सोशल: बीएचयू मामले पर क्या सोचते हैं वहां पढ़ने वाले छात्र

बीएचयू, छेड़छाड़, वीसी, लड़कियां, महिलाएं, सुरक्षा

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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी कई दिनों से ख़बरों में है. वहां की छात्राओं के साथ हुई छेड़छाड़ के बाद पनपा गुस्सा और विरोध प्रदर्शन के बाद पुलिस का लाठीचार्ज, इन पर सबकी नज़र है.

इस बीच लड़कियां खुलकर सामने आई हैं और उन्होंने सबके सामने अपनी बात भी रखी है. लेकिन लड़कों का इस बारे में क्या सोचना है? खासकर बीएचयू में पढ़ने वाले छात्र इस मसले पर क्या कहते हैं?

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यही जानने के लिए बीबीसी हिंदी के संवाददाता समीरात्मज मिश्र ने बीएचयू के बिड़ला हॉस्टल जाकर छात्रों से बात की. इस बातचीत में तरह-तरह के विचार और मुद्दे सामने आए.

क्या इससे बीएचयू में पढ़ने वाले छात्रों की छवि खलनायक की बन रही है? क्या वे सभी लड़कियों को परेशान करते हैं?

इस बारे में पीएचडी के एक छात्र ने कहा,''विश्वविद्यालय के लड़के आमतौर पर ऐसा नहीं करते, ऐसा करने वाले ज्यादातर बाहरी होते हैं. लेकिन पिछली कुछ वक़्त से छेड़खानी की घटनाए बढ़ गई थीं और विश्वविद्यालय प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए था. ''

उन्होंने आगे कहा,'' लड़कियों के मन में काफ़ी वक़्त से गुस्सा था और वे लगातार अपनी मांगें सामने रख रही थीं लेकिन उनकी नहीं सुनी गई.''

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आंदोलन के पीछे बाहरी तत्वों का हाथ होने के सवाल पर ज्यादातर छात्रों का कहना था कि वहां कोई बाहरी लोग नहीं थे. सब विश्वविद्यालय के ही छात्र थे. उसमें भी ज्यादातर लड़कियां ही थीं.

हालांकि उन्होंने यह भी माना की बाद भी कुछ राजनीतिक पार्टियों ने आंदोलन का फ़ायदा उठाने की कोशिश की थी.

छात्रों ने यह सवाल भी किया कि अगर बाहरी लोग आंदोलन में आकर शामिल हो गए तो क्या वीसी छात्राओं से नहीं मिल सकते थे? उन्होंने मदन मोहन मालवीय की मूर्ति पर कालिख पोते जाने के आरोप का भी खंडन किया.

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इन सब घटनाओं से छात्रों की छवि पर क्या असर पड़ रहा है? इस सवाल के जवाब में छात्रों ने कहा,''हम लोग कितनी दूर-दूर से यहां पढ़ने आते हैं, अब हमारे बारे में क्या-क्या बोला जा रहा रहा है.''

कुछ छात्रों का कहना था कि वहां पढ़ने वाली सभी लड़कियां उनकी बहन जैसी हैं. इस पर एक छात्र ने कहा,''क्या हमें सिर्फ बहनों की ही सुरक्षा करनी चाहिए? क्या हम उन्हें दोस्त मनाकर उनकी इज़्ज़त नहीं कर सकते? ये सवाल अपने-आप में वाहियात है. लड़कियों से सिर्फ एक ही रिश्ता नहीं होता.''

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एक छात्र का यह भी कहना था कि बीएचयू में राष्ट्रवाद के नाम पर कई बड़े मुद्दों को दबा दिया जाता है.

बीएचयू में छात्र और हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे प्रोफ़ेसर बलराम पांडेय का कहना है कि वीसी और छात्रों के बीच संवादहीनता की स्थिति की वजह से ऐसा हुआ.

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