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क़ीमत बढ़ाती है वाइन का आनंद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सभी जानते हैं कि वाइन जितनी पुरानी होगी, उतनी ही बेहतर मानी जाएगी लेकिन लगता है कि अब इसकी गुणवत्ता और स्वाद इसके पुराने होने से नहीं बल्कि इसकी कीमत से आंकी जाती है. केलिफ़ोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी ने बताया कि कैसे किसी व्यक्ति की ख़ुशी तब बहुत बढ़ जाती है जब उसे यह बताया जाता है कि यह बेशकीमती वाइन है. इक्कीस लोगों से कैबरने सौविग्नॉन की विभिन्न बोतलों का स्वाद चखने और अपनी पसंद बताने के लिए कहा गया. इस बारे में उन्हें केवल एक ही सूचना दी गई और वो थी इसकी कीमत की. लेकिन ज़्यादातर मामलों में उन्हें सही कीमत नहीं बताई गई. इन लोगों को एक से ही रेड वाइन के दो नमूने दिए गए और बताया गया कि इनमें से एक की कीमत दूसरे नमूने से बहुत कम है. आनंद का अहसास इनमें से ज़्यादातर लोगों ने ज़्यादा क़ीमत वाली वाइन को ज़्यादा बेहतर बताया. वाइन का स्वाद चखने वाले लोगों के मस्तिष्क को स्कैन किया गया ताकि उनके निर्णय और स्वाद के परिपेक्ष्य में आनंद की मात्रा का पता लगाया जा सके.
अधिकतर लोगों ने महंगी बताई गई वाइन को ज़्यादा अंक दिए. रिसर्च टीम के प्रमुख एंटोनियो रांगेल ने बीबीसी समाचार वेबसाइट को बताया कि इस प्रयोग ने बताया कि कैसे उम्मीदें अनुभव के आनंद को प्रभावित कर सकती हैं. प्रतिष्ठा इंग्लैंड की वाइन सोसायटी के प्रमुख ओलिवर जॉनसन कहते हैं कि यह प्रतिक्रिया प्रतिष्ठा से संबंधित बहुत से उत्पादों जैसे कपड़ों, कारों और आजकल हैंडबैगों के लिए साधारण सी बात है. जॉनसन कहते हैं, “ऐसे मामलों में आम लोग वाइन की क़ीमत से तय करते हैं कि वह कितनी अच्छी है, वे उम्मीद करते हैं कि यही बढ़िया और पुरानी होगी तभी तो महँगी है.” ऐसे भी लोग हैं जो बढ़िया लेबल के लिए ख़ुशी से कोई भी क़ीमत देने को तैयार हो जाते हैं. वे कहते हैं कि इससे संकेत मिलते हैं कि ज़्यादातर लोगों के लिए वाइन ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है. विशेषज्ञों की जानकारी अक्टूबर, 2001 में बहुत से लोगों ने लंदन के एक रेस्तराँ में वाइन की एक बोतल के लिए 12,300 पाउंड तक खर्च किए.
लेकिन जॉनसन कहते हैं कि सभी लोग ऐसे नहीं हैं जो वाइन का आनंद सिर्फ़ तभी लें जब उस पर ऊंची कीमत का लेबल लगा हो. वे कहते हैं, “दोनों तरह के लोग हैं. एक वे जो सिर्फ़ दाम देखकर वाइन का आनंद लेते हैं और दूसरे वे जो दाम देखकर इसे ख़रीद तो लेते हैं लेकिन इसका स्वाद चखने के बाद इसके उम्मीदों के मुताबिक न होने पर उन्हें निराशा होती है”. वे कहते हैं कि वाइन के विशेषज्ञ को प्रयोग में बेवकूफ़ नहीं बनाया जा सकता. बहुत से लोग इसके अंतर के बारे में बता सकते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ससेक्स में प्रायोगिक मनोविज्ञान के रीडर डॉ मार्टिन योमेंस कहते हैं, “यह बताता है कि कैसे हमें बेवकूफ़ बनाया जा सकता है और यह भी कि कैसे लोगों की उम्मीदों को बढ़ा कर उन्हें वाइन जैसे उत्पाद की ज़रूरत के लिए ज़्यादा खर्च करने के लिए फुसलाया जा सकता है”. | इससे जुड़ी ख़बरें रोबोट चखेगा वाइन का स्वाद05 सितंबर, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस फ्रांसीसी वाइन कंपनी भारतीय हाथों में13 जुलाई, 2006 | कारोबार फ्रांसीसी कंपनी के लिए माल्या की बोली16 जून, 2006 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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