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शुक्रवार, 21 सितंबर, 2007 को 09:09 GMT तक के समाचार
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बाढ़ से जूझनेवाले धान का वरदान

धान की खेती करते किसान
भारत और बांग्लादेश कृषिप्रधान देश हैं जहाँ अधिकांश आबादी का पेशा अभी भी खेती है
भारत और बांग्लादेश में एक बड़ी समानता है. दोनों ही कृषिप्रधान देश हैं.

लेकिन दोनों देशों में एक समानता और भी है. दोनों ही जगह हर साल बाढ़ आती है जिसके सबसे बड़े शिकार होते हैं - खेती पर आश्रित किसान.

लेकिन लगता है कि ऐसे किसानों की मुश्किल कुछ हद तक अवश्य कम हो जाएगी.

भारत और बांग्लादेश - दोनों ही देशों में वैज्ञानिकों का कहना है कि वे धान की ऐसी किस्म तैयार करने के काफ़ी नज़दीक पहुँच गए हैं जो बाढ़ का सामना कर सकती है.

लेकिन धान की ये उन्नत किस्म उन्हीं इलाक़ों में लाभदायक साबित होगी जिन इलाक़ों में पानी 10 से 14 दिन के बीच उतर जाता है. ऐसे निचले इलाक़े जहाँ हर बार बाढ़ आती है और पानी लंबे समय तक रहता है, वहाँ ये बीज कारगर नहीं होगा.

उन्नत बीज

भारत और बांग्लादेश में इस वर्ष आई बाढ़ के दौरान कृषि वैज्ञानिकों को धान के ऐसे बीजों के प्रयोग में सफलता हाथ लगी है जो बाढ़ का सामना कर सकते हों.

 इस वर्ष किसानों ने इन बीजों को लगाया और उन्होंने पाया कि इन बीजों से उगे धान के पौधों के मरने की संख्या या मात्रा दूसरे बीजों की अपेक्षा काफ़ी कम रही
प्रोफ़ेसर एम पी पांडे, निदेशक, सीआरआरआई

इन बीजों में ऐसे गुणसूत्रों या जीन दिए गए हैं जिन्हें फ़िलीपींस की राजधानी मनीला स्थित अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है.

भारत में स्वर्ण बीज और बांग्लादेश में बीआर-11 बीज चावल की खेती करनेवाले किसानों के बीच लोकप्रिय बीज हैं. वैसे बांग्लादेश में भी स्वर्ण बीज और भारत में भी कई जगहों पर किसान अपने खेतों में बीआर-11 बीज लगाया करते हैं.

इस वर्ष किए गए प्रयोग में इन जीनों को दोनों बीजों में प्रतिरोपित किया गया. भारत में इन उन्नत बीजों को नाम दिया गया स्वर्ण सबमर्जेंस-वन और बांग्लादेश में बीआर-11 सबमर्जेंस-वन. संक्षेप में इन्हें कहा गया स्वर्ण सब-वन और बीआर-11-सब-वन.

भारत में उड़ीसा के कटक शहर में स्थित केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) में इन बीजों पर पिछले लगभग ढाई वर्षों से इन बीजों पर प्रयोग चल रहा है.

सीआरआरआई के निदेशक प्रोफ़ेसर एम पी पांडे ने बीबीसी को बताया," हमने स्वर्ण और इसके अलावा कई दूसरे किस्म के चावल के बीजों में भी सब वन जीन डाला और इस वर्ष बरसात में किसानों ने इन बीजों को लगाया और उन्होंने पाया कि इन बीजों से उगे धान के पौधों के मरने की संख्या या मात्रा दूसरे बीजों की अपेक्षा काफ़ी कम रही".

 हमने जो बीज विकसित किया है उसे लगाने पर किसानों के सामने कोई ख़तरा नहीं रहेगा, चाहे बाढ़ आए या नहीं आए, उनको नुक़सान नहीं होगा.
डाक्टर एम ए सलाम, वैज्ञानिक, बीआरआरआई

बांग्लादेश में भी इस वर्ष बाढ़ के दौरान किए गए प्रयोग में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है. बांग्लादेश में ये प्रयोग ढाका के पास गाज़ीपुर में स्थित बांग्लादेश धान गवेषणा संस्थान (बीआरआरआई) में किया जा रहा है.

