नेहरूवादी मॉडल की आलोचना करने तक सीमित रही.
जब वाजपयी सरकार के वक्त पार्टी ने 'इंडिया शाइनिंग' का अभियान चलाया तो वो फेल हो गया और वोटरों को लुभा नहीं पाया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोगों को लगा ही नहीं कि पार्टी का कोई अलग आर्थिक ढांचा है.
इसलिए इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि 2004 के आम चुनाव में विकास और अर्थव्यवस्था की जो पिच पार्टी ने बनाई, उसने उन्हें हार का मुंह दिखाया.
पार्टी का मौजूदा नेतृत्व इस बात को अच्छे से जानता है, इसलिए 2019 में दोबारा हुए आम चुनाव में उसने अपनी सरकार के आर्थिक प्रदर्शन की बात नहीं की, बल्कि बहुत होशियारी से राष्ट्रवाद और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चुनाव लड़ा.
राव-सिंह की नीति
पराकाला प्रभाकर ने अपने लेख में पीवी नरसिम्हा राव और उनकी सरकार में रहे मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों की तारीफ़ की है. 1991 में देश में कांग्रेस सरकार थी जिसमें नरसिम्हा राव प्रधान मंत्री और मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे.
प्रभाकर ने लिखा कि मौजूदा सरकार को नरसिम्हा राव- मनमोहन सिंह की आर्थिक निति से सीख लेनी चाहिए.
शेयर किया जा रहा लेख
कई लोग पराकाला प्रभाकर के इस लेख को इसलिए भी शेयर कर रहे हैं, क्योंकि वो केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं.
रूपा गुलाब नाम की एक ट्वीटर यूज़र ने इस लेख को शेयर करते हुए लिखा, "और गेस करिए इनकी पत्नी कौन हैं?"
उनके इस पोस्ट पर एक दूसरे व्यक्ति ने कमेंट किया है कि "ये ग़लत है. दोनों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं. बल्कि ये तो अच्छा लग रहा है कि वो इस तरह अपनी पत्नी की आलोचना कर रहे हैं."
वहीं एक पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने ट्वीटर पर पूछा है, "क्या निर्मला सीतारमण अपने पति की सुनेंगी? जो चाहते हैं कि वो कांग्रेस की आर्थिक नीतियों का अनुसरण करें."
कुछ लोग मज़ाक़िया अंदाज़ में भी चुटकी ले रहे हैं. एक ट्वीटर यूज़र ने लिखा, "ये आज घर नहीं जाएंगे."
अभिजीत श्रीवास्तव नाम के एक व्यक्ति ने फेसबुक पर लिखा है, "घर का झगड़ा अब अख़बार में निपटाया जा रहा है. आज के अख़बार में यह लेख पराकाला प्रभाकर ने लिखा है, जो वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं. वे सरकार को, मने अपनी होम मिनिस्टर और देश की फिनांस मिनिस्टर को सलाह दे रहे हैं कि नेहरूवादी समाजवाद को गरियाने से काम नहीं चलेगा, मनमोहन−राव की आर्थिक नीतियों पर चलें. ये तो हाल है कि घर में सलाह तक नहीं दे सकते महाराज, अख़बार का सहारा लेना पड़ रहा है."
हाल के दिनों में सरकार के मंत्रियों की ओर से कई ऐसे बयान आए जिनका सोशल मीडिया पर मज़ाक़ भी बनाया गया.
कुछ वक्त पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि ओला उबर की वजह से ऑटो सेक्टर में गिरावट आई है.
और हाल ही में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि फ़िल्में जब करोड़ों रुपये कमा रही हैं तो अर्थव्यवस्था सुस्त कैसे? हालांकि बाद में उन्होंने इस बयान को वापस ले लिया.
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