बीआरआरआई में इस प्रयोग के प्रभारी और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर एम ए सलाम कहते हैं,"ये हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ऐसे इलाक़े जहाँ इस साल किसान धान उगा रहे हैं, वहाँ किसानों को ये पता नहीं होता कि अगले साल वहाँ बाढ़ आएगी कि नहीं. तो हमने जो बीज विकसित किया है उसे लगाने पर उनके सामने कोई ख़तरा नहीं रहेगा, चाहे बाढ़ आए या नहीं आए, उनको नुक़सान नहीं होगा".

प्रयोग जारी

वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रयोग के प्रारंभिक परिणाम काफ़ी उत्साहवर्धक रहे हैं मगर अभी इस बीज पर एक और वर्ष तक प्रयोग किया जाएगा

एक किसान
भारत और बांग्लादेश में हर साल बाढ़ के कारण किसानों के खेत जलमग्न हो जाया करते हैं

भारत में फ़िलहाल इस बीज पर अब देश के अलग-अलग हिस्सों और अलग-अलग तरह की मिट्टी और जलवायु में परीक्षण किया जा रहा है. अभी तक उड़ीसा के अलावा आंध्र प्रदेश में भी इसपर प्रयोग हो चुका है और दोनों ही स्थानों पर वैज्ञानिकों को सफलता मिली है.

सीआरआरआई में इस शोध से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर जी जे एन राव ने बताया कि वैज्ञानिकों ने अपना काम कर दिया है और अब पूरे देश में नमूनों पर परीक्षण करवाने का दायित्व हैदराबाद स्थित डायरेक्टरेट ऑफ़ राइस रिसर्च (डीआरआर) का है.

डॉक्टर जी जे एन राव कहते हैं,"डीआरआर के माध्यम से इस साल ख़रीफ की फसल के मौसम में अलग-अलग स्थानों पर परीक्षण करवाए जा रहे हैं, उनके नतीजे दिसंबर तक आ जाएँगे जिसके बाद अगले वर्ष अप्रैल तक आधिकारिक तौर पर इस बारे में घोषणा की जाएगी. वैसे मात्र एक साल के परीक्षण के हिसाब से हमें जो सफलता मिली है उसकी तो हमें अपेक्षा भी नहीं थी".

बांग्लादेश में भी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वर्ष सफलता तो मिली है लेकिन इस वर्ष देश में असामान्य बाढ़ आने और उसके भी दोबारा आने के कारण, इस वर्ष पहली बाढ़ के समय किए गए प्रयोग में कठिनाई आई. वैज्ञानिकों के अनुसार शत-प्रतिशत सफलता की घोषणा करने के लिए अगले वर्ष तक प्रतीक्षा करनी होगी.

सस्ते बीज

वैज्ञानिकों का ये भी कहना है कि बाढ़ का सामना करनेवाले इन बीजों की कीमत अभी उपलब्ध बीजों के समान ही होगी.

 पानी 10-12 दिन में निकल जाता था पर अभी तो यहाँ दो-दो महीने खेत में पानी लगा रहता है, तो उसमें इन बीजों से क्या लाभ होगा?
अशोक कुमार चौधरी, किसान

बीआरआरआई के डॉक्टर एम ए सलाम बताते हैं," इस बीज की सबसे सुंदर बात यही है कि इसका विकास, उत्पादन और वितरण सरकारी संस्थाओं के माध्यम से ही हो रहा है इसलिए बीज की कीमत वही रहेगी जो पहले थी. ये एक तरह से किसानों की सहायता जैसा काम है और सरकार चाहे तो इस बीज को मुफ़्त भी बँटवा सकती है".

मगर बाढ़ की विभीषिका झेलनेवाले किसान कहते हैं कि अभी जिस तरह बाढ़ का पानी खेतों में दो-दो महीने तक लगा रहता है उससे ये बीज उनकी समस्या नहीं सुलझा सकते.

बिहार के बाढ़ग्रस्त दरभंगा ज़िले के हनुमाननगर प्रखंड में स्थित रामपट्टी गाँव के किसान अशोक कुमार चौधरी कहते हैं,"पहले हमारे यहाँ पानी 10-12 दिन में निकल जाता था, अगर वैसा हो तो निश्चित रूप से इस बीज से फ़ायदा होगा. लेकिन अभी तो यहाँ दो-दो महीने खेत में पानी लगा रहता है, तो उसमें इन बीजों से क्या लाभ होगा?"

अशोक चौधरी की बात से स्पष्ट है कि बाढ़ से जुड़ी किसानों की समस्या और वैज्ञानिकों की चुनौती अभी ख़त्म नहीं हुई है. लेकिन अच्छी बात ये है कि नए बीजों से किसानों की समस्या कम ज़रूर होगी और शायद वैज्ञानिकों की चुनौती भी आसान हो सकती है.

